लगान के 25 साल: ढाई दशक बाद भी लोगों के दिलों में क्यों जिंदा है आमिर खान की ब्लॉकबस्टर फिल्म, मेकर्स ने बताई मेकिंग की कहानी
आशुतोष गोवारिकर की लगान को 2002 में ऑस्कर अवार्ड्स में बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज कैटेगरी में नॉमिनेशन मिला था.

By Seema Sinha
Published : June 15, 2026 at 11:38 AM IST
आशुतोष गोवारिकर और आमिर खान की स्पोर्ट्स म्यूजिकल फिल्म लगान: वन्स अपॉन अ टाइम इन इंडिया ने आज 15 जून को अपनी रिलीज के ढाई दशक यानी 25 साल पूरे कर लिए हैं. लगान भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक अचीवमेंट है, जिसने लोगों में देशभक्ति और मानवीय भावना को पैदा किया और सिनेमा में एक नई लहर पैदा की थी.
सन् 1893 के समय पर बेस्ड फिल्म एक जुझारू ग्रामीण किसान भुवन की कहानी है, जो ब्रिटिश शासन के भारी करों से बचने के लिए उनके खिलाफ एक बड़ा क्रिकेट मैच फिक्स कर गांव का सब कुछ दांव पर लगा देता है. फिल्म की रोमांचक कहानी, संघर्षरत किरदार की दिल छू लेने वाली कहानी और एआर रहमान का संगीत आज भी दर्शकों को अपने सुर में पिरोने का काम करता है.
आमिर खान ने लगान पर कहा, 'मेरे चाचा (और फिल्म निर्माता) नासिर हुसैन कहा करते थे, महान फिल्में बनाई नहीं जातीं, ये बस हो जाती हैं और अगर कोई आपसे इसे दोबारा बनाने को कहे, तो आप इसे उसी तरह नहीं बना पाएंगे. मैं पूरी ईमानदारी और विश्वास के साथ कह सकता हूं कि फिल्म से जुड़े हर व्यक्ति... हर अभिनेता, हर तकनीशियन, क्रू ने अपने काम में दिल से योगदान दिया है.
आमिर खान आगे कहते हैं कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत में निर्माता बनने से साफ इनकार कर दिया था, क्योंकि उन्होंने अपने पिता, ताहिर हुसैन को आर्थिक कठिनाइयों, दिवालियापन और भारी कर्ज का सामना करते देखा था. आखिरकार उन्होंने अपनी झिझक को दूर करते हुए 'लगान' का निर्माण किया ताकि इस भ्रम से बाहर निकला जा सके और उनका प्रोडक्शन हाउस की डेब्यू फिल्म ने उन्हें रातो-रात मालामाल कर दिया.
मिस्टर परफेक्शनिस्ट ने आगे कहा, 'मैंने हमेशा वादा किया था कि मैं कभी फिल्म प्रोड्यूस नहीं करूंगा... पहले भी मैंने साफ तौर पर कहा था कि मैं कभी प्रोड्यूस नहीं करूंगा. फिर मुझे एहसास हुआ कि कभी भी 'कभी नहीं' नहीं कहना चाहिए और 'लगान' की वजह से ही 'आमिर खान प्रोडक्शंस' खड़ा हुआ था. यह इसलिए हुआ क्योंकि आशु (गोवारिकर) मेरे पास स्क्रिप्ट लेकर आए जो मुझे बहुत पसंद आई और यहीं से इसकी शुरुआत हुई.
अभिनेता-लेखक अमीन हाजी, जिन्होंने मूक मंदिर ढोल वादक बाघा का किरदार निभाया, कहते हैं कि अपने रोल को रियल बनाने के लिए, उन्होंने एक संगीत बैंड और उन लोगों से सलाह ली थी जिनके परिवार में मूक सदस्य थे, ताकि उनके हाव-भाव को जान सकें.
हाजी ने बताया, 'इस किरदार को निभाना एक शानदार अनुभव था. मुझे बिना एक शब्द बोले ही अपनी बात कहनी थी. इसने मुझे अपने भीतर गहराई से उतरने का मौका दिया और आशुतोष और आमिर ने अपने अनुभव से मुझे गाइड किया. मूक-बधिर लोगों को हर दिन कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. कम्यूनिकेशन प्रॉब्लम्स, सामाजिक अलगाव और आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए, मैंने रियल बनने की कोशिश की. आज भी मूक-बधिर बच्चों वाले कई संस्थान मुझसे संपर्क करते हैं और मैं उनके संस्थानों में जाकर उनकी कहानी सुनाता हूं, यहां तक कि मैं अपने द्वारा निर्देशित शॉर्ट फिल्मों के माध्यम से उन्हें अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड भी करता हूं'.
दया शंकर पांडे, जिन्होंने फिल्म में धनी किसान और टीम के लीड तेज गेंदबाज 'गोली' का किरदार निभाया था, अपनी स्पेशल आर्म-स्विंगिंग बॉलिंग एक्शन के लिए फेमस हुए. उनकी इस अनोखी गेंदबाजी शैली में गेंद छोड़ने से पहले उन्हें अपनी बाहों को कई बार घुमाना पड़ता था, जिसके लिए उन्होंने गोवारिकर के साथ महीनों अभ्यास किया था ताकि यह पर्दे पर बिल्कुल असली लगे.
पांडे का बॉलिंग एक्शन इतना अनोखा निकला कि फिल्म की रिलीज के महीनों बाद, क्रिकेटर सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग (जो असल जिंदगी में लगान चैरिटी मैच में अंपायर थे) ने पांडे से इसे करके दिखाने के लिए कहा. जबकि यह दोनों दिग्गज क्रिकेटर इसे कंप्यूटर ग्राफिक्स मान रहे थे.
पांडे ने बताया, 'सौरव गांगुली को मेरी गेंदबाजी पर शक था क्योंकि उन्होंने कभी किसी को उस तरह गेंदबाजी करते नहीं देखा था जैसे मैं कर रहा था. उन्होंने मुझसे गेंदबाजी का तरीका दोबारा दिखाने को कहा. आमिर भी वहीं खड़े थे. मैंने दिखाया. वह दंग रह गए. अगर हम ये हरकतें हाथ से करें तो दर्दनाक होगा, लेकिन आशुतोष ने स्क्रिप्ट में लिखा था और उन्होंने ही मुझे बताया था कि मुझे कैसे गेंदबाजी करनी चाहिए. सचिन तेंदुलकर, गांगुली और पूरी टीम फिल्म रिलीज के दौरान देखने आए थे.
आमिर खान ने एक बार खुलासा किया था कि क्योंकि लगान बतौर निर्माता उनकी पहली फिल्म थी, इसलिए वे फिल्म के लिए 'अभिनय की तैयारी नहीं कर पाए' निर्माता के रूप में अपनी भूमिका निभाने के अनुभव ने उनके अभिनय पर कैसे असर डाला, इस बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा था, 'मुझे लगता है कि लगान में तैयारी की कमी का कारण मैं ईमानदारी से निर्माता के रूप में अपने काम को ही मानता हूं. मैं इस बात पर ज्यादा ध्यान दे रहा था कि कुछ भी गलत न हो. इसलिए, लगान शायद मेरा सबसे कम तैयारी वाला प्रदर्शन है.
एक्टर ने यह भी बताया था कि शुरुआत में उन्हें फिल्म को लेकर कुछ संदेह थे. उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा था, 'आशु (आशुतोष गोवारिकर) ने इससे पहले दो फिल्में (पहला नशा और बाजी) डायरेक्ट की थीं, जो इतनी सफल नहीं रहीं. इसलिए, हालांकि मुझे उन पर, उनकी कहानी और उनकी क्षमता पर भरोसा था, इसीलिए मैं आगे बढ़ रहा था, पर कहीं पर एक डर भी लगता है कि, यह बेइज्जती उठाकर हमने कोई गलती तो नहीं की'.
लेकिन लगान एक ऐतिहासिक फिल्म साबित हुई, जिसे भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक माना जाता है. 2002 में अकादमी पुरस्कारों में इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म के लिए नॉमिनेशन मिला था और भारत में इसने आठ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते, जिसमें बेस्ट कोरियोग्राफी, बेस्ट पॉपुलर फिल्म, बेस्ट म्यूजिक, सर्वश्रेष्ठ सिंगर (पुरुष), बेस्ट ऑडियोग्राफी, बेस्ट गीतकार, बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन और बेस्ट आर्ट डायरेक्शन शामिल है.
लगान की पहली स्क्रीनिंग को याद करते हुए आमिर खान ने कहा, 'फिल्म बनाते समय, मेरे साथ बैठकर बातें करने वाले कई ग्रामीणों को चिंता होती थी कि क्या उन्हें फिल्म देखने का मौका मिलेगा, क्योंकि वहां कोई सिनेमाघर नहीं थे. वहां बहुत सी महिलाएं और लड़कियां घूंघट में थीं. मैंने उनसे वादा किया था कि लगान की पहली पब्लिक स्क्रीनिंग कच्छ (गुजरात) में होगी, और जब हम सब मिलकर फिल्म देख लेंगे, तभी बाकी लोग इसे देख पाएंगे. उन्हें मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ. फिल्म रिलीज होने से दो-तीन हफ्ते पहले, हममें से कई लोग प्रिंट लेकर भुज गए और वहां एक सिनेमाघर बुक किया. कच्छ के सभी लोग वहां पहुंचे और यहीं लगान की पहली स्क्रीनिंग थी. यहां तक कि ब्रिटिश कलाकार भी स्क्रीनिंग के लिए आए थे तो, पहली स्क्रीनिंग भुज में हुई और फिर हम मुंबई लौट आए और यहां अपनी स्क्रीनिंग की'.
ये भी पढ़ें:

