ऊर्जा संकट के बीच रूस का बड़ा दांव, दक्षिण एशियाई देशों को 40% छूट पर LNG का ऑफर
रूस ने होर्मुज संकट के बीच भारत जैसे दक्षिण एशियाई देशों को प्रतिबंधित प्लांट से 40% छूट पर एलएनजी देने का प्रस्ताव दिया है.

Published : April 9, 2026 at 3:22 PM IST
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से उपजे वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच रूस ने एक बड़ा कूटनीतिक और आर्थिक दांव खेला है. ब्लूमबर्ग की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, रूस अपने अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे संयंत्रों (जैसे आर्कटिक LNG 2) से उत्पादित प्राकृतिक गैस को दक्षिण एशियाई देशों, विशेषकर भारत और बांग्लादेश को भारी छूट पर बेचने की कोशिश कर रहा है.
40% की भारी छूट और पहचान छिपाने की रणनीति
रिपोर्ट के मुताबिक, रूस की ओर से यह गैस मौजूदा वैश्विक 'स्पॉट प्राइस' से लगभग 40% कम कीमत पर ऑफर की जा रही है. इस सौदे को अंजाम देने के लिए चीन और रूस स्थित कुछ अज्ञात मध्यस्थ कंपनियों का सहारा लिया जा रहा है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि ये विक्रेता ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराने का दावा कर रहे हैं, जिससे यह दिखाया जा सके कि गैस की खेप रूस के बजाय ओमान या नाइजीरिया जैसे गैर-प्रतिबंधित देशों से आ रही है. इसका मुख्य उद्देश्य खरीदार देशों को अमेरिकी प्रतिबंधों की जद से बचाना है.
कतर संकट और भारत पर असर
वैश्विक स्तर पर LNG आपूर्ति का लगभग 20% हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. कतर में दुनिया के सबसे बड़े LNG निर्यात संयंत्रों पर हमलों और समुद्री मार्ग बाधित होने से गैस बाजार में हड़कंप मच गया है. भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि वह अपनी कुल जरूरत का लगभग 50% हिस्सा अकेले कतर से आयात करता है. आपूर्ति ठप होने से घरेलू स्तर पर खाद (Fertilizer) उत्पादन और बिजली घरों के लिए ईंधन की कमी हो गई है, जिससे कीमतें बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है.
आगे की राह और चुनौतियां
रूस का यह ऑफर दक्षिण एशियाई देशों के लिए लुभावना तो है, लेकिन इसमें जोखिम भी कम नहीं हैं. भारत जैसे देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए सस्ते ईंधन की तलाश में हैं, लेकिन वे अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को दांव पर लगाने और 'सेकेंडरी प्रतिबंधों' का सामना करने से बच रहे हैं.
फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि किसी देश ने आधिकारिक तौर पर रूस के इस 'डिस्काउंटेड' ऑफर को स्वीकार किया है या नहीं. विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और कतर से आपूर्ति बहाल नहीं होती, तो आने वाले समय में ऊर्जा की भूख शांत करने के लिए देशों को ऐसे कठिन और जोखिम भरे विकल्प चुनने पड़ सकते हैं.
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