भारत को लाखों नौकरियां बनाने के लिए स्किल्स बढ़ानी होंगी और छोटी फर्मों को सपोर्ट करना होगा: NCAER रिपोर्ट
NCAER रिपोर्ट में दावा किया गया कि लाखों नौकरियां बनाने के लिए भारत को स्किल्स पर जोर देना होगा, छोटी फर्मों को सपोर्ट करना होगा.

Published : December 13, 2025 at 3:05 PM IST
हैदराबाद: नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) ने अपना एनालिसिस, "इंडियाज एम्प्लॉयमेंट प्रॉस्पेक्ट्स: पाथवेज टू जॉब्स" जारी किया. इसमें इकोनॉमिक ग्रोथ को जॉब क्रिएशन से जोड़ने के लिए स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स पर जोर दिया गया है.
रिपोर्ट में बताया गया है कि 8% GDP ग्रोथ रेट बनाए रखने के लिए वर्कफोर्स स्किल्स बढ़ाने और छोटी कंपनियों की प्रोडक्टिविटी सुधारने पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है.
हालांकि रोजगार बढ़ रहा है, लेकिन इसकी मुख्य वजह कम प्रोडक्टिविटी वाला सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट है. स्टडी में इस बात पर जोर दिया गया है कि विकसित भारत विजन को पाने के लिए जरूरी हाई-क्वॉलिटी जॉब्स पैदा करने के लिए लेबर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर को मजबूत करना बहुत जरूरी है.
इस रिपोर्ट में एनालिसिस से पता चलता है कि लेबर-इंटेंसिव मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज को बढ़ाने में भारत के रोजगार के अंतर को कम करने की काफी क्षमता है. ये सेक्टर पहले से ही मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टर में आधी से ज़्यादा जॉब्स देते हैं, और मजबूत इंटर-सेक्टरल लिंकेज हाई-ग्रोथ सिनेरियो में रोजगार को काफी बढ़ा सकते हैं. सप्लाई साइड पर,फॉर्मली स्किल्ड वर्कर्स का हिस्सा बढ़ाने और ट्रेनिंग की क्वॉलिटी को बेहतर बनाने से 2030 तक लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स की ग्रोथ और तेज हो सकती है.
खास नतीजे और चुनौतियां: जरूरत की वजह से सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट: रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सेल्फ-एम्प्लॉयमेंट का दबदबा अक्सर असली एंटरप्रेन्योरियल जोश के बजाय आर्थिक जरूरत का नतीजा होता है. ज़्यादातर छोटे, बिना कंपनी वाले घरेलू बिजनेस कम कैपिटल, कम प्रोडक्टिविटी और बहुत कम टेक्नोलॉजी अपनाने की वजह से गुजारे लायक लेवल पर काम करते हैं.
टेक्नोलॉजी और क्रेडिट की ताकत: स्टडी मॉडर्नाइजेशन और जॉब क्रिएशन के बीच सीधा लिंक बताती है.
डिजिटल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने वाले एंटरप्राइज उन एंटरप्राइज की तुलना में 78% ज़्यादा वर्कर हायर करते हैं, जो ऐसा नहीं करते.
क्रेडिट तक पहुंच में 1% की बढ़ोतरी भी हायर किए जाने वाले वर्कर की उम्मीद की गई संख्या में 45% की बढ़ोतरी से जुड़ी है.
स्किल गैप: मीडियम-स्किल्ड जॉब, खासकर सर्विस सेक्टर में, एम्प्लॉयमेंट ग्रोथ को बढ़ा रही हैं, जबकि मैन्युफैक्चरिंग अब भी काफी हद तक लो-स्किल्ड है. रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि वर्कफोर्स को अपस्किल करना बहुत जरूरी है. खासकर नई टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के आने से.
2030 तक जॉब क्रिएशन के रास्ते: रिपोर्ट बताती है कि फॉर्मल स्किलिंग में टारगेटेड दखल से 2030 तक काफी जॉब मिल सकती हैं.
स्किलिंग बूस्ट: फॉर्मल स्किल्ड वर्कफोर्स का हिस्सा 9 परसेंटेज पॉइंट बढ़ाने से लेबर-इंटेंसिव सेक्टर में लगभग 9.3 मिलियन नई जॉब पैदा हो सकती हैं.
सेक्टरल ग्रोथ प्रोजेक्शन: लेबर-इंटेंसिव सब-सेक्टर में मीडियम आउटपुट ग्रोथ से जॉब में बड़ी बढ़ोतरी होने का अनुमान है.
टेक्सटाइल, गारमेंट्स और संबंधित मैन्युफैक्चरिंग: जॉब 53% बढ़ सकती है.
ट्रेड, होटल और संबंधित सर्विसेज: जॉब 79% बढ़ सकती है.
रिपोर्ट इस पोटेंशियल को समझने के लिए बड़े पॉलिसी बदलावों की मांग करती है. डिमांड साइड पर, रिफॉर्म्स का मकसद होना चाहिए. घरेलू कंजम्प्शन को बढ़ावा देना चाहिए.
प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव्स (PLI) को लेबर-इंटेंसिव सेक्टर की ओर रीडायरेक्ट करना चाहिए. क्रेडिट तक पहुंच में सुधार करना होगा. इसके साथ ही लेबर रेगुलेशन को आसान बनाना. सप्लाई साइड पर, वोकेशनल एजुकेशन में एक फंडामेंटल बदलाव की जरूरत है.
इसमें वोकेशनल एजुकेशन और ट्रेनिंग (VET) को शुरुआती स्कूलिंग में इंटीग्रेट करना शामिल है. हायर एजुकेशन के लिए रास्ते बनाना होगा. इंडस्ट्री की मांगों के हिसाब से करिकुलम को अलाइन करना पड़ेगा. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को मजबूत करना होगा. साथ ही ग्लोबल स्टैंडर्ड के हिसाब से पब्लिक इन्वेस्टमेंट बढ़ाना पड़ेगा.
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