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पहाड़ों में बढ़ती गर्मी ने बदला लाइफस्टाइल, एक्सपर्ट ने बताया कैसे आयुर्वेद बन सकता है सहारा

बदलती जलवायु और ग्रीष्म ऋतु के बीच प्रकृति से दूरी हो रहे लोग, बन रही बीमारियों की सबसे बड़ी वजह.

Himachal Changing Climate
हिमाचल में बदलती जलवायु के साथ बढ़ी गर्मी (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : May 25, 2026 at 5:45 PM IST

8 Min Read
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सिरमौर: पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश, जिसे कभी अपनी ठंडी आबोहवा, देवदार की सुगंध और प्राकृतिक शीतलता के लिए जाना जाता था, अब बदलती जलवायु के प्रभावों को तेजी से महसूस कर रहा है. जिन पहाड़ी क्षेत्रों में कभी गर्मियों के दौरान पंखे की जरूरत भी मुश्किल से पड़ती थी, वहीं अब मई-जून में तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है. मैदानी इलाकों जैसी गर्मी अब पहाड़ों की दिनचर्या और स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करने लगी है. विशेषज्ञ मानते हैं कि हिमालयी क्षेत्रों में तापमान वृद्धि राष्ट्रीय औसत की तुलना में ज्यादा तेज गति से हो रही है. इसका असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव स्वास्थ्य, जल स्रोतों, खेती और पारंपरिक जीवन शैली पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है.

जिला सिरमौर के पांवटा साहिब आयुर्वेदिक अस्पताल में तैनात वरिष्ठ आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद पारिक का कहना है, "वर्तमान समय में आयुर्वेद पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है. आधुनिक विज्ञान जहां “हीट स्ट्रेस”, “डिहाइड्रेशन” और “मानसिक थकान” जैसी समस्याओं की चर्चा कर रहा है. वहीं, आयुर्वेद ने हजारों साल पहले ही ग्रीष्म ऋतु में शरीर की शक्ति क्षीण होने, जल की आवश्यकता बढ़ने और दिनचर्या बदलने की जरूरत का उल्लेख किया था."

“आदान काल” में कमजोर पड़ता है शरीर

डॉ. पारिक बताते हैं कि आयुर्वेद में ग्रीष्म ऋतु (Summer Season) को “आदान काल” कहा गया है. इसका अर्थ है कि वह समय जब सूर्य और वातावरण शरीर की ऊर्जा और स्निग्धता को धीरे-धीरे कम करने लगते हैं. चरक संहिता के अनुसार इस ऋतु में शरीर का बल घटता है और वात दोष का संचय बढ़ने लगता है. अगर इसे आधुनिक विज्ञान की भाषा में समझें तो अत्यधिक गर्मी के कारण शरीर लगातार पसीने के जरिए स्वयं को ठंडा रखने की कोशिश करता है. इससे शरीर में जल, सोडियम, पोटैशियम और अन्य इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी होने लगती है. परिणामस्वरूप थकान, सिरदर्द, चक्कर, मांसपेशियों में ऐंठन, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, पाचन कमजोरी और हीट स्ट्रोक जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं.

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बदलती जलवायु का प्रभाव (ETV Bharat GFX)

"अत्यधिक गर्मी सिर्फ शरीर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करती है. कई शोध बताते हैं कि तापमान बढ़ने के साथ तनाव, बेचैनी और गुस्से की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है. आयुर्वेद इसे “पित्त वृद्धि” के रूप में वर्णित करता है." - डॉ. प्रमोद पारिक, आयुर्वेद विशेषज्ञ, पांवटा साहिब आयुर्वेदिक अस्पताल

हिमाचल में खतरा कम नहीं, बल्कि बदलता हुआ

डॉ. पारिक के अनुसार पहाड़ी क्षेत्रों में अक्सर यह धारणा रहती है कि यहां गर्मी का असर सीमित होता है, लेकिन पिछले कुछ सालों में स्थिति तेजी से बदली है. निचले और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में तापमान बढ़ने के साथ जल स्रोतों का कमजोर होना, जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ना और हीट स्ट्रेस से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं अब आम होती जा रही हैं. उन्होंने कहा कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें अधिक तीव्र हो सकती हैं. खेतों, निर्माण स्थलों, सड़कों और पर्यटन उद्योग में लंबे समय तक कार्य करने वाले लोग लगातार धूप के संपर्क में रहते हैं, जिससे निर्जलीकरण और त्वचा संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है.

ऋतुचर्या: आयुर्वेद की वैज्ञानिक जीवनशैली

डॉ. पारिक का कहना है कि आयुर्वेद केवल यह नहीं बताता कि क्या खाना चाहिए, बल्कि यह भी समझाता है कि कब, कितना और क्यों खाना चाहिए. आधुनिक शोध भी इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि मौसम के अनुसार भोजन और जीवनशैली बदलना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है. उन्होंने बताया कि गर्मी में अत्यधिक ठंडे पेय और बर्फ वाला पानी क्षणिक राहत तो देते हैं, लेकिन इससे पाचन शक्ति प्रभावित हो सकती है. आयुर्वेद मिट्टी के घड़े का शीतल जल पीने की सलाह देता है.

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बढ़ती गर्मी के साथ बढ़ रही स्वास्थ्य समस्याएं (ETV Bharat)

गर्मी में क्या लेना फायदेमंद

डॉ. पारिक बताते हैं कि भीषण गर्मी में शरीर को केवल पानी ही नहीं, बल्कि पर्याप्त ऊर्जा और इलेक्ट्रोलाइट्स की भी जरूरत होती है. ऐसे में पारंपरिक पेय और स्थानीय फल शरीर को भीतर से ठंडक देने के साथ निर्जलीकरण से बचाने में सहायक हो सकते हैं. ये पेय शरीर को हाइड्रेट रखने के साथ आवश्यक खनिज और पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं.

  • सत्तू का पेय
  • छाछ
  • नींबू पानी
  • नारियल पानी
  • बेल का शर्बत
  • आम पना
  • स्थानीय फलों का रस
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गर्मियों में फायदेमंद ड्रिंक्स (ETV Bharat GFX)

हिमाचल के स्थानीय फल हैं प्राकृतिक सुपरफूड

डॉ. पारिक के अनुसार आज जिन खाद्य पदार्थों को दुनिया “सुपरफूड” कह रही है, वे हिमाचल की पारंपरिक खानपान संस्कृति का सालों से हिस्सा रहे हैं. स्थानीय फल न केवल शरीर को पोषण देते हैं, बल्कि गर्मी के दौरान शरीर को ठंडक और आवश्यक पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं. इन फलों में मौजूद प्राकृतिक जल, खनिज और विटामिन गर्मी से बचाव में मददगार हो सकते हैं.

  1. सेब फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर माना जाता है.
  2. खुबानी त्वचा और आंखों के लिए लाभकारी मानी जाती है.
  3. प्लम पाचन में सहायक होता है.
  4. ककड़ी, खीरा और तरबूज शरीर को प्राकृतिक ठंडक प्रदान करते हैं.
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हिमाचल के प्राकृतिक सुपरफूड (ETV Bharat GFX)

दोपहर की धूप सबसे ज्यादा खतरनाक

आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद पारिक ने बताया कि आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच तेज धूप से बचने की सलाह देते हैं. यही वह समय होता है, जब शरीर का तापमान नियंत्रण तंत्र सबसे ज्यादा दबाव में होता है. डॉ. पारिक कहते हैं कि ग्रामीण समाज में पहले दोपहर के समय थोड़े विश्राम की जो परंपरा थी, वह वास्तव में वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी थी.

नींद और मानसिक संतुलन भी जरूरी

डॉ. प्रमोद ने बताया कि गर्मी के मौसम में अनिद्रा और बेचैनी बढ़ना सामान्य माना जाता है. देर रात तक मोबाइल और डिजिटल स्क्रीन का उपयोग नींद की गुणवत्ता को और खराब करता है. पर्याप्त नींद शरीर के तापमान नियंत्रण, हार्मोन संतुलन और प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए अत्यंत आवश्यक है. उन्होंने सलाह दी कि रात में हल्का भोजन करें, शांत वातावरण रखें और सोने से पहले ठंडे पानी से हाथ-पैर धोएं.

योग और प्राणायाम बन सकते हैं प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम

पांवटा साहिब आयुर्वेदिक अस्पताल के आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद पारिक के अनुसार गर्मी के मौसम में हल्के योग और प्राणायाम लाभकारी माने जाते हैं. विशेष रूप से शीतली, शीतकारी और चंद्रभेदी प्राणायाम शरीर और मन दोनों को शीतलता प्रदान करते हैं. वैज्ञानिक अध्ययनों में भी नियंत्रित श्वसन तकनीकों को तनाव कम करने में प्रभावी माना गया है.

आयुर्वेद का सबसे बड़ा संदेश: जीवनशैली में लौटे प्राकृतिक संतुलन

डॉ. प्रमोद का कहना है कि आधुनिक जीवनशैली ने धीरे-धीरे मनुष्य को प्रकृति से दूर कर दिया है. एसी कमरों, जंक फूड और कृत्रिम पेयों पर बढ़ती निर्भरता के कारण शरीर की प्राकृतिक अनुकूलन क्षमता कमजोर होती जा रही है. आयुर्वेद हमें याद दिलाता है कि अच्छा स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि संतुलित दिनचर्या, सही भोजन, ऋतु के अनुरूप जीवन शैली और मानसिक शांति से बनता है.

"हिमाचल की पारंपरिक आदतें-मिट्टी के घड़े का पानी, स्थानीय फल, सत्तू, छाछ, पेड़ों की छांव में विश्राम, जल्दी सोना और जल्दी उठना, सिर्फ सांस्कृतिक परंपराएं नहीं, बल्कि पारंपरिक वैज्ञानिक स्वास्थ्य पद्धतियां हैं, जो शरीर को प्रकृति के साथ संतुलित बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं." - डॉ. प्रमोद पारिक, आयुर्वेद विशेषज्ञ, पांवटा साहिब आयुर्वेदिक अस्पताल

बदलती जलवायु में संतुलित दिनचर्या की बढ़ी अहमियत

डॉ. पारिक का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ग्रीष्म ऋतु अब केवल मौसम नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती बन चुकी है. आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि शरीर को पर्याप्त जल, संतुलित भोजन, विश्राम और प्रकृति के अनुरूप जीवन शैली की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि अगर लोग अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव कर लें तो भीषण गर्मी के बीच भी स्वस्थ और ऊर्जावान रह सकते हैं. आयुर्वेद का मूल संदेश प्रकृति के अनुरूप जीवन शैली अपनाना है और आने वाले समय में यही संतुलित जीवनशैली एक प्रभावी स्वास्थ्य समाधान बन सकती है.

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