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रक्षा और तकनीक क्षेत्र में चीन-ताइवान को टक्कर देने की तैयारी, नीति आयोग ने जारी किया 10 साल का रोडमैप

नीति आयोग ने 2035 तक भारत को सेमीकंडक्टर हब बनाने और विदेशी निर्भरता खत्म करने के लिए 10-वर्षीय रोडमैप जारी किया है।

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सांकेतिक फोटो (getty image)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : June 2, 2026 at 11:08 AM IST

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Updated : June 2, 2026 at 11:16 AM IST

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नई दिल्ली: भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स और चिप निर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए नीति आयोग ने आज एक बहुत बड़ा कदम उठाया है. नीति आयोग के फ्रंटियर टेक हब ने देश का पहला 10 साल का रोडमैप "फ्यूचर ऑफ इंडियाज सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री" (भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य) जारी किया है. इस आसान और साफ रणनीति का मकसद भारत को विदेशी निर्भरता से पूरी तरह मुक्त करना है. इस प्लान के तहत साल 2035 तक भारत को दुनिया का एक ऐसा मुख्य केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसके बिना वैश्विक चिप सप्लाई चेन अधूरी होगी. यह नया रोडमैप बजट 2026 में घोषित 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन 2.0' को जमीन पर उतारने का काम करेगा.

चिप क्यों है भारत के लिए इतनी जरूरी?
आज के दौर में सेमीकंडक्टर यानी 'चिप' सिर्फ एक छोटी सी पुर्जा नहीं रह गई है. यह देश की सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और डिजिटल आजादी की धुरी बन चुकी है. सेना के आधुनिक हथियार, मोबाइल और 5G/6G नेटवर्क, एआई (AI) कंप्यूटर, गाड़ियां, अस्पताल की मशीनें और डिजिटल पेमेंट सिस्टम—ये सब कुछ सेमीकंडक्टर चिप के बिना काम नहीं कर सकते. भू-राजनीतिक बदलावों और देशों के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए, भारत के पास खुद को एक भरोसेमंद देश के रूप में स्थापित करने का यह सबसे सही मौका है. इस रोडमैप को सरकार और उद्योग जगत के सबसे बड़े विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया है, ताकि 2035 तक देश में 120 से 150 अरब डॉलर (USD 120-150 Billion) का घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम खड़ा किया जा सके.

आयात का भारी बोझ और सुरक्षा का खतरा
भारत वर्तमान में अपनी जरूरत की 90 से 95 प्रतिशत सेमीकंडक्टर चिप्स दूसरे देशों से खरीदता है. इस भारी निर्भरता की वजह से देश का बहुत बड़ा पैसा बाहर चला जाता है. साल 2017 से 2025 के बीच भारत ने विदेशी चिप्स मंगाने में लगभग 150 अरब डॉलर की भारी-भरकम विदेशी मुद्रा खर्च की है. इसके अलावा, दुनिया की ज्यादातर चिप्स सिर्फ ताइवान और चीन जैसे गिने-चुने देशों में बनती हैं. कोरोना महामारी के समय जब वहां काम रुका, तो पूरी दुनिया में चिप की भारी किल्लत हो गई थी. रक्षा और सुरक्षा के नजरिए से देखें तो मिसाइल और लड़ाकू विमानों में विदेशी चिप लगाना देश की सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा जोखिम है. इसीलिए भारत में ही चिप बनाना अब सबसे बड़ी जरूरत बन गया है.

कामयाबी के 5 मुख्य स्तंभ
इस 10 साल के विजन को पूरा करने के लिए नीति आयोग ने 5 मुख्य रणनीतियां बनाई हैं:

  • रिसर्च और नए डिजाइन: भारत के टैलेंट का इस्तेमाल करके देश में ही 100 से ज्यादा नए और एडवांस सेमीकंडक्टर डिजाइन तैयार करना.
  • पूंजी और नीतियां: इस काम में बहुत ज्यादा पैसे की जरूरत होती है, इसलिए निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आसान नीतियां और लंबे समय का फंड जुटाना.
  • एडवांस पैकेजिंग और निर्माण: चिप बनाने के साथ-साथ उसकी सुरक्षित पैकेजिंग (OSAT) और नई तकनीक वाले 'कंपाउंड सेमीकंडक्टर्स' के उत्पादन में दुनिया का लीडर बनना.
  • टैलेंटेड युवाओं की फौज: कॉलेज स्तर से लेकर फैक्ट्रियों तक, युवाओं को इस तरह की ट्रेनिंग देना ताकि देश को लाखों कुशल इंजीनियर और टेक्नीशियन मिल सकें.
  • भरोसेमंद वैश्विक दोस्ती: दुनिया के मित्र देशों और बड़ी कंपनियों के साथ मिलकर एक सुरक्षित और अटूट सप्लाई चेन बनाना.

बाजार में तेजी और आम जनता को फायदा
भारतीय बाजार में चिप की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है. जहां पूरी दुनिया में इसकी मांग 8.5% की रफ्तार से बढ़ रही है, वहीं भारत में यह 19% की सालाना दर से बढ़ रही है. अनुमान है कि भारत का सेमीकंडक्टर बाजार साल 2030 तक 90 अरब डॉलर और 2035 तक 200 अरब डॉलर को पार कर जाएगा.

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Last Updated : June 2, 2026 at 11:16 AM IST