ईंधन की चौतरफा मार: पश्चिम एशिया संकट के बीच 10 दिन में 3 बार बढ़े तेल के दाम, भारत में EV की रफ्तार तेज
महंगे पेट्रोल-डीजल और पश्चिम एशिया संकट के कारण भारतीय कंपनियां घाटे से बचने के लिए तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों EV को अपना रही हैं.

Published : May 23, 2026 at 12:41 PM IST
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में एक बार फिर भारी बढ़ोतरी हुई है. इस ईंधन संकट ने भारतीय कंपनियों और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को अपनाने के लिए मजबूर कर दिया है. पिछले केवल दस दिनों में ईंधन की कीमतों में तीन बार संशोधन किया गया है, जिससे परिवहन पर निर्भर व्यवसायों पर आर्थिक बोझ काफी बढ़ गया है.
आर्थिक मजबूरी बना ईवी ट्रांजिशन
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि अब कंपनियों के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाना केवल पर्यावरण संरक्षण का जरिया नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक मजबूरी बन चुका है. वैश्विक स्तर पर, अप्रैल 2026 में ईवी पंजीकरण (EV Registrations) 1.6 मिलियन यूनिट को पार कर गया है, जो लगातार दूसरे महीने मजबूत वैश्विक मांग को दर्शाता है.
लॉजिस्टिक्स और मोबिलिटी स्टार्टअप 'ड्रिवन' की सह-संस्थापक और मुख्य व्यवसाय अधिकारी अल्पना जैन ने कहा, "तेल की कीमतें अब एक सामान्य उतार-चढ़ाव वाला कारक नहीं रह गई हैं, बल्कि यह व्यापार संचालन के लिए एक गंभीर खतरा बन चुकी हैं. एक बार कीमतों में उछाल आने से कंपनियों के बजट बिगड़ जाते हैं और मार्जिन कम हो जाता है." उन्होंने आगे बताया कि भारतीय व्यवसाय अब भारी पूंजी निवेश और रीसेल के जोखिम से बचने के लिए 'ईवी लीजिंग' का सहारा ले रहे हैं, जिससे उन्हें एक निश्चित मासिक परिचालन लागत का विकल्प मिल रहा है.
वैश्विक बाजार से अलग भारत की स्थिति
जहां एक तरफ सब्सिडी और टैक्स छूट खत्म होने के बाद उत्तरी अमेरिका में ईवी पंजीकरण में 28% और चीन में 8% की गिरावट देखी गई है, वहीं भारत की स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है. भारत में सरकारी नीतियों के समर्थन, बढ़ते डीजल के दामों और बी2बी (B2B) सेगमेंट में परिचालन लागत घटाने की होड़ के कारण ईवी की मांग लगातार बढ़ रही है.
स्थानीय स्तर पर बैटरी निर्माण को बढ़ावा
'मैक्सवोल्ट एनर्जी इंडस्ट्रीज' के सह-संस्थापक मुकेश गुप्ता ने कहा कि जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भरता कंपनियों के लिए बड़ा जोखिम है. यूरोप में चीनी इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 22% हो चुकी है, जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के बदलते स्वरूप को दिखाती है. गुप्ता के अनुसार, इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारतीय बैटरी निर्माताओं के लिए बड़ा अवसर पैदा हुआ है, क्योंकि घरेलू फ्लीट ऑपरेटर अब आयातित चीनी बैटरियों के बजाय स्थानीय स्तर पर प्रमाणित और समर्थित समाधानों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
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