'सतलुज' देख दहल उठा है दिल?, पुलिस की हैवानियत का पर्दाफाश करती हैं ये 7 फिल्में, एक भी देख ली तो कांप उठेगी रूह
इंडियन सिनेमा में बनी ये फिल्में, पुलिस कस्टडी में निर्दोष पर पुलिस के क्रूर अत्याचार की पोल खोलती हैं.

By ETV Bharat Entertainment Team
Published : July 9, 2026 at 12:53 PM IST
हैदराबाद: पंजाबी स्टार दिलजीत दोसांझ की बहुचर्चित फिल्म 'सतलुज' की सत्य घटना पर आधारित कहानी ने दर्शकों को हिलाकर रख दिया है. फिल्म के अंदर पुलिस की बर्बरता को खुलकर दिखाया गया है. फिल्म के शुरुआती सीन ही दर्शकों की रूह कंपाने का काम रही है. एक सीन में जब एक पुलिस अधिकारी अपने साथी से पूछता है, 'कितने बाकी हैं? जवाब में एक संख्या आती है. तीन? पांच? यह संख्या मुश्किल से ही समझ में आती है. कुछ ही पल पहले निहत्थे लोगों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई गई थीं. अब गिनती लोगों की नहीं, बल्कि इस बात की है कि मैगजीन खाली होने से पहले कितने बचे हैं.
सतलुज पुलिस अपने पुलिसकर्मियों को मूंछें घुमाने वाले खलनायकों के रूप में पेश करने से इनकार करती है. यही बात उन्हें खौफनाक बनाती है. उनकी क्रूरता एक सिस्टेमैटिक प्रोसेस है. लोगों का गायब होना, हिरासत में यातना देना, गैर-न्यायिक हत्याएं और अवैध दाह संस्कार करना पुलिस का रोज का काम माना जाने लगा. मानव जीवन को फाइलों, आंकड़ों और मिटाए जाने वाली समस्याओं में तब्दील कर दिया गया.
न क्रोध है, न उन्माद, न ही घृणा. बस अंतरात्मा का एक विचलित कर देने वाला अभाव है. निर्दोष लोग दया की भीख मांगते हैं, लेकिन उनकी गुहार गोलियों की आवाज में दब जाती है. अधिकारी जरा भी नहीं हिचके. वे जरा भी संकोच नहीं किए. कैमरा भावहीन चेहरों पर ठहर जाता है, जो मानो जैसे रोज के रूटीन की तरह फांसी दे रहे हैं. हिंसा निरंतर है, लेकिन फिल्म का सबसे बड़ा खौफनाक पहलू क्रूरता को एक कमी के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी सिस्टम के रूप में दिखाना है जो ठीक उसी तरह काम कर रही है जैसा कि उसे बनाया गया था.
सतलुज की कहानी?
निर्देशक हनी त्रेहान की फिल्म सतलुज, जिसमें दिलजीत दोसांझ लीड रोल में हैं. फिल्म तीन से चार साल तक सेंसर बोर्ड में अटकी रही और अंत में ZEE5 पर रिलीज हुई. सिनेमाघरों में रिलीज न होने के बावजूद फिल्म खूब पॉपुलर हो रही है. यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा (दिलजीत दोसांझ का रोल) की कहानी है, जो एक बैंक कर्मचारी है और उग्रवाद के दौर में पंजाब भर में अज्ञात शवों के दाह संस्कार में संदिग्ध बढ़ती संख्या की जांच शुरू करता है.
जो खुलासा उन्होंने किया है वह चौंकाने वाला है. अनुमानित 25,000 लोगों को "लावारिस" मानकर जला दिया गया, जबकि उनके परिवार अभी भी उनकी तलाश कर रहे थे, यह कथित फर्जी मुठभेड़ों और आतंकवाद विरोधी अभियानों की आड़ में की गई हिरासत में हत्याओं का परिणाम था.
सतलुज उन लेटेस्ट फिल्मों में से एक है, जो राज्य की क्रूरता का सीधे तौर पर सामना करती है, और यह भारतीय सिनेमा की उस परंपरा में शामिल होती है जिसने पुलिस की ज्यादतियों, हिरासत में हिंसा और बेलगाम सत्ता की विनाशकारी मानवीय कीमत को सामने लाया है. ऐसे में हम बात करेंगे इंडियन फिल्मों की जिसमें पुलिस के अत्याचार की कहानी को दिखा गया है.
विसारनाई (2016) - तमिल
निर्देशक वेट्री मारन की फिल्म 'विसारनाई' ने एम. चंद्रकुमार के ऑटोबायोग्राफी 'लॉक अप' पर आधारित फिल्म 'विसारनाई' बनाई, जो आंध्र प्रदेश के गुंटूर में काम करने वाले चार तमिल प्रवासी मजदूरों की कहानी है, जिन्हें एक डकैती के मामले को सुलझाने के लिए स्थानीय पुलिस सड़क से उठा ले जाती है.
तेरह दिनों तक उन्हें लाठियों, बूटों और केले के डंठलों से पीटा जाता है. यातनाएं लगातार जारी रहती हैं और आखिर में वे एक ऐसे अपराध को कबूल कर लेते हैं जो उन्होंने कभी किया ही नहीं था, सिर्फ इसलिए कि यह सब रुक जाए. दूसरे भाग में, कहानी तमिलनाडु की ओर मुड़ जाती है, जहां वही लोग पुलिस भ्रष्टाचार के एक अलग और बड़े जाल में फंस जाते हैं. इस बार बचने की संभावना और भी कम होती है. फिल्म गोलियों की आवाज और अंधेरे में समाप्त होती है, जिसमें मौतों को छुपा दिया जाता है और प्रेस के लिए एक साहसी मुठभेड़ के रूप में पेश किया जाता है. निर्देशक वेत्री मारन ने इस फिल्म के लिए तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीते और यह 2016 में ऑस्कर के लिए भारत की ऑफिशियल एंट्री बनी थी.
जय भीम (2021) – तमिल
1993 में वकील के. चंद्रू (जो बाद में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बने) ने एक ऐसा केस लड़ा, जिस पर आधारित फिल्म जय भीम बनी. इरुला जनजाति की महिला सेंगेनी (लिजोमोल जोस) की कहानी है, जिसके पति राजकन्नू (मणिकंदन) को एक उच्च जाति के घर से सांप हटाने के लिए बुलाए जाने के बाद चोरी के संदेह में गिरफ्तार कर लिया जाता है. राजकन्नू और उसके रिश्तेदारों को हिरासत में लिया जाता है और जबरन कबूलनामा निकलवाने के लिए कई दिनों तक यातनाएं दी जाती हैं. बाद में खबर आती है कि वह हिरासत से 'भाग निकला' है.
गर्भवती और अकेली सेंगेनी, वकील चंद्रू (सूर्या) की मदद से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करवाती है. जांच में पता चलता है कि राजकन्नू भागा नहीं था, बल्कि यातना के दौरान लगी चोटों से लॉक-अप में ही उसकी मौत हो गई थी और पुलिस ने उसकी मौत को सड़क दुर्घटना का रूप देने की साजिश रची थी. फिल्म के सबसे भयावह दृश्यों में से एक में, बेहोश पुरुषों की आंखों में मिर्च पाउडर छिड़का जाता है ताकि यह जांचा जा सके कि वे अभी भी जीवित हैं या नहीं. जय भीम में हिंसा जाति से जुड़ी हुई है. पुलिस बेखौफ होकर इसलिए कार्रवाई करती है, क्योंकि राजकन्नू के समुदाय के पास न तो राजनीतिक प्रभाव है, न पैसा और न ही कोई आवाज.
कर्णन (2021) – तमिल
1995 में तमिलनाडु के एक दलित गांव में पुलिस की प्लानिंग हिंसा की घटना से प्रेरित, निर्देशक मारी सेल्वराज की फिल्म 'कर्णन 'बनी, जिसमें धनुष लीड रोल में नजर आए. फिल्म की कहानी काल्पनिक गांव पोडियानकुलम में घटित होती है. यह एक दलित समुदाय है, जिसे बस स्टॉप तक नहीं मिलता, जिसके कारण वहां के लोगों को पड़ोसी उच्च जाति के गांव के स्टॉप का उपयोग करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जहां उन्हें अक्सर अपमानित किया जाता है. जब युवा और उत्साही कर्णन (धनुष) अपने गांव को कई अन्यायों के खिलाफ एकजुट करता है, तो आईपीएस अधिकारी एसपी कन्नाबिरन, (जो जाति व्यवस्था को स्वाभाविक और सही मानते हैं), उन्हें सबक सिखाने का फैसला करते हैं.
वह विवाद सुलझाने के बहाने गांव के बुजुर्गों को पुलिस स्टेशन बुलाता है, फिर उन्हें एक घंटे तक पीटता है और रात भर के लिए बंद कर देता है. जब विवाद बढ़ जाता है, तो पुलिस भारी संख्या में गांव पर छापा मारती है और सामने दिखने वाले हर व्यक्ति को पीटती है, किसी को नहीं छोड़ती. आने वाले सालों में अधिकांश बुजुर्ग ग्राम प्रधान अपनी चोटों के कारण दम तोड़ देते हैं.
नयट्टू (2021) – मलयालम
सिविल पुलिस अधिकारी शाही कबीर लिखित और निर्देशक मार्टिन प्राकट की फिल्म 'नयट्टू' भी पुलिस की बर्बरता की कहानी को बयां करती है. तीन पुलिस अधिकारी, सीपीओ प्रवीण (कुंचाको बोबन), सब-इंस्पेक्टर मनियन (जोजू जॉर्ज) और कांस्टेबल सुनीता (निमिषा सजययन), एक दलित संगठन से जुड़े स्थानीय राजनीतिक गुंडे से भिड़ जाते हैं. गुंडे की कुछ ही समय बाद एक दुर्घटना में मौत हो जाती है. चुनाव नजदीक आने और मुख्यमंत्री को समुदाय के समर्थन की जरूरत होने के कारण, तीनों अधिकारियों को हत्या के आरोप में फंसाने के लिए राजनीतिक दबाव बढ़ता है.
वे भाग जाते हैं. कहानी में जो कुछ सामने आता है, वह इस बात को रोमांचक बनाता है कि कैसे वही सिस्टम जो आम लोगों के खिलाफ क्रूरता को जन्म देता है, उतनी ही तेजी से अपनों को भी निगल सकती है. तीनों अधिकारी निर्दोष नहीं हैं, वे उस सिस्टम के भागीदार हैं, जिससे वे अब भाग रहे हैं और नायट्टू इस बेचैनी को बिना सुलझाए ही फिल्म में बनाए रखती हैं. फिल्म में सबसे परेशान करने वाली बात हिंसा नहीं, बल्कि वह स्पीड है, जिससे सत्ता को एक अलग कहानी की जरूरत पड़ने पर घटना की सच्चाई को दफना दिया जाता है.
संतोष (2024) – हिंदी
यह एक ब्रिटिश-भारतीय प्रोडक्शन फिल्म है, जिसे भारतीय सेंसर बोर्ड ने बिना किसी काट-छांट के सिनेमाघरों में रिलीज करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था और फिल्म मेकर्स ने भी काट-छांट करने से मना कर दिया था. निर्देशक संध्या सूरी की फिल्म संतोष एक युवा विधवा (शहाना गोस्वामी) की कहानी है, जिसे उत्तरी भारत के ग्रामीण इलाके में सरकारी अनुकंपा नियुक्ति योजना के तहत अपने दिवंगत पति की पुलिस कांस्टेबल की नौकरी विरासत में मिलती है. जब एक निम्न जाति की लड़की के साथ बलात्कार और हत्या कर दी जाती है, तो संतोष इंस्पेक्टर शर्मा (सुनीता राजवार) के मार्गदर्शन में जांच में जुट जाती है.
यह फिल्म चुपचाप और बिना किसी ड्रामे के यह पर्दाफाश करती है कि किस प्रकार जातिवाद और इस्लामोफोबिया पुलिस के मामले से निपटने के तरीके में गहराई से समाए हुए हैं. किसकी जांच की जाती है, किसे संरक्षण दिया जाता है, और किसकी जान को उचित ठहराया जाता है? फिल्म के सबसे डरावने सीन में से एक में, संतोष खुद, अपनी सहनशक्ति की सीमा से परे जाकर, उसी क्रूरता में शामिल हो जाती है, जिसे वह देखती आ रही थी. संध्या सूरी को किसी एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी में दिलचस्पी नहीं है, बल्कि उन्हें इस बात में दिलचस्पी है कि जब प्रीडिक्शन पूरी तरह से जड़ जमा लेता है, तो पूरा सिस्टम क्या परिणाम देता है.
माई घाट: अपराध संख्या 103/2005 (2019) - मराठी
इस लिस्ट सबसे खामोश लेकिन दिल दहला देने वाली फिल्म माई घाट भी है. यह फिल्म तिरुवनंतपुरम की धोबिन प्रभावती अम्मा की सच्ची कहानी पर आधारित है, जिनके बेटे उदयकुमार को एक दोस्त के साथ पार्क से पुलिस ने उठा लिया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने 4,200 रुपये चुराए थे, जो वास्तव में उनकी मां की कपड़े धोने से जमा की गई बचत थी. हिरासत में उन्हें यातनाएं देकर मार डाला गया.
अनंत महादेवन के निर्देशन में बनी फिल्म 'माई घाट' में प्रभावाती (उषा जाधव) के तेरह साल के कानूनी संघर्ष को दिखाया गया है. गवाह मुकरते हैं, मामले खारिज होते हैं, अपीलें और याचिकाएं दायर होती हैं , जब तक कि सीबीआई की एक विशेष अदालत दोषी पुलिसकर्मियों को मौत की सजा नहीं सुना देती, जो भारत में एक ऐतिहासिक घटना है. महादेवन यातना को पर्दे पर नहीं दिखाते. वे इसके बाद के परिणामों को ही सब कुछ बयां करते हैं. एक मां की चुप्पी, घाट पर जीवन भर दूसरों के कपड़े धोने का काम, तेरह साल की लड़ाई की कीमत, जिसने उसे फैसला तो लौटा दिया लेकिन उसका बेटा नहीं. यह फिल्म हिरासत में हुई हिंसा का पीछे छूट गए लोगों पर पड़ने वाले असर को दर्शाती है, और इस घटना को सीधे न दिखाने के कारण इसका प्रभाव और भी गहरा होता है.
आर्टिकल 15 (2019)- बॉलीवुड
आखिर में, बात करेंगे 2014 में उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुए सामूहिक बलात्कार कांड से प्रेरित फिल्म आर्टिकल 15 की, जिसमें दो दलित लड़कियों को बलात्कार के बाद पेड़ से लटका दिया गया था. निर्देशक अनुभव सिन्हा की फिल्म 'आर्टिकल 15 ' उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में तैनात आईपीएस अधिकारी अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) की कहानी है, जो तीन दलित लड़कियों की हत्या की जांच करता है. यहां क्रूरता जेल में नहीं, बल्कि सिस्टम में है. बलात्कार और हत्या के दोषियों में से एक पुलिस कांस्टेबल निकलता है. दबाव में आकर फोरेंसिक स्पेशलिस्ट अपनी असल रिपोर्ट को दबा देती है और झूठी रिपोर्ट दाखिल करती है. स्थानीय अधिकारी मामले को ऑनर किलिंग बताकर दबाने की कोशिश में लगे रहते हैं.
एक फैक्ट्री मालिक बड़ी सहजता से स्वीकार करता है कि उसने तीन रुपये वेतन वृद्धि की मांग करने पर लड़कियों की पिटाई की थी और थाने में किसी को भी इसमें कुछ भी रिपोर्ट करने लायक नहीं दिखता. अयान का सामना कुछ भ्रष्ट व्यक्तियों से नहीं, बल्कि एक ऐसे पुलिस फोर्स से है, जिसे कभी दलितों के जीवन को सुरक्षा के योग्य नहीं समझा गया, और उसने अपने सारे दस्तावेज उसी के अनुसार तैयार कर रखे हैं.
अनुभव सिन्हा सीधे तौर पर उस मुद्दे को उठाते हैं, जिस पर वे निशाना साध रहे हैं संविधान का अनुच्छेद 15, जो जाति के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, स्टेशन के बुलेटिन बोर्ड पर एक चार्ज के रूप में चिपकाया जाता है. यह उन कुछ मुख्यधारा की हिंदी फिल्मों में से एक है, जो जाति को कहानी के सेंटच में इतनी सीधे और निडरता से रखती है.

