सोने में निवेश — राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए बोझ या आम आदमी का सुरक्षा कवच?
प्रधानमंत्री मोदी की सोना खरीद घटाने की अपील पर अर्थशास्त्रियों और ज्वेलरी उद्योग के बीच आर्थिक बहस तेज हो गई है. सौरभ शुक्ला की रिपोर्ट...

Published : September 1, 2026 at 5:22 PM IST
|Updated : September 1, 2026 at 5:28 PM IST
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील अपील की है. उन्होंने नागरिकों से गैर-जरूरी सोने की खरीद और विदेशों में छुट्टियां बिताने या यात्रा करने पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है. प्रधानमंत्री ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए घरेलू उत्पादों और सेवाओं का अधिक से अधिक उपयोग करने का आह्वान किया है ताकि देश के भीतर मांग को बढ़ाया जा सके.
पीएम मोदी की इस अपील ने देश के आर्थिक और सामाजिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है. सवाल यह उठ रहा है कि क्या अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए मशहूर भारतीय लोग वाकई सोने की खरीद में कटौती करेंगे या नहीं?
#WATCH | Prime Minister Narendra Modi posts on the social media platform, Instagram; PM says "... We must embrace the mantra of 'Swadeshi' and 'Vocal for Local.' We should avoid traveling abroad merely for leisure or hosting weddings in foreign lands; instead, we should live by… https://t.co/5ad5RKJiG5 pic.twitter.com/PVN04APP3e
— ANI (@ANI) September 1, 2026
'आभूषणों की खरीद कभी नहीं रुकेगी': ज्वेलरी इंडस्ट्री का पक्ष
भारत में सोने का महत्व सिर्फ एक वित्तीय निवेश तक सीमित नहीं है. यह शादियों, त्योहारों, जन्मदिनों और कई अन्य पारिवारिक परंपराओं से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है. भारतीय समाज में सोने के गहनों को न केवल एक आभूषण बल्कि बचत और सबसे भरोसेमंद वित्तीय सुरक्षा के रूप में देखा जाता है.
प्रधानमंत्री की इस अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए ऑल इंडिया जेम्स एंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल के चेयरमैन सैयाम रोकड़े ने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि देश के लोग सोने के आभूषण खरीदना बंद कर देंगे. उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री के संदेश को मुख्य रूप से सोने के बिस्कुट और बुलियन निवेश जैसी अनावश्यक खरीद से बचने के आह्वान के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि पारिवारिक गहनों की खरीद रोकने के रूप में.
चेयरमैन रोकड़े ने तर्क दिया
- पारंपरिक अनिवार्यता: परिवार शादियों और शुभ अवसरों के लिए आभूषण खरीदते हैं, और यह सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा गायब नहीं हो सकती.
- उद्योग का योगदान: प्रधानमंत्री द्वारा देश की 7.8 प्रतिशत जीडीपी विकास दर का उल्लेख करने पर रोकड़े ने कहा कि जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर देश की जीडीपी में लगभग 7% का योगदान देता है और लाखों लोगों को रोजगार देता है.
- ज्वेलर्स की नीति: उन्होंने यह भी साफ किया कि जौहरी खुद आम ग्राहकों को निवेश के रूप में सोने के बिस्कुट या बुलियन खरीदने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते हैं.
घटते-बढ़ते आयात का गणित (अप्रैल-अगस्त 2026)
विशेषज्ञों के अनुसार, भारत अपनी सोने की कुल मांग का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है. ऑल इंडिया जेम्स एंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल द्वारा साझा किए गए हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि सोने की कीमतों में भारी उछाल के कारण पिछले साल की तुलना में इस साल कुल आयात में गिरावट आई है, लेकिन हाल के महीनों में एक बार फिर मांग में तेजी देखी गई है:
| महीना (वर्ष 2026) | भारत का स्वर्ण आयात (टन में) |
|---|---|
| अप्रैल | 45 टन |
| मई | 30 टन |
| जून | 20 टन |
| जुलाई | 32 टन |
| अगस्त | 45 टन |
जून में आयात न्यूनतम स्तर (20 टन) पर आने के बाद जुलाई और अगस्त में आई यह तेजी दर्शाती है कि ऊंची कीमतों के बावजूद भारतीय बाजारों में सोने की मांग दोबारा बढ़ रही है.
जेएनयू के अर्थशास्त्री की राय: क्यों सोना एक 'डेड एसेट' है?
इस आर्थिक पहेली को विस्तार से समझने के लिए जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार से बात की गई, तो उन्होंने इस मुद्दे का एक गहरा मैक्रोइकॉनॉमिक विश्लेषण सामने रखा.
प्रोफेसर अरुण कुमार ने बताया कि हालांकि सोना एक सुरक्षित निवेश माना जाता है और यह महंगाई व बढ़ती कीमतों के खिलाफ एक सुरक्षा कवच के रूप में उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसके बावजूद देश की अर्थव्यवस्था के लिए भौतिक सोना एक 'डेड एसेट' या 'अनुत्पादक संपत्ति' है.
प्रोफेसर अरुण कुमार के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं
- पूंजी का फंसा होना: जो सोना निवेश के रूप में खरीदा जाता है, वह तिजोरियों या लॉकरों में अधिकांश समय बेकार पड़ा रहता है. यह देश के आर्थिक चक्र में कोई भूमिका नहीं निभाता.
- उत्पादक निवेश की कमी: यदि सोने में लगाया जाने वाला यही पैसा देश के बैंकों में जमा हो, किसी कंपनी के शेयर में लगे या फैक्ट्री की नई मशीनरी खरीदने में इस्तेमाल हो, तो इससे देश में नई आर्थिक गतिविधियां शुरू होंगी और बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होगा.
- डॉलर का भारी नुकसान: चूंकि भारत में सोने का खदान उत्पादन न के बराबर है, इसलिए हमें इसके आयात के लिए अपनी मूल्यवान विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है.
जब देश के करोड़ों नागरिक मिलकर सोने पर अरबों डॉलर खर्च करते हैं, तो वह पैसा देश से बाहर चला जाता है. यदि लोग पीएम की सलाह मानकर इस पैसे को घरेलू निवेश की ओर मोड़ें, तो देश के बाहरी वित्त और रुपये की कीमत को बड़ी मजबूती मिलेगी, खासकर तब जब वैश्विक बाजार अस्थिर हों.
आयात शुल्क से कमाई और तस्करी का संकट
विदेशी मुद्रा के इस नुकसान को रोकने के लिए सरकार ने इसी साल मई में सोने और चांदी के आयात पर टैक्स बढ़ा दिया था. सरकार ने 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी और 5 प्रतिशत कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर (AIDC) लगाया, जिससे प्रभावी आयात कर 15 प्रतिशत हो गया.
वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक
- राजस्व की कमाई: नई टैक्स दरें लागू होने के बाद मात्र ढाई महीने के भीतर (13 मई से 2 अगस्त 2026 के बीच) सरकार ने सोने के आयात से 10,040 करोड़ रुपये का सीमा शुल्क वसूला है.
अवैध आयात और गिरफ्तारियां: टैक्स बढ़ने के बाद सोने की तस्करी भी बढ़ी है. 13 मई से 30 जून 2026 के बीच कस्टम अधिकारियों ने अवैध आयात के 287 मामले दर्ज किए, 160 किलोग्राम अवैध सोना जब्त किया और 116 लोगों को गिरफ्तार किया.
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