शोले री-रिलीज: 'ठाकुर' बनना चाहते थे धर्मेंद्र, डायरेक्टर ने हेमा मालिनी पर कही थी ऐसी बात, 'वीरू' के रोल के लिए झट से मान गए थे 'ही-मैन'
साल 1975 में रिलीज हुई फिल्म शोले रमेश सिप्पी की सबसे पॉपुलर ब्लॉकबस्टर फिल्म है. आज शोले का अनकट वर्जन रिलीज हो रहा है.

By Seema Sinha
Published : December 12, 2025 at 11:45 AM IST
|Updated : December 12, 2025 at 12:29 PM IST
रमेश सिप्पी ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि अंदाज और सीता और गीता के बाद उनकी तीसरी निर्देशित फिल्म 'शोले' 50 साल बाद भी चर्चा में रहेगी. उन्होंने फिल्म को मिली जबरदस्त पॉपुलैरिटी को एक इमोशनल मोमेंट बताया है. उन्होंने कहा, 'यह पीढ़ियों से इसके अटूट प्रेम का सबूत है, हमें जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह इतनी बड़ी हिट हो जाएगी, सालों तक चलेगी और 50 साल बाद भी दर्शकों को एंटरटेन करेगी वो भी स्पेशल स्क्रीनिंग और ट्रिब्यूट कार्यक्रमों के साथ'.
ऑडियंस रिएक्शन देखना चाहते हैं डायरेक्टर ....
फिल्म शोले: द फाइनल कट आज 12 दिसंबर को थिएटर में री-रिलीज हो चुकी है, जो 1975 की ब्लॉकबस्टर एक्शन-एडवेंचर फिल्म का पूरी तरह से रिस्टोर 4K संस्करण है, जिसमें फिल्म का ओरिजिनल क्लाइमेक्स और हटाए गए दो सीन भी देखने को मिलेंगे. रमेश सिप्पी कहते हैं, 'मैं 50 साल बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया देखना चाहूंगा, कुछ महीने पहले जब मैं टोरंटो में टीआईएफएफ (टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल) में था, तो मैंने खचाखच भरे हॉल में यह फिल्म देखी थी और वे ठीक उसी तरह प्रतिक्रिया दे रहे थे, जैसे वे 50 साल पहले दे रहे थे, मैं इससे बहुत प्रभावित हुआ'.
क्यों बदलना पड़ा शोले का क्लाइमेक्स...?
हालांकि, सिप्पी ने कहा कि भारत में आपातकाल (1975) के दौरान सेंसरशिप संबंधी मुद्दों के कारण अपनी पॉपुलर फिल्म का क्लाइमेक्स बदलना उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था. उस समय केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने ओरिजिनल क्लाइमेक्स पर आपत्ति जताई थी, जिसमें पूर्व पुलिस अधिकारी 'ठाकुर बलदेव सिंह' बदले की आगे में विलेन गब्बर सिंह को अपने नुकीले जूतों से मार डालता है. सेंसर बोर्ड का कहना था कि किसी पुलिस अधिकारी को कानून अपने हाथ में लेते हुए नहीं दिखाया जाना चाहिए. फिल्म की रिलीज नजदीक होने और आपातकाल (1975-1977) के दौरान सेंसर बोर्ड के सख्त होने पर सिप्पी को मजबूरन लास्ट मोमेंट पर क्लाइमेक्स को फिर से फिल्माना पड़ा.
डायरेक्टर बोले, हां मैं नाराज था, मैं इस बदलाव से संतुष्ट नहीं था, लेकिन फिर हमने जो ऑप्शनल क्लाइमेक्स शूट किया, वह उतना बुरा भी नहीं था और अब सभी को ओरिजिनल क्लाइमेक्स के साथ फिल्म देखने का मौका मिल रहा है, ओरिजिनल क्लाइमेक्स के बिना भी, लोगों ने फिल्म को पसंद किया है, दोनों संस्करण हमेशा मौजूद रहेंगे.
वे याद करते हुए कहते हैं कि ऑप्शनल क्लाइमेक्स को फिल्माने के लिए उन्हें अभिनेता संजीव कुमार को रूस के एक फिल्म समारोह से वापस बुलाना पड़ा था, जिसमें पुलिस गब्बर को गिरफ्तार करने के लिए ठीक समय पर पहुंचती है. सिप्पी ने बताया है कि सेंसर किया हुआ एंड का सीन उस समय की कई फिल्मों में आम था, और शायद इसीलिए उन्हें यह पसंद नहीं आया, लेकिन फिल्म के 50 साल पूरे होने के मौके पर इसे देखा जा रहा है.
निर्देशक रमेश सिप्पी, 'हां, मैं बदलाव से नाराज था, लेकिन असली क्लाइमेक्स के बिना भी लोगों ने फिल्म को पसंद किया है... दोनों एडिशन हमेशा मौजूद रहेंगे'.
शोले को सलीम खान और जावेद अख्तर की दमदार जोड़ी ने मिलकर लिखा था, जिनके साथ सिप्पी का लगभग आधा दर्जन फिल्मों में 'शानदार' कनेक्शन रहा है. उन्होंने अपने दमदार किरदारों, यादगार डायलॉग्स और जादूई सिनेमैटिक सोच के कारण कई पीढ़ियों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है. इस फिल्म ने एक्शन, ड्रामा, रोमांस और कॉमेडी के मिक्सअप से बॉलीवुड में 'मसाला' जोनर की फिल्मों को बढ़ावा दिया. सिप्पी की बाद की कई फिल्में सफल और यादगार रहीं, लेकिन कोई भी शोले जैसा इतिहास नहीं दोहरा नहीं पाई.
उनकी यादगार फिल्मों में शान (1980), शक्ति (1982) और सागर (1985) जैसी हिट फिल्में शामिल हैं, लेकिन शोले की अपार सफलता के बाद, क्या सिप्पी को अपनी ही फिल्म से बनी बेहद ऊंची उम्मीदों पर खरा उतरने की बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा?
इस पर वो कहते हैं, हां, लोगों की उम्मीदें बढ़ गईं, लेकिन मैं किसी फिल्म को उसकी सफलता या असफलता के नजरिए से नहीं देखता, और शोले की अपार सफलता ने मुझे कभी बोझिल नहीं किया, मैं फिल्म इसलिए बनाता हूं, क्योंकि मुझे वह सब्जेक्ट पसंद है, हर फिल्म के साथ मैं एक नए कहानी को तलाशना चाहता हूं, यही मैंने अपनी अगली फिल्मों में भी किया, इसलिए, मैंने शोले जैसी कोई दूसरी फिल्म नहीं बनाई, क्योंकि मैं उसे दोहराना नहीं चाहता था, शान बिल्कुल अलग बैकग्राउंड पर बनी थी और शक्ति, सागर और यहां तक कि सीता और गीता और अंदाज जैसी शुरुआती फिल्में भी, सभी के कहानी और सब्जेक्ट बहुत अलग थे, मैं अलग-अलग कैटेगरी में भी बेहतरीन काम करने में सक्षम रहा हूं'.
हेमा मालिनी के लिए धर्मेंद्र को छोड़ना पड़ा गब्बर का रोल...
सिप्पी ने शोले में शानदार विकल्प चुनकर एक बड़ी सफलता हासिल की, जैसे कि उस समय स्ट्रगलिंग एक्टर अमिताभ बच्चन को जय और अमजद खान को खूंखार गब्बर सिंह की भूमिका में लेना, उन्होंने इन दोनों की क्षमता पर अपने विश्वास, सलीम-जावेद की दिलचस्प कहानी और सटीक तैयारी के दम पर यह मुकाम हासिल किया. उन्होंने धर्मेंद्र की स्टार पावर को भी बड़ी चतुराई से इस्तेमाल किया, यह कहते हुए कि अगर वह संजीव कुमार के ठाकुर की भूमिका निभाएंगे तो हेमा मालिनी संग जोड़ी नहीं बन पाएगी, और न्यूकमर को निखारकर और उन्हें फ्रीडम देकर उनसे शानदार काम करवाया. जब आप सिप्पी से पूछते हैं कि कलाकारों को एक साथ लाना कितना आसान था, क्योंकि शायद उस समय अभिनेता ए-लिस्टेड नहीं थे, तो सिप्पी पलटकर जवाब देते हैं, 'आपका क्या मतलब है, वे सबसे बड़े सितारे थे... जब मैंने शूटिंग शुरू की, तब तक मिस्टर बच्चन, जो पहले बुरे दौर से गुजर रहे थे, उनकी भी 'जंजीर' और 'दीवार' जैसी बड़ी हिट फिल्में आ चुकी थीं, ये दोनों फिल्में 'शोले' की रिलीज से पहले रिलीज हुई थीं, तो, वे सभी उस समय काफी मशहूर थे, धरम जी और हेमा जी अपने चरम पर थे... कास्टिंग बहुत अच्छी तरह से हुई थी'. आपको बता दें, गब्बर का रोल पहले डैनी डेंजोंगपा के पाले में गया था, लेकिन उन्होंने किसी कारणवश इस रोल को करने से मना कर दिया था.
सिप्पी आगे बताते हैं, 'स्क्रिप्ट बहुत ही बढ़िया थी और जब इसे सुनाया गया तो हर एक्टर को लगा था, 'वाह, यह तो बहुत अच्छा रोल है, वाह, यह भी बहुत अच्छा रोल है... धरम जी ने कहा, 'कहानी संजीव कुमार की है, और सबसे रंगीन किरदार गब्बर का है, तो क्यों न मैं बदलाव के लिए गब्बर का रोल करूं? मैंने इतनी फिल्मों में हीरो का रोल किया है, शायद मुझे विलेन का रोल करना चाहिए. मैंने धरम जी से कहा कि आप संजीव कुमार, ठाकुर का रोल करने के लिए बिल्कुल फ्री हैं, कहानी आपके इर्द-गिर्द ही घूमेगी लेकिन फिर आपको हेमा मालिनी नहीं मिलेंगी (जोर से हंसते हैं), स्क्रिप्ट सुनने वाले हर एक्टर को यही लगा कि मुझे गब्बर या संजीव कुमार का रोल करना चाहिए लेकिन आखिरकार सभी मान गए और उन्होंने अपने-अपने रोल स्वीकार कर लिए'.
मैंने धरम जी से कहा कि ठाकुर (संजीव कुमार की भूमिका) निभाने के लिए आपका हार्दिक स्वागत है, कहानी आपके इर्द-गिर्द ही घूमेगी, लेकिन फिर आपको हेमा मालिनी नहीं मिलेंगी.
सिप्पी महज 29 साल के थे, जब उन्होंने शोले की शूटिंग शुरू की, जब उनसे पूछा गया कि इतने शानदार करियर के लिए उन्हें प्रेरणा कहां से मिली, तो सिप्पी ने अपने पिता (जीपी सिप्पी) की विरासत का श्रेय देने के साथ-साथ राज कपूर का भी जिक्र किया, जिनकी फिल्मों से उन्होंने फिल्म मेकिंग के बारे में बहुत कुछ सीखा, लेकिन मैं दूसरा राज कपूर नहीं बनना चाहता था और इस बात पर जोर देते हैं कि वे उस महान अभिनेता-निर्देशक की नकल करने के बजाय एक निर्देशक के रूप में अपना अलग रास्ता बनाना चाहते थे.
'मुझे पश्चिम और भारत दोनों के सिनेमा के दिग्गजों से लगाव था, चाहे वह डॉ. जीवागो हो या गॉन विद द विंड... ये सभी फिल्में मुझे एंटरटेन कर देती थी और मैं मुगल-ए-आजम, मदर इंडिया, गंगा जमुना, जिस देश में गंगा बहती है... सुनील दत्त की कई फिल्में, धरम जी की मेरा गांव मेरा देश और फिर राज कपूर की आग, आवारा, बूट पॉलिश, संगम, प्रेम रोग देखकर में रोमांचित हो जाता था'.
शोले का रीमेक......?
सिप्पी अक्सर कहते रहे हैं कि उनका अपनी मशहूर फिल्म शोले का रीमेक बनाने या सीक्वल बनाने का कोई इरादा नहीं है. उनका मानना है कि कुछ क्लासिक फिल्मों को वैसे ही छोड़ देना चाहिए. इसलिए जब राम गोपाल वर्मा ने रीमेक के लिए उनसे संपर्क किया, तो सिप्पी राजी हुए नहीं थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उन्होंने 'बहुत ही विनम्रता से उन्हें मना कर दिया था'. राम गोपाल वर्मा की 'आग' नाम से बनी यह रीमेक फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हुई और बॉक्स ऑफिस पर असफल रही. सिप्पी आमतौर पर वर्मा के इस खास वर्जन फिल्मों पर चुप रहे हैं, लेकिन उन्होंने संकेत दिया है कि इतनी मशहूर फिल्म का रीमेक बनाना 'समझदारी नहीं' होगी.

