टाइप 2 डायबिटीज के मरीजों में क्यों बढ़ रहा लिवर फाइब्रोसिस का खतरा? जानें क्या कहती है नयी स्टडी
Type 2 Diabetes न केवल ब्लड शुगर के स्तर को बढ़ाती है, बल्कि यह धीरे-धीरे लिवर को अंदर से भी नुकसान पहुंचा सकती है, जानिए

Published : April 9, 2026 at 1:50 PM IST
जब किसी व्यक्ति में टाइप 2 डायबिटीज का पता चलता है, तो डॉक्टर आमतौर पर तीन चीजों की रेगुलर जांच तय करते हैं (ब्लड शुगर लेवल, किडनी का काम और आंखों की सेहत) ताकि रेटिनोपैथी जैसी दिक्कतों का शुरुआती दौर में ही पता लगाया जा सके. दरअसल, रेटिनोपैथी एक ऐसी स्थिति है जिसमें हाई ब्लड शुगर का लेवल आंखों की छोटी-छोटी ब्लड वेसेल्स को नुकसान पहुंचाता है. डायबिटीज की इन तीन जानी-मानी दिक्कतों के अलावा, डायबिटीज की इन तीन जानी-मानी दिक्कतों के अलावा, इस महीने 'द लैंसेट रीजनल हेल्थ–साउथईस्ट एशिया' में छपी एक नई स्टडी में एक "चौथी दिक्कत" के बारे में बताया गया है.
भारत भर के डायबिटीज क्लीनिक में की गई 'डायफाइब-लिवर स्टडी', जिसमें 9,000 से ज्यादा मरीज शामिल थे, अब यह तर्क देती है कि नेशनल हेल्थ प्रोग्राम में लिवर फाइब्रोसिस (यानी लिवर पर निशान) की भी स्क्रीनिंग होनी चाहिए. अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह लिवर की गंभीर बीमारी का रूप ले सकती है.
रिसर्चर्स ने पाया कि इस स्टडी में शामिल टाइप 2 डायबिटीज वाले हर चार में से एक एडल्ट के लिवर पर काफी निशान थे, और बीस में से एक को पहले से ही सिरोसिस होने की संभावना थी, एक ऐसी कंडीशन जिसमें लिवर बुरी तरह डैमेज हो चुका होता है. सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इनमें से लगभग किसी भी मरीज को इस समस्या के बारे में पता नहीं था.
लिवर फाइब्रोसिस क्या है
लिवर शरीर का सबसे बड़ा अंदरूनी अंग होता है. जब यह ज्यादा फैट, हाई ब्लड शुगर या शराब से बार-बार डैमेज होता है, तो यह स्कार टिशू बनाकर खुद को ठीक करने की कोशिश करता है. समय के साथ, यह स्कार टिशू बनता जाता है, और यह फाइब्रोसिस में बदल जाता है.
शुरुआती स्टेज में, इसके कोई लक्षण नहीं दिखते. लेकिन, जैसे-जैसे स्कार बढ़ते हैं, लिवर धीरे-धीरे काम करने की अपनी क्षमता खो देता है. जब डैमेज बहुत ज्यादा हो जाता है, तो इस स्थिति को सिरोसिस कहा जाता है, जिस समय लिवर खुद को ठीक नहीं कर पाता. इससे लिवर फेलियर, अंदरूनी ब्लीडिंग और लिवर कैंसर हो सकता है.
डायबिटीज लिवर फाइब्रोसिस में कैसे योगदान देता है?
इस स्टडी के अनुसार, डायबिटीज इस प्रोसेस को तेज कर देती है. हाई ब्लड शुगर, और साथ ही इंसुलिन रेजिस्टेंस, लिवर में फैट जमा होने को बढ़ावा देते हैं, जिससे पुरानी सूजन शुरू हो जाती है और फाइब्रोसिस की स्थिति पैदा हो जाती है. अब, इसे औपचारिक रूप से ‘मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीटोटिक लिवर डिजीज (MASLD)’ कहा जाता है, हालांकि ज्यादातर लोग इसे अभी भी फैटी लिवर डिजीज के नाम से ही जानते हैं. एक्सपर्ट के मुताबिक, फैटी लिवर एक महामारी बन गया है. फैटी लिवर का एक अहम कारण डायबिटीज है.
अध्ययन में यह बात सामने आई कि टाइप 2 डायबिटीज वाले लोगों में न सिर्फ फैटी लिवर डिजीज होने की संभावना ज्यादा होती है, बल्कि उनमें लिवर में गंभीर घाव (स्कारिंग) और सिरोसिस की स्थिति भी तेजी से बढ़ती है. इस वजह से, डायबिटीज के साथ जी रहे करोड़ों लोगों के लिए लिवर की बीमारी एक बेहद गंभीर और अक्सर नजर न आने वाला खतरा बन जाती है. दुनिया भर में 50 करोड़ से ज्यादा वयस्क टाइप 2 डायबिटीज से प्रभावित हैं, और यह संख्या 2045 तक 78 करोड़ से अधिक होने की उम्मीद है, इसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी कम आय वाले देशों में होने का अनुमान है.
भारत इस संकट के केंद्र में है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के एक अध्ययन के अनुसार, देश में पहले से ही 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और 13.6 करोड़ लोग प्रीडायबिटीज की स्थिति में हैं, उम्मीद है कि इस सदी के मध्य तक यह कुल संख्या 15 करोड़ से ज्यादा हो जाएगी.
डायबिटीज को समय पर मैनेज करना क्यों है जरूरी?
डायबिटीज को अगर समय के साथ इसे ठीक से मैनेज न किया जाए, तो लिवर समेत कई अंगों को नुकसान हो सकता है. हाई ब्लड शुगर से इंसुलिन रेजिस्टेंस होता है, लिवर में ज्यादा फैट जमा होता है, जिससे सूजन होती है, जो फाइब्रोसिस, फिर सिरोसिस और कभी-कभी लिवर कैंसर तक बढ़ जाती है. स्टडी में योगदान देने वाले पराग राणा के अनुसार, लिवर की बीमारी एक साथ और अक्सर चुपचाप होने वाले खतरे के रूप में उभर रही है, जिसमें कई मरीजो को पहले से ही पता नहीं होता कि उन्हें कितना नुकसान हुआ है.
मुख्य रिस्क फैक्टर क्या हैं?
डॉक्टरों का कहना है कि अक्सर बिना किसी साफ लक्षण के दो-तिहाई तक डायबिटीज के मरीजों को फैटी लिवर हो सकता है. कई फैक्टर जो इसके रिस्क बढ़ाते हैं, उनमें शामिल हैं...
- मोटापा और अधिक वेट
- हाई कोलेस्ट्रॉल
- लंबे समय से डायबिटीज
- किडनी का ठीक से काम न करना
- पता लगाना एक समस्या क्यों है?
लिवर की बीमारी आमतौर पर चुपचाप होती है. शुरुआती स्टेज में, अक्सर कोई लक्षण नहीं होते, और रेगुलर ब्लड टेस्ट से फाइब्रोसिस का पता नहीं चलता है. यहीं पर फाइब्रोस्कैन काम आता है (यह एक दर्द रहित, अल्ट्रासाउंड-बेस्ड टूल है जो लिवर की अकड़न को मापता है और नुकसान का जल्दी पता लगाने में मदद करता है). यह स्टडी इस बात की जोरदार सलाह देती है कि लिवर स्क्रीनिंग को डायबिटीज केयर का रेगुलर हिस्सा बनाया जाए.
लिवर की दिक्कतों को रोकने के लिए क्या करना चाहिए
डॉक्टरों का कहना है कि जल्दी एक्शन लेने से खतरा काफी कम हो सकता है. जैसे कि...
- स्मार्ट तरीके से खाएं- फाइबर, सब्जियों और लीन प्रोटीन का सेवन बढ़ाएं
- एक्टिव रहें- रेगुलर एक्सरसाइज इंसुलिन सेंसिटिविटी को बेहतर बनाने में मदद करती है
- वजन कम करें- अपना वजन कंट्रोल में रखें. 5 से 10 परसेंट वजन कम करने से भी लिवर की दिक्कतों को रोकने में मदद मिल सकती है.
- शराब से बचें- शराब लिवर को तेजी से डैमेज करती है
- डायबिटीज को मैनेज करें- दी गई दवाएं लें और हमेशा अपने डॉक्टर से सलाह लें
- रेगुलर स्क्रीनिंग करवाएं-नियमित जांच करवाने से समस्याओं का समय पर पता चल जाता है, जिससे इलाज संभव हो पाता है.
(डिस्क्लेमर: इस वेबसाइट पर आपको प्रदान की गई सभी स्वास्थ्य जानकारी, चिकित्सा सुझाव केवल आपकी जानकारी के लिए हैं. हम यह जानकारी वैज्ञानिक अनुसंधान, अध्ययन, चिकित्सा और स्वास्थ्य पेशेवर सलाह के आधार पर प्रदान कर रहे हैं, लेकिन बेहतर होगा कि इन पर अमल करने से पहले आप अपने निजी डॉक्टर की सलाह ले लें.)

