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मकरंद देशपांडे बोले, 'नाटक में कलाकार के भाव नजर आते हैं, फिल्मों में भावों को तैयार किया जाता है'

अभिनेता मकरंद देशपांडे का कहना है कि अगर कभी मौका मिला, तो राक्षस या संत का रोल करना चाहते हैं.

Cine Actor Makarand Deshpande
सिने अभिनेता मकरंद देशपांडे (ETV Bharat Bikaner)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : February 27, 2026 at 6:13 PM IST

3 Min Read
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बीकानेर: 'सत्या', 'कंपनी', 'मकड़ी' जैसी हिंदी फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिका में नजर आए सिने अभिनेता मकरंद देशपांडे बीकानेर थिएटर फेस्टिवल में शामिल हुए. इस दौरान उन्होंने कहा कि रंगमंच मेरे लिए एक सांस की तरह है. जिस तरह से जीवन जीने के लिए सांस लेना जरूरी है, मेरे लिए रंगमंच हर एक सांस में है.

बीकानेर थिएटर फेस्टिवल में अपने नाटक 'पियक्कड़' का मंचन करने के लिए आए मकरंद देशपांडे ने ईटीवी भारत से खास बातचीत में कहा कि भले ही फिल्मी दुनिया में व्यवस्था हो, लेकिन आज भी नाटक प्राथमिकता में रहता है. बड़े पर्दे के मुकाबले नाटकों के वजूद के सवाल पर उन्होंने कहा कि नाटक एक जीवंत कला है. फिल्म में आपको सब कुछ सेट करके दिया जाता है. उन्होंने कहा कि नाटक में आपके भाव नजर आते हैं और फिल्मों में उन भावों को तैयार किया जाता है. यही फर्क है. नाटक जीवन होने के साथ ही मेडिटेशन और अध्यात्म है. नाटक और फिल्म की कोई स्पर्धा नहीं हो सकती.

नाटक और फिल्म के अंतर पर बोले मकरंद देशपांडे, देखें वीडियो (ETV Bharat Bikaner)

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'मुझे खुशी है कि किसी फ्रेम में नहीं': फिल्मी दुनिया में अभिनेताओं की भूमिका के अनुसार उनका चित्रण होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह सही है कि जो विलेन का रोल करता है, उसको उस नजर से देखा जाता है. जो कॉमिक रोल करता है, उसको उसी नजर से देखा जाता है. लेकिन यह हमारे ऊपर निर्भर करता है. मैं कैरक्टर आर्टिस्ट नहीं हूं. यह खुद को ही बताना पड़ता है. हर भूमिका के अनुसार खुद को ढालना जरूरी है.

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'राक्षस या संत का रोल करना चाहता हूं': फिल्मी दुनिया में आने वाले कलाकारों के बिना नाटक प्रशिक्षण के ही बॉलीवुड में एंट्री के सवाल पर उन्होंने कहा कि जो लोग नाटक नहीं करते हैं, वह डरते हैं. वे पैसे को महत्व देते हैं. 1990 से थिएटर आर्टिस्ट के रूप में काम कर रहे मकरंद ने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन आज भी किसी भूमिका को नहीं करने की कसक के सवाल पर उन्होंने कहा कि भविष्य में मौका मिला, तो मैं किसी राक्षस या संत की भूमिका करना चाहता हूं.

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'कंट्रोवर्सी में विश्वास नहीं': आजकल फिल्मों की रिलीज होने से पहले कंट्रोवर्सी होने के प्रचलन के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह नहीं होना चाहिए. मैं इसमें विश्वास नहीं करता, क्योंकि कथानक में अगर दम नहीं है, तो कंट्रोवर्सी के जरिए चर्चा कर मार्केटिंग करवाने का प्रयास होता है. लेकिन कथानक अच्छा है, तो फिर किसी भी तरह की कोई भी कंट्रोवर्सी मार्केटिंग की जरूरत नहीं है.