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CBSE ने कक्षा 6 से 8 तक स्किल एजुकेशन अनिवार्य किया, छात्रों-शिक्षकों के लिए क्या बदलाव होंगे? जानें
CBSE ने कक्षा 6 से 8 तक के लिए स्किल एजुकेशन को अनिवार्य कर दिया है. इस बदलाव को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं.

Published : November 27, 2025 at 8:52 PM IST
सुरभि गुप्ता
नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने इस शैक्षणिक सत्र से कक्षा 6 से 8 तक के लिए स्किल एजुकेशन को जरूरी बनाकर लंबे समय बाद अपने पाठ्यक्रम में इतना बड़ा बदलाव किया है.
एनएमपीएस 2020 पहल, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) पर बनी है, का मकसद एजुकेशन को रटने से हटाकर रोजमर्रा की जिंदगी में काम आने वाले स्किल्स की ओर ले जाना है; हालांकि, कई लोग इस बदलाव को "प्रोग्रेसिव" मानते हैं, और असल में इसका स्वागत करते हैं.
लेकिन, कई लोग इस बात को लेकर परेशान हैं कि क्या मौजूदा माहौल में शिक्षा में इतने बड़े बदलाव को समायोजित करने की क्षमता है, इसमें इस बदलाव में शामिल लोग, जैसे कि टीचर, अभिभावक और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े अन्य प्रशासक शामिल हैं.
सीबीएसई, NCERT के साथ मिलकर बनाए गए कौशल बढ़ाना (स्किल बोध) प्रोग्राम (Skill Bolstering Program) को कोऑर्डिनेट कर रहा है. इस प्रोग्राम के लिए जरूरी है कि पूरे भारत में CBSE स्कूल इस प्रोग्राम को लागू करें. हर स्टूडेंट को तीन साल में नौ हैंड्स-ऑन प्रोजेक्ट करने होंगे, हर साल तीन, जिसमें 270 घंटे की संरचनात्मक स्किल-बेस्ड लर्निंग शामिल होगी. स्कूलों को हर साल लगभग 110 घंटे निकालने होंगे, जो लगभग 160 पीरियड होंगे, और हर हफ्ते दो-पीरियड के समर्पित ब्लॉक शुरू करने होंगे ताकि बिना किसी रुकावट के प्रैक्टिकल काम हो सके.
सीबीएसई का कहना है कि इसका मकसद विद्यार्थियों को "करके सीखने" (learn by doing) का मौका देना है, और उन्हें तीन बड़े कौशल क्षेत्र से परिचित कराना है: जीवित प्राणियों के साथ काम करना, मशीनों और चीजों के साथ काम करना, और मानव सेवा. लेकिन जमीनी स्तर पर, प्रतिक्रियाएं बहुत मिली-जुली हैं.
इंफ्रास्ट्रक्चर: सबसे बड़ी रुकावट
भारत के कई स्कूल प्रशासकों ने चेतावनी दी है कि स्किल बोध पहल ज्यादातर स्कूलों, खासकर सरकारी स्कूलों और कम फीस वाले प्राइवेट स्कूलों, जो पैसे की तंगी से जूझ रहे हैं, के सामने आने वाली कमजोर फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चुनौतियों को कम आंकती है.
सेंट थॉमस स्कूल के प्रिंसिपल कुरियाकोस वी.के. का कहना है कि निर्देश में यह माना गया है कि स्कूलों के पास स्किल स्पेस में बदलने के लिए खाली कमरे या लैब हैं. उन्होंने ईटीवी भारत को बताया, "हमारे जैसे स्कूलों ने पहले से ही हमारे पास मौजूद जमीन के हिसाब से कमरे बना लिए हैं और हर क्लास के लिए काफी सेक्शन वाले सभी कमरों पर कब्जा कर लिया है. स्किल लैब के लिए जगह बनाने के लिए न तो और निर्माण करना और न ही सेक्शन कम करना व्यावहारिक रूप से मुमकिन है."
हरियाणा के एक गांव के एक सरकारी स्कूल के टीचर ने भी यही चिंता जताई और मूलभूत सुविधाओं की कमी पर जोर दिया. उन्होंने कहा, "हमारे पास पहले से ही क्लासरूम पर्याप्त नहीं हैं. हम अचानक बढ़ईगीरी (carpentry), डिजाइन या मैकेनिकल काम के लिए जगह कैसे बना सकते हैं?"
यह चिंता गांव के स्कूलों में आम है, जहां साइंस लैब, लाइब्रेरी और यहां तक कि खेल के मैदान भी कम हैं. उनके लिए, स्किल लैब एक सपना ही रह सकता है, जब तक कि सरकारें नई फंडिंग नहीं देतीं.
दिल्ली के सर्वोदय को-एड विद्यालय के प्रिंसिपल अवधेश कुमार झा ने इरादे और तैयारी के बीच के इस तनाव को समझाया है. उन्होंने कहा, "हालांकि CBSE का इरादा आगे बढ़ने का है, लेकिन जमीनी हकीकत, खासकर सरकारी और गांव के स्कूलों में, अलग-अलग है. कई स्कूलों में अभी भी बेसिक लैब इंफ्रास्ट्रक्चर, अपडेटेड टूल्स और अच्छी स्किल एजुकेशन के लिए जरूरी लगातार ट्रेंड इंस्ट्रक्टर की कमी है. हालांकि, आदेश लागू करना उत्प्रेरक का भी काम कर सकता है: एक बार जब पॉलिसी जरूरी हो जाती है, तो राज्यों और स्कूलों पर बजट, ट्रेनिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर को प्राथमिकता देने के लिए दबाव डाला जाता है. हो सकता है कि यह शुरुआत में एकदम सही न हो, लेकिन यह लंबे समय की नींव रख सकता है."
माता-पिता की प्रतिक्रिया
स्कूली बच्चों के माता-पिता की प्रतिक्रियाएं बंटी हुई हैं. कई लोगों का तर्क है कि पाठ्यक्रम पहले से ही कोडिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वित्तीय साक्षरता और डिजाइन थिंकिंग जैसे नए विषयों से ओवरलोडेड है. उन्हें डर है कि जरूरी स्किल वर्क जोड़ने से मिडिल स्कूल के स्टूडेंट्स में तनाव और बढ़ जाएगा. गुड़गांव की एक अभिभावक निधि ने कहा, "मेरे बच्चे का शेड्यूल पहले से ही बहुत बिजी है. अब जरूरी प्रोजेक्ट्स जोड़ने से दबाव और बढ़ेगा. एक साथ इतने सारे नए विषयों को क्यों थोपा गया?"
अन्य अभिभावकों का मानना है कि कौशल ऑप्शनल होना चाहिए, जरूरी नहीं. पुणे के एक अभिभावक जिग्नेश ने कहा कि शॉर्ट-टर्म एक्सपोजर से शायद कोई खास असर न हो. उन्होंने कहा, "कक्षा 6 से 8 में सीखी गई स्किल्स बाद में इंटर्नशिप या नौकरी में सीधे तौर पर मदद नहीं करेंगी. ये ऑप्शनल होनी चाहिए, हर बच्चे पर थोपी नहीं जानी चाहिए."
एक और आम चिंता प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के बीच बराबरी का न होना है. राजस्थान के गांव की एक अभिभावक सुशीला ने वह सवाल उठाया जो बहुत से लोग पूछ रहे हैं, "प्राइवेट स्कूल तो किसी तरह मैनेज कर लेते हैं, लेकिन हमारे लोकल स्कूल का क्या, जहां बेसिक लैब भी नहीं हैं?"
फिर भी, कई माता-पिता इस नीति को बहुत ज्यादा थ्योरी वाले एजुकेशन सिस्टम में एक जरूरी सुधार के तौर पर देखते हैं. बेंगलुरु के एक अभिभावक आनंद ने बताया, "स्किल्स के बारे में जल्दी जानकारी देना अच्छा है. बच्चों को यह सीखना चाहिए कि असल जिंदगी में चीजें कैसे काम करती हैं—सिर्फ परीक्षा के लिए पढ़ाई नहीं करनी चाहिए."
प्रिंसिपल एक्सपोजर का समर्थन करते हैं, लेकिन लचीले कार्यान्वयन की जरूरत पर जोर देते हैं. कई स्कूलों के प्रिंसिपल इस बात से सहमत हैं कि स्किल शिक्षा की वैल्यू है, अगर इसे सोच-समझकर और क्षमता बनाने के लिए सही समय के साथ लागू किया जाए.
एमिटी इंटरनेशनल स्कूल की प्रिंसिपल डॉ. भावना कुलश्रेष्ठ ने ईटीवी भारत को बताया कि ये कोर्स जॉब-ओरिएंटेड होने के बजाय अन्वेषी हैं. उन्होंने कहा, "10-12 घंटे का कोर्स जॉब नहीं देगा, लेकिन यह बच्चों को कुछ नया जानने और सीखने में मदद करता है. कई स्कूलों में स्किल्स एजुकेशन पहले से ही सिखाई जा रही है, जैसे कारपेंटरी, टेलरिंग, बेकिंग, AI, डिजाइन थिंकिंग, वित्तीय साक्षरता. ये इंट्रोडक्शन हैं."
उनका मानना है कि जल्दी जानकारी मिलने से बाद में करियर चुनने में कन्फ्यूजन कम हो सकता है. उन्होंने कहा, "अगर हम अभी यह नहीं सिखाते हैं, तो बाद में जब स्टूडेंट्स स्कूल छोड़कर असली दुनिया का सामना करेंगे, तो बोझ और बढ़ जाएगा."
हालांकि, वह इस बात पर जोर देती हैं कि स्कूलों को अपनी क्षमता और समुदाय की जरूरतों के हिसाब से स्किल मॉड्यूल चुनने का लचीलापन रखना चाहिए.
अवधेश कुमार झा मिडिल स्कूल में स्किल लर्निंग की डेवलपमेंटल वैल्यू पर भी जोर देते हैं. वह कहते हैं, "मिडिल स्कूल लेवल पर स्किल्स सिखाना शायद सीधे तौर पर रोजगार के लिए तैयार न बनाए, लेकिन यह बच्चों के विकास में एक जरूरी रोल निभाता है."
स्टूडेंट्स असल में क्या करेंगे?
स्किल बोध पाठ्यक्रम में पौधों या पालतू जानवरों की देखभाल, बगीचों की देखभाल, बेसिक बढ़ईगीरी, आसान औजारों का इस्तेमाल, घर की आम चीजों की मरम्मत, कम्युनिटी सर्विस में मदद करना और छोटे-मोटे पर्यावरण या सामाजिक काम करने जैसे प्रोजेक्ट शामिल हैं. स्कूलों को अपने माहौल के हिसाब से सबसे सही प्रोजेक्ट चुनने की आजादी है. गांव का स्कूल खेती से जुड़े काम चुन सकता है; शहर का स्कूल मैकेनिकल या सर्विस पर आधारित कार्यों को प्राथमिकता दे सकता है.
जानकारों का कहना है कि यह स्थानीय संदर्भीकरण (local contextualisation) इस प्रोग्राम की ताकत है, हालांकि इसके लिए ध्यान से योजना बनाने की जरूरत है.
शिक्षकों को आने वाली मुश्किलें
शिक्षकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी कि नया कोर्स कंटेंट पढ़ाने के लिए खुद को तैयार करना, क्योंकि प्रैक्टिकल स्किल कोर्स इस बात पर निर्भर करते हैं कि प्रशिक्षक स्टूडेंट की हैंड्स-ऑन लर्निंग को दिखाए, सुपरवाइज करे और उसका मूल्यांकन करे. CBSE, NCERT और PSSIVE बड़े पैमाने पर ट्रेनिंग सेशन करेंगे, लेकिन शिक्षकों का कहना है कि उन्हें इसके हिसाब से ढलने में समय लगेगा.
दिल्ली की एक टीचर बबीता पाल ने माना, "हमें पहले ट्रेनिंग की जरूरत है. हममें से कई लोगों ने कभी बढ़ईगीरी या मशीन-हैंडलिंग नहीं की है. हम इसे रातों-रात कैसे सिखा सकते हैं?"
शिक्षकों को सेफ्टी प्रोटोकॉल भी मैनेज करने होंगे, उपकरणों को मेंटेन करना होगा और क्रिएटिव काम को मूल्यांकन करना होगा, जिससे उनका वर्कलोड बढ़ जाएगा.
टाइमटेबल में बदलाव से स्कूलों पर दबाव बढ़ा
सीबीएसई ने स्कूलों को हर हफ्ते लगातार दो पीरियड के लिए टाइमटेबल बदलने के लिए कहा है. हालांकि यह पढ़ाई के हिसाब से जरूरी है, लेकिन यह जरूरत स्कूलों को आर्ट्स, स्पोर्ट्स, कम्प्यूटेशनल थिंकिंग और NEP के तहत जरूरी एक्टिविटीज के कारण पहले से ही भरे हुए शेड्यूल को छोटा करने पर मजबूर करती है. कई स्कूल यह पता लगाने में संघर्ष कर रहे हैं कि ये नए 160 पीरियड कहां फिट होंगे.
नया मूल्यांकन मॉडल, लेकिन टीचर्स के लिए ज्यादा काम
मूल्यांकन पारंपरिक परीक्षा से हटकर प्रोजेक्ट-बेस्ड, नियमित मूल्यांकन दृष्टिकोण पर शिफ्ट हो जाएगा:
- 10% लिखित परीक्षा
- 30% वाइवा/प्रेजेंटेशन
- 30% एक्टिविटी बुक
- 10% पोर्टफोलियो
- 20% टीचर ऑब्जर्वेशन
कई टीचर इस बदलाव की तारीफ करते हैं. उनका कहना है कि इससे क्रिएटिविटी और प्रैक्टिकल में भागीदारी को बढ़ावा मिलता है. लेकिन वे यह भी मानते हैं कि इसका मतलब है कि रिकॉर्ड रखने और मूल्यांकन के लिए ज्यादा घंटे लगेंगे. एक टीचर ने कहा, "यह सिस्टम जवाब रटने से तो बेहतर है, लेकिन इससे शिक्षकों का वर्कलोड काफी बढ़ जाता है."
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