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बड़ा झटका: अमेरिका में 50% तक घटी साइंस फंडिंग, भारतीय शोधकर्ताओं के लिए बंद हो रहे हैं यूनिवर्सिटी के दरवाजे
अमेरिका में ₹2.5 लाख करोड़ की रिसर्च फंडिंग कटने वाली है, इसका सबसे बुरा असर भारतीय PhD छात्रों पर पड़ रहा है.

Published : January 31, 2026 at 11:59 AM IST
|Updated : January 31, 2026 at 12:44 PM IST
हैदराबाद: अमेरिका में विज्ञान और शोध फंडिंग में संभावित कटौती को लेकर चल रही बहस का असर अब वैश्विक स्तर पर दिखने लगा है. खास तौर पर भारतीय शोधकर्ता और छात्र, जो अमेरिका के STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित) क्षेत्र का अहम हिस्सा हैं, इस अनिश्चितता से प्रभावित हो रहे हैं. ऐसे समय में जब भारत में आगामी बजट पर चर्चा चल रही है, अमेरिका में फंडिंग को लेकर उठे सवालों ने भारतीय छात्रों की विदेश में रिसर्च योजनाओं को लेकर चिंता बढ़ा दी है.
अमेरिकी फंडिंग में प्रस्तावित कटौती
ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका की प्रमुख शोध एजेंसियों के बजट में बड़ी कटौती का प्रस्ताव रखा है. इसके तहत नेशनल साइंस फाउंडेशन (NSF) की फंडिंग में 50% से अधिक, नासा के साइंस बजट में 47% और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के बजट में करीब 40% कटौती की बात कही गई है. कुल मिलाकर यह कटौती लगभग 30 अरब डॉलर ( करीब ₹2.5 लाख करोड़) तक हो सकती है. इन प्रस्तावों ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों और रिसर्च लैब्स को सतर्क कर दिया है.
भारतीय शोधार्थियों पर सीधा असर
स्टडी अब्रॉड कंसल्टेंट्स के अनुसार, इस अनिश्चितता का सबसे ज्यादा असर भारतीय पीएचडी छात्रों, पोस्टडॉक्टरल रिसर्चर्स और शुरुआती करियर के वैज्ञानिकों पर पड़ रहा है. फॉरेनएडमिट्स के संस्थापक निखिल जैन के मुताबिक, कई अमेरिकी प्रोफेसर और रिसर्च लीडर नई भर्तियों को रोक रहे हैं और पीएचडी ऑफर देने में देरी कर रहे हैं. इससे भारतीय छात्रों को लंबे इंतजार और अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है.
रिसर्च-आधारित पीएचडी सबसे ज्यादा प्रभावित
विशेषज्ञों का मानना है कि असर पूरे सिस्टम पर नहीं, बल्कि मुख्य रूप से रिसर्च-आधारित पीएचडी प्रोग्राम्स पर है. अपग्रेड स्टडी अब्रॉड के प्रणीट सिंह के अनुसार, हर साल अमेरिका जाने वाले करीब 1.8 लाख भारतीय छात्रों में से लगभग 18–20 हजार ही पीएचडी करते हैं. इसलिए संवेदनशीलता इन्हीं फंडेड रिसर्च प्रोग्राम्स में ज्यादा है, जबकि कोर्सवर्क आधारित मास्टर्स प्रोग्राम्स अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं.
लैब-आधारित विषयों में जोखिम अधिक
एमएसएम यूनिफाई के संस्थापक संजय लाउल का कहना है कि भारतीय छात्र आमतौर पर फंडेड रिसर्च के लिए ही अमेरिका जाते हैं. बायोलॉजिकल साइंस, क्लाइमेट, एनर्जी, मटेरियल साइंस जैसे लैब-आधारित विषयों में स्टाइपेंड और सैलरी सीधे सरकारी ग्रांट पर निर्भर होती है. ऐसे में फंडिंग में थोड़ी सी कटौती भी पीएचडी सीटें घटाने और रिसर्च असिस्टेंटशिप टालने का कारण बन जाती है.
ऑफर्स में गिरावट की आशंका
अनुमानों के अनुसार, अगर यह अनिश्चितता बनी रहती है तो भारतीय छात्रों को मिलने वाले फुली-फंडेड ऑफर्स में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है. खासकर नए पीएचडी छात्रों और आने वाले पोस्टडॉक्टरल शोधकर्ताओं पर इसका असर ज्यादा होगा. हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे सीमित गिरावट मानते हैं, न कि पूरी तरह से एडमिशन में गिरावट.
छात्र बदल रहे हैं रणनीति
इस स्थिति को देखते हुए भारतीय छात्र अब विकल्प तलाश रहे हैं. कई छात्र अमेरिका के साथ-साथ जर्मनी, नीदरलैंड्स, ब्रिटेन, कनाडा और जापान जैसे देशों में भी आवेदन कर रहे हैं. कुछ छात्र फंडिंग स्पष्ट होने तक निर्णय टाल रहे हैं, जबकि कुछ लोग इंडस्ट्री-फोकस्ड या कोर्सवर्क आधारित प्रोग्राम्स की ओर रुख कर रहे हैं.
भविष्य को लेकर संतुलित नजरिया
कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि घबराने की जरूरत नहीं है. द इकोनॉमिक टाइम्स को दिए बयान में आईडीपी एजुकेशन के पियूष कुमार ने बताया कि, अमेरिकी कांग्रेस अक्सर ऐसे मामलों में संतुलन बनाती है और बड़े विश्वविद्यालय फंडिंग की कमी को अन्य स्रोतों से पूरा कर लेते हैं. वही, करियर मोज़ेक की मनीषा ज़ावेरी का कहना है कि अमेरिका की मजबूत इंडस्ट्री कनेक्टिविटी और निजी निवेश उसे अब भी शोध के लिए आकर्षक बनाए रखते हैं. कुल मिलाकर, अमेरिकी फंडिंग को लेकर अनिश्चितता ने भारतीय शोधकर्ताओं की योजनाओं पर असर जरूर डाला है, लेकिन अमेरिका का मजबूत रिसर्च इकोसिस्टम फिलहाल पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ा है.

