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भारतीय निर्यातकों को यूरोपीय टैक्स से बचाने के लिए 'कार्बन मार्केट' जरूरी: CII-IIM रिपोर्ट

CII-IIM रिपोर्ट के अनुसार, यूरोपीय टैक्स (CBAM) से भारतीय निर्यातकों को बचाने के लिए देश में पारदर्शी कार्बन मार्केट बनाना बेहद जरूरी है.

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सांकेतिक फोटो (getty image)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : August 31, 2026 at 9:37 AM IST

3 Min Read
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नई दिल्ली: बदलते वैश्विक व्यापार नियमों के बीच भारतीय निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए भारत को तुरंत एक पारदर्शी और मजबूत घरेलू 'कार्बन मार्केट' व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है. भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) और आईआईएम अहमदाबाद की एक संयुक्त रिपोर्ट में यह बात सामने आई है. रिपोर्ट के अनुसार, एक बेहतर कार्बन-प्राइसिंग ढांचा न केवल देश के उद्योगों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने में मदद करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता भी बनाए रखेगा.

यह मुद्दा इसलिए बेहद गंभीर हो गया है क्योंकि यूरोपीय संघ (EU) का 'कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म' (CBAM) नियम लागू हो चुका है. इस नियम के तहत यूरोप में बाहर से आने वाले उन सामानों पर भारी पर्यावरण टैक्स लगाया जा रहा है, जिन्हें बनाने में ज्यादा प्रदूषण या कार्बन उत्सर्जन होता है. इसका सीधा असर भारत के स्टील, सीमेंट, एल्युमिनियम, फर्टिलाइजर, रिफाइनिंग और पेट्रोकेमिकल्स जैसे बड़े उद्योगों पर पड़ रहा है.

प्रामाणिक रिकॉर्ड बनाना बेहद जरूरी
रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि भारतीय कंपनियों को विदेशी टैक्स के बोझ से बचना है, तो उनके पास देश में किए गए कार्बन खर्च का एक पक्का, पारदर्शी और डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए. इसके लिए भारत को अपनी एक मजबूत 'घरेलू रजिस्ट्री' और सख्त चेकिंग व्यवस्था बनानी होगी. इसकी मदद से हमारे निर्यातक अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह साबित कर पाएंगे कि वे भारत में पहले ही पर्यावरण नियमों के तहत जरूरी खर्च कर चुके हैं.

कीमतों के दायरे पर सुझाव
कंपनियों को लंबी अवधि के निवेश के लिए भरोसा देने के लिए रिपोर्ट में 'प्राइस-कॉलर' तय करने का सुझाव दिया गया है. रिपोर्ट में समझने के लिए $22 से $60 प्रति टन का एक उदाहरण दिया गया है. हालांकि, यह साफ किया गया है कि ये आंकड़े केवल एक नीतिगत अनुमान हैं, न कि सरकार का कोई फैसला. भारत में यह कीमत रुपये में तय होगी, जो देश के आर्थिक विकास और हमारे उद्योगों की क्षमता के अनुकूल हो.

विकास और पर्यावरण में संतुलन
चूंकि भारत अभी तेजी से औद्योगिक विकास की राह पर है, इसलिए रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि शुरुआत में कंपनियों पर बहुत सख्त पाबंदियां लगाने के बजाय उत्सर्जन की तीव्रता को धीरे-धीरे कम करने पर ध्यान देना चाहिए. आगे चलकर जब नई और क्लीन टेक्नोलॉजी आसानी से उपलब्ध होगी, तब कड़े नियम लागू किए जा सकते हैं. साथ ही, सस्ते क्रेडिट की ओवर-सप्लाई को रोकने के लिए नियमों में कड़ाई बरतनी होगी ताकि कार्बन मार्केट की विश्वसनीयता बनी रहे.

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