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भारत की स्कूली शिक्षा में सुधार तो हुआ, लेकिन... जानें क्या कहता है UDISE प्लस की रिपोर्ट

2022 से 2023 से शिक्षकों की संख्या 8.3 प्रतिशत बढ़कर 1.02 करोड़ से ज्यादा हो गई है. सुरभि गुप्ता की रिपोर्ट.

India's school education improves
प्रतीकात्मक तस्वीर (AFP)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : July 8, 2026 at 6:50 PM IST

3 Min Read
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नई दिल्ली: भारत के स्कूल शिक्षा प्रणाली में टीचरों की संख्या, ड्रॉपआउट रेट, डिजिटल अवसंरचना और छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार हुआ है. हालांकि, एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. वह यह है कि, सिर्फ 51.9 प्रतिशत छात्र ही सेकेंडरी स्टेज तक रुके हैं. यह जानकारी मंगलवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय की जारी यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (शिक्षा प्लस के लिए एकीकृत जिला सूचना प्रणाली) (UDISE+) 2025-26 रिपोर्ट से मिली है.

हालांकि सेकेंडरी रिटेंशन रेट 2024-25 में 47.2 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में 51.9 फीसदी हो गया है. लेकिन डेटा बताता है कि हर दो में से लगभग एक स्टूडेंट अभी भी सेकेंडरी लेवल तक स्कूल नहीं जा पाता है, जो हाल की तरक्की के बावजूद बने हुए अंतर को दिखाता है.

रिपोर्ट से पता चलता है कि सेकेंडरी ग्रॉस एनरोलमेंट रेश्यो (GER) भी 68.5 फीसदी से बढ़कर 71.7 प्रतिशत हो गया है, जबकि मिडिल से सेकेंडरी स्कूल में ट्रांजिशन रेट 86.6 प्रतिशत से बढ़कर 88.3 फीसदी हो गया है, जिससे पता चलता है कि ज्यादा बच्चे में जा रहे हैं. लेकिन, उन्हें इस स्टेज तक बनाए रखना एक चुनौती बनी हुई है.

सरकार ने कई संकेतक में सुधार पर जोर दिया. 2022-23 से शिक्षकों की संख्या 8.3 प्रतिशत बढ़कर 1.02 करोड़ से ज्यादा हो गई है, जबकि सभी चरण में छात्र-शिक्षक अनुपात में सुधार हुआ है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के सुझाए गए 30:1 अनुपात से काफी नीचे है. ड्रॉपआउट रेट में भी कमी आई है, और साल के दौरान सेकेंडरी ड्रॉपआउट 8.2 फीसदी से घटकर 7 फीसदी हो गया है.

रिपोर्ट स्कूलों में बेहतर डिजिटल अवसंरचना की ओर भी इशारा करती है. अब लगभग 70 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर हैं, जो एक साल पहले 64.7 प्रतिशत थे, जबकि इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़कर 67.4 फीसदी हो गई है. हालांकि, इसका मतलब यह भी है कि लगभग एक-तिहाई स्कूलों में अभी भी कंप्यूटर या इंटरनेट की पहुंच नहीं है. ऐसे में खासकर ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में डिजिटल लर्निंग की रफ्तार पर सवाल उठ रहे हैं.

बुनियादी ढांचे में और सुधार हुआ है. 95 प्रतिशत स्कूलों में बिजली है, 99.5 फीसदी स्कूलों में पीने का पानी है, और 98 प्रतिशत से ज्यादा स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट हैं. फिर भी, पहुंच एक चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि केवल 58.2 प्रतिशत स्कूलों में हैंडरेल वाले रैंप हैं, जो दिखाता है कि दस में से चार से ज़्यादा स्कूल अभी भी विकलांग बच्चों के लिए पूरी तरह से सुलभ नहीं हैं.

एक और खास ट्रेंड सिंगल-टीचर और जीरो-एनरोलमेंट वाले स्कूलों में कमी है. एक साल पहले के 1,04,125 से सिंगल-टीचर स्कूलों की संख्या घटकर 1,00,843 हो गई, जबकि जीरो-एनरोलमेंट वाले स्कूलों की संख्या लगभग 29 फीसदी घटकर 5,663 हो गई, जो स्कूल के संसाधन को सही इस्तेमाल करने की चल रही कोशिशों को दिखाता है.

स्कूली शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी में भी थोड़ा सुधार हुआ है. अब शिक्षण कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 54.9 फीसदी है, जबकि कुल नामांकन में लड़कियों की हिस्सेदारी 48.4 फीसदी है, दोनों में पिछले साल के मुकाबले थोड़ी बढ़ोतरी हुई है.

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