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'मैं 21 साल की उम्र में कलेक्टर बनूंगा' ये नारा नौनिहालों में भर रहा जोश
महाराष्ट्र के कोल्हापुर का एक स्कूल 'लोकल से ग्लोबल' हो रहा है. कोल्हापुर के विद्या मंदिर चलनवाड़ी स्कूल के स्टूडेंट्स सफलता के झंडे गाड़ रहे.

Published : December 25, 2025 at 5:29 PM IST
कोल्हापुर (महाराष्ट्र): महाराष्ट्र के कोल्हापुर का शाहूवाड़ी तालुका एक बहुत ही दूर का इलाका है, जो घाटियों, घाटियों और बस्तियों से घिरा हुआ है. दो बस्तियों के बीच की दूरी पांच से दस किलोमीटर है, और कोल्हापुर जिला परिषद के प्राइमरी स्कूल में मुश्किल से ही स्टूडेंट्स हैं.
हालांकि, स्टूडेंट्स की क्वॉलिटी को पहचानते हुए तीन साल पहले विद्या मंदिर चालानवाड़ी स्कूल से जुड़े टीचर संदीप पाटिल ने इन स्टूडेंट्स को ग्लोबल बनाने का चैलेंज लिया. 21 साल की उम्र में बनूंगा कलेक्टर....: 9 स्टूडेंट्स वाले इस स्कूल में टीचर पहले दिन से ही बच्चे को कलेक्टर बनने का मौका दे रहे हैं.
स्कूल के स्टूडेंट्स का क्लास 4 तक नेशनल और स्टेट लेवल के मेरिट एग्जाम में मेरिट लिस्ट में आना पक्का है, जिसके चलते कॉन्फिडेंट इन स्टूडेंट्स ने अपने घर की दीवार पर लिख दिया है. "21 साल की उम्र में डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर बनूंगा...." आइए देखते हैं कोल्हापुर के चालानवाड़ी गांव के उस स्कूल की सक्सेस स्टोरी, जो 'लोकल से ग्लोबल' बन गया है. 'ETV भारत' की टीम ने यहां दौरा किया.

स्टूडेंट्स के साथ ही गांव की किस्मत भी बदली: मुश्किल से 35 घर, 150 से 200 की आबादी, एक खेत और चालानवाड़ी गांव के रहने वाले, जो जैसे-तैसे काम करके गुजारा करते हैं. यह ग्रुप ग्राम पंचायत रत्नागिरी-कोल्हापुर हाईवे पर अंबा गांव से सिर्फ तीन किलोमीटर दूर है.
गांव के बीच में दो कमरों का जिला परिषद स्कूल है. गांव के क्लास 1 से 4 तक के स्टूडेंट्स इसी स्कूल में पढ़ते हैं. सह्याद्री घाट के नीचे बसे चलनवाड़ी के गांव वालों में पढ़ाई को लेकर बहुत जोश है.
स्टूडेंट्स को बढ़ावा देने के साथ-साथ कोल्हापुर जिला परिषद गांवों तक शिक्षा पहुंचाने के लिए लगातार कोशिश कर रही है. लेकिन, टीचर रुकने को तैयार नहीं थे. तीन साल पहले, ठाणे और कोल्हापुर जिले के शिरोल में 19 साल से पढ़ा रहे संदीप पाटिल ने सोच-समझकर इस स्कूल की कमान संभाली और स्टूडेंट्स के साथ-साथ गांव की किस्मत भी बदल दी.

स्टूडेंट्स बनें इंटरनेशनल: ठाणे और पालघर जिले के आदिवासी गांवों में सेवा दे चुके संदीप पाटिल ने गांवों के स्टूडेंट्स को ग्लोबल बनाने की कोशिशें शुरू कीं. समाज के होनहार लोगों ने भी उनका साथ दिया. इसी वजह से स्कूल में डिजिटल क्लास रूम, LED स्क्रीन और इंटरनेट की सुविधाएं जुड़ गईं.
मालविका वैद्य, जो मूल रूप से पुणे की रहने वाली हैं, काम के सिलसिले में जापान में थीं. उन्होंने बच्चों की क्वॉलिटी देखकर दो साल पहले स्कूल का दौरा किया था. वह दूर-दराज के इलाकों के स्टूडेंट्स का पढ़ाई के प्रति लगाव देखकर बहुत प्रभावित हुईं और हर रविवार को जापान से ऑनलाइन क्लास रूम के जरिए उन्हें गाइड करना शुरू किया, और अब इस स्कूल के 100 परसेंट स्टूडेंट्स जापानी बोलते हैं.
टीचर संदीप पाटिल इस संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि उनके स्टूडेंट्स इंटरनेशनल बनें, न कि स्कूल इंटरनेशनल. पाटिल की पत्नी श्रुति भी इन स्टूडेंट्स को इस सफर में लगातार गाइड करती हैं.

पाटिल ने 'ETV भारत' से बात करते हुए भरोसा जताया कि क्लास 4 के बाद सभी स्टूडेंट्स नवोदय एग्जाम पास करके डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर के पद तक पहुंचेंगे. कम पढ़े-लिखे माता-पिता का सीना गर्व से चौड़ा हुआ. दूरदराज के इलाके में बसे चलनवाड़ी में मुश्किल से ही कोई परिवार है, और यहां शिक्षा की कमी भी साफ दिखती है. हालांकि, कम पढ़े-लिखे स्टूडेंट्स के माता-पिता आने वाली पीढ़ी को हाथों में टैब लेकर डिजिटल क्लास रूम में पढ़ते देखकर अभिभूत हैं. हमने तो नहीं सीखा, लेकिन हमारे बच्चे अपने घरों की दीवारों पर लिखा वाक्य "मैं 21 साल की उम्र में जिला कलेक्टर बनूंगा" पढ़कर गर्व से भर जाते हैं. बच्चे सुबह 4:30 बजे उठकर पढ़ाई करते हैं.
लोकल की कविता पवार और संध्या चंदे ने कहा कि संदीप पाटिल और श्रुति पाटिल के मार्गदर्शन में हमारे बच्चों का भविष्य उज्जवल हो गया है. एक नजारे से समझिए...पुलिस ने जिला कलेक्टर की गाड़ी का दरवाजा खोला और कुछ दिन पहले, कोल्हापुर जिला कलेक्टर अमोल येडगे इस इलाके के दौरे पर थे. इस कार्यक्रम में चलनवाड़ी गांव के छात्रों को भी बुलाया गया था. जिला कलेक्टर की गाड़ी का काफिला वहां पहुंचने के बाद, पुलिस कर्मियों ने जिला कलेक्टर की गाड़ी का दरवाजा खोला.

चलनवाड़ी गांव के स्कूल की रिद्धि रूपेश चंदे ने यह पल देखा. उसने सीधे जिला कलेक्टर से पूछा, सर, पुलिस ने आपकी गाड़ी का दरवाजा क्यों खोला? और यहीं से, रिद्धि का जिला कलेक्टर बनने का सफर ...21 साल की उम्र के लिए शुरू हुआ, उसने कहा कि वह भी जिला कलेक्टर बनना चाहती हैं.
गौर करें तो शाहूवाड़ी का टैलेंट कॉम्पिटिटिव एग्जाम में बहुत मजबूत है. माता-पिता भारी फीस देकर अपने बच्चों को सफल बनाने की कोशिश करते हैं. हालांकि, यह कई बार साबित हो चुका है कि असली टैलेंट जिला परिषद स्कूलों में होता है.
शाहूवाड़ी तालुका में कॉम्पिटिटिव एग्जाम पास करने वालों का परसेंटेज ज़्यादा है, यहां की क्वॉलिटी को देखते हुए कई दानी लोग दूर-दराज के इलाकों में मौजूद स्कूलों की मदद करते हैं. अमेरिका में रहने वाले रमेश पवार ने बच्चों के पौष्टिक खाने के लिए मदद का हाथ बढ़ाया है, ताकि स्कूल में बच्चे मजबूत रहें. वहीं इस डिवीजन के लोगों के प्रतिनिधि MLA डॉ. विनय कोरे भी इस काम में मदद कर रहे हैं.
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