हंटा वायरस से तीन मौत, जानिए क्यों फैल रही यह खतरनाक बीमारी, क्या है इसका कारण
अटलांटिक महासागर में सफर कर रहे एक क्रूज शिप हंटावायरस फैलने से तीन लोगों की मौत हो गई है, जानिए कितनी गंभीर है यह बीमारी...

Published : May 7, 2026 at 4:58 PM IST
अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच चल रहे एक लग्जरी क्रूज जहाज पर हंटावायरस के मामले सामने आए हैं. MV Hondius नाम के इस लग्जरी क्रूज जहाज पर हंटावायरस के फैलने से तीन लोगों की जान चली गई है, और लगभग 150 यात्री और क्रू सदस्य फंस गए हैं. बता दें, यह जहाज अर्जेंटीना से केप वर्डे जा रहा था. WHO ने इस जहाज पर सात मामले (हंटावायरस के दो लैब से कन्फर्म मामले और पांच संदिग्ध मामले) मामलों की पुष्टि की है. जिनमें तीन मौत हो गई है, पांच संदिग्ध मामलों की अभी जांच चल रही है. इस बीच, कई और लोग भी गंभीर रूप से बीमार पड़ गए हैं. इस उभरती स्थिति ने पूरी दुनिया में भारी दहशत और चिंता पैदा कर दी है. इसी संदर्भ में, आइए विस्तार से जानें कि हंटावायरस आखिर है क्या, यह कैसे फैलता है, और इससे जुड़ी अन्य जरूरी जानकारियां क्या हैं...
हंटावायरस क्या है?
जाने-माने हेल्थ एक्सपर्ट और एशियन सोसाइटी फॉर इमरजेंसी मेडिसिन के पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. तमोरिश कोले का कहना है कि हंटावायरस एक जानलेवा वायरस हो सकता है, जो मुख्य रूप से चूहों (rodents) से फैलता है. यह फेफड़ों को प्रभावित करता है और कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है, जैसे कि हंटावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम.
यह कैसे फैलता है?
डॉ. तमोरिश कोले और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह वायरस संक्रमित चूहों के पेशाब, मल या लार के जरिए फैलता है. वे यह भी बताते हैं कि जो लोग हवादार न होने वाली या बंद जगहों पर रहते हैं, उन्हें इस बीमारी के होने का खतरा ज्यादा होता है.
इंसानों से इंसानों में संक्रमण
डॉ. तमोरिश कोले इस बात पर जोर देते हैं कि कई अन्य वायरल संक्रमणों के विपरीत, हंटावायरस ऐसी बीमारी नहीं है जो सीधे एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलती हो. उनका कहना है कि ज्यादातर मामले चूहों के संपर्क में आने से जुड़े होते हैं.
लक्षण
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लक्षण फ्लू जैसे ही होते हैं. इनमें आमतौर पर बुखार, थकान, मांसपेशियों में दर्द और सिरदर्द शामिल हैं. इसी वजह से, इस बीमारी का शुरुआती दौर में पता लगाना मुश्किल होता है.
यह कम समय में ही गंभीर रूप ले सकता है
जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, खांसी, सांस लेने में दिक्कत और फेफड़ों में पानी भरने जैसे लक्षण साफ नजर आने लगते हैं. यह हंटावायरस पल्मोनरी सिंड्रोम की एक खास पहचान है.
मृत्यु दर भी काफी ज्यादा है...
हालांकि यह एक बहुत ही दुर्लभ स्थिति है, लेकिन डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि हंटावायरस का संक्रमण कभी-कभी जानलेवा भी साबित हो सकता है. हंटा वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम (HPS) के मामलों में मृत्यु दर लगभग 38 फीसदी से 40 फीसदी है. कुछ गंभीर स्ट्रेन में यह 54 फीसदी तक पहुंच सकती है. इसलिए, तुरंत डॉक्टरी मदद लेना बेहद जरूरी है.
कोई खास इलाज नहीं
हंटा वायरस को बहुत घातक माना जाता है. CDC (Centers for Disease Control) के अनुसार, हंटावायरस के लिए कोई खास एंटीवायरल इलाज उपलब्ध नहीं है. गंभीर मामलों में, सहायक उपचारों, जैसे कि ऑक्सीजन थेरेपी और अस्पताल में भर्ती होने की अक्सर जरूरत पड़ती है.
भारत के पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स की चेतावनी
भारत के पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स ने गुरुवार को चेतावनी दी कि बढ़ती ग्लोबल ट्रैवल और एनवायरनमेंटल बदलावों की वजह से, जानवरों से इंसानों में फैलने वाली बीमारियां (जूनोटिक बीमारियां) और भी ज्यादा अनप्रेडिक्टेबल होती जा रही हैं. वे साफ-सफाई, चूहों पर कंट्रोल और शुरुआती पहचान के सिस्टम के महत्व पर जोर देते हैं ताकि अलग-अलग घटनाओं को बढ़ने से रोका जा सके.
चिंता की बात अभी नहीं
जाने-माने हेल्थ एक्सपर्ट और एशियन सोसाइटी फॉर इमरजेंसी मेडिसिन के पूर्व प्रेसिडेंट डॉ. तमोरिश कोले ने गुरुवार को ETV भारत से कहा कि इस वायरस को लेकर भारत में अभी चिंता की कोई बात नहीं है. हालांकि भारत समेत एशिया के कुछ हिस्सों में हंटा वायरस के मामले कभी-कभी सामने आए हैं, लेकिन इसका फैलना बहुत कम होता है. न्फ्लूएंजा या कोविड-19 जैसे सांस से जुड़े वायरस के उलट, यह वायरस आम कम्युनिटी में ज्यादा फैलने वाला नहीं माना जाता है
जूनोटिक बीमारियों पर पहले से नजर
डॉ. कोले ने कहा कि मौजूदा स्थिति एक खास क्रूज शिप क्लस्टर तक ही सीमित है, जहां कंट्रोल्ड इवैक्युएशन और मॉनिटरिंग की जा रही है, इसलिए भारत जैसे देशों में बड़े पैमाने पर फैलने की संभावना कम है. भारत का पब्लिक हेल्थ सिस्टम, नेशनल सेंटर फॉर डिजीजी कंट्रोल (NCDC) जैसी एजेंसियों के गाइडेंस में, पहले से ही जूनोटिक बीमारियों पर नजर रखता है.
एनवायरनमेंटल डिसरप्शन डिजीज
मशहूर पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट और इंडियन एसोसिएशन ऑफ प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन (IAPSM) की पूर्व प्रेसिडेंट और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर (NIHFW) की एडवाइजरी कमिटी की मेंबर डॉ. सुनीला गर्ग के मुताबिक, इकोलॉजिकल बदलाव जूनोटिक बीमारियों को और भी ज्यादा अनप्रेडिक्टेबल बना रहे हैं. क्योंकि वे इंसानों, जानवरों और पैथोजन्स के बीच इंटरैक्ट करने के तरीके को बदल रहे हैं. डॉ. सुनीला गर्ग ने ETV भारत को बताया कि Covid-19, निपाह वायरस इन्फेक्शन, इबोला वायरस डिजीज और हंटा वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम जैसी बीमारियां तेजी से एनवायरनमेंटल डिसरप्शन से जुड़ी हुई हैं.
डॉ. सुनीला गर्ग ने कहा कि Covid-19, निपाह वायरस इन्फेक्शन, इबोला वायरस डिजीज और हंटा वायरस पल्मोनरी सिंड्रोम जैसी बीमारियां तेजी से एनवायरनमेंटल डिसरप्शन से जुड़ी हुई हैं. जिस पर हेल्थ मिनिस्ट्री इस डेवलपमेंट पर कड़ी से नजर रख रही है.
ग्लोबल बर्डन
दुनिया भर में हैन्टावायरस मुख्य रूप से चूहों और दूसरे जानवरों से फैलता है, हर साल इसके लगभग 100,000 से 200,000 मामले सामने आते हैं. यह वायरस सांस और किडनी की गंभीर बीमारियां पैदा करता है.
(डिस्क्लेमर: इस वेबसाइट पर आपको प्रदान की गई सभी स्वास्थ्य जानकारी, चिकित्सा सुझाव केवल आपकी जानकारी के लिए हैं. हम यह जानकारी वैज्ञानिक अनुसंधान, अध्ययन, चिकित्सा और स्वास्थ्य पेशेवर सलाह के आधार पर प्रदान कर रहे हैं, लेकिन बेहतर होगा कि इन पर अमल करने से पहले आप अपने निजी डॉक्टर की सलाह ले लें.)

