ETV Bharat / business

150 साल की आर्थिक यात्रा में भारत ने कैसे बदली अपनी तकदीर? अर्थशास्त्री निरंजन राजाध्यक्ष से खास बातचीत

निरंजन राजाध्यक्ष भारत के एक प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री और नीति विशेषज्ञ हैं, जिन्होंने देश की आर्थिक नीतियों के विश्लेषण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.

Etv Bharat
निरंजन राजाध्यक्ष, अर्थशास्त्री (ETV Bharat)
author img

By ETV Bharat Hindi Team

Published : October 3, 2026 at 2:09 PM IST

|

Updated : October 3, 2026 at 2:16 PM IST

14 Min Read
Choose ETV Bharat

नई दिल्ली: भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में वैश्विक मंच पर चमक रहा है, लेकिन ब्रिटिश गुलामी के आर्थिक शोषण से लेकर आधुनिक डिजिटल क्रांति तक का यह सफर बेहद जटिल और नीतिगत बदलावों से भरा रहा है. देश के जाने-माने अर्थशास्त्री और लेखक निरंजन राजाध्यक्ष ने अपनी नई पुस्तक 'द आइडियाज दैट शेप्ड मॉडर्न इंडिया एंड इट्स इकॉनमी' में भारत के इसी 150 साल के वैचारिक और आर्थिक सफर को गहराई से टटोला है.

ईटीवी भारत के वरिष्ठ संवाददाता सौरभ शुक्ला से एक विशेष बातचीत में राजाध्यक्ष ने देश के शुरुआती समाजवादी मॉडल की सीमाओं, 1991 के ऐतिहासिक सुधारों की मजबूरी और आज के दौर में विनिर्माण व डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (UPI) के महत्व पर खुलकर चर्चा की. उन्होंने समझाया कि कैसे भारत ने समय के साथ अपनी नीतियां बदलीं और 'अमृत काल' में विकसित भारत बनने के लिए देश के सामने अब कौन सी तीन सबसे बड़ी चुनौतियां हैं. पेश है इस विशेष बातचीत के मुख्य अंश

सवाल: आपने अपनी किताब में देश के 150 साल के आर्थिक सफर को समेटा है. आपके अनुसार, वह कौन सा सबसे बड़ा सवाल है जिसका जवाब भारत इतने सालों से ढूंढने की कोशिश कर रहा है?
निरंजन राजाध्यक्ष: अगर आप बड़े फलक पर देखें, तो भारतीय राष्ट्रवाद की शुरुआत से ही तीन मुख्य स्तंभ या विषय रहे हैं—राजनीतिक स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और आर्थिक विकास. आज बहुत से लोग यह भूल जाते हैं कि अर्थव्यवस्था का मुद्दा हमारे स्वतंत्रता आंदोलन का एक बहुत ही केंद्रीय हिस्सा था.

अब सवाल आता है कि आर्थिक विकास क्यों जरूरी था? इसके पीछे भी तीन बड़ी वजहें थीं

  • बेहतर जीवन का अधिकार: भारत लंबे समय तक अत्यधिक गरीबी से जूझता रहा. आम इंसान की निजी जिंदगी को बेहतर बनाना और उसे बुनियादी सुविधाएं देना सबसे पहला मकसद था.
  • भू-राजनीतिक ताकत: एक जटिल और खतरनाक दुनिया में भारत अपनी संप्रभुता बनाए रख सके, इसके लिए हमारे पास आर्थिक गहराई और ताकत होना बेहद जरूरी था.
  • राष्ट्रीय एकता: जैसे-जैसे देश का आर्थिक विकास होगा, देश के अलग-अलग राज्य और हिस्से आपस में व्यापार के जरिए जुड़ेंगे. यह आर्थिक जुड़ाव अंततः पूरे देश को एक सूत्र में बांधने यानी राष्ट्रीय एकता का काम करेगा.

सवाल: आपने अपनी किताब की शुरुआत लोकहितवादी गोपाल हरी देशमुख के एक विचार 'लक्ष्मी की खोज' से की है. भारत के आर्थिक सफर को समझाने के लिए आपने इसी विचार को क्यों चुना?
निरंजन राजाध्यक्ष: लोकहितवादी ने अर्थशास्त्र को 'लक्ष्मी ज्ञान' कहा था. उन्होंने इसके लिए समुद्र मंथन की पौराणिक कथा का उदाहरण दिया था—यह विचार कि धन या समृद्धि आसमान से नहीं टपकती, बल्कि यह इंसानी मेहनत, सामूहिक प्रयास और आपसी सहयोग से निकलती है. मुझे लगता है कि अर्थशास्त्र को देखने का यह तरीका न सिर्फ बेहद प्रभावशाली है, बल्कि पूरी तरह से एक शुद्ध भारतीय सोच से जुड़ा हुआ है.

सवाल: दादाभाई नौरोजी और महात्मा गांधी से लेकर पंडित नेहरू और 1991 के आर्थिक सुधारों तक—क्या आपको लगता है कि भारत की आर्थिक सोच का सचमुच विकास हुआ या उसने सिर्फ समय के हिसाब से खुद को बदला?
निरंजन राजाध्यक्ष: इसमें दोनों बातें शामिल हैं. पिछले 150 वर्षों में कुछ बुनियादी विचार बिल्कुल नहीं बदले, जबकि कुछ चीजें हालातों के साथ बदल गईं. जो बात हमेशा स्थिर रही, वह था यह बुनियादी सवाल कि 'भारत को समृद्ध कैसे बनाया जाए और हमारी मुख्य समस्याएं क्या हैं'.

लेकिन एक ब्रिटिश उपनिवेश (गुलाम देश) से लेकर एक युवा स्वतंत्र राष्ट्र बनने, फिर औद्योगीकरण के दौर से गुजरने, उसके बाद बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ने और अब एक विकसित देश बनने के लक्ष्य तक—भारत ने हर मोड़ पर खुद को ढाला है. अर्थशास्त्र को जमीन पर चल रही हकीकत के हिसाब से बदलना ही पड़ता है. यह विज्ञान भी है और कला भी.

सवाल: आजादी के बाद से अब तक कई सरकारें आईं और गईं. ऐसी कौन-सी आर्थिक नीतियां थीं जो हमेशा एक जैसी रहीं, और वे वक्त के साथ कैसे बदलीं?
निरंजन राजाध्यक्ष: मुख्य उद्देश्य हमेशा एक ही रहा—देश का विकास और नागरिकों की भलाई. लेकिन उसे हासिल करने के तरीकों में दो बड़े बदलाव आए:

  • पहला बदलाव: हम 'नियोजित अर्थव्यवस्था' से 'बाजार अर्थव्यवस्था' की तरफ बढ़े. 1930 से 1950 के दशक में देश के नेताओं और उद्योगपतियों, दोनों का मानना था कि देश को चलाने के लिए सरकारी योजना जरूरी है. लेकिन 1991 तक आते-आते वह दौर खत्म हो गया और हमने निजी क्षेत्र व बाजार को ज्यादा मौका दिया.
  • दूसरा बदलाव: अंतरराष्ट्रीय व्यापार को लेकर हमारा नजरिया बदला. पहले हम अपने उद्योगों को बचाने के लिए बाहरी दुनिया के लिए दरवाजे बंद रखते थे (संरक्षणवाद), लेकिन बाद में हम वैश्विक अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गए.

सवाल: भारत में दशकों तक 'सरकारी नियंत्रण' बनाम 'मुक्त बाजार' की बहस चली है. क्या आज के समय में भारत ने इन दोनों के बीच एक सही संतुलन पा लिया है?
निरंजन राजाध्यक्ष: अर्थव्यवस्था में कोई भी संतुलन हमेशा के लिए 'परफेक्ट' नहीं होता, इसे वक्त के साथ बदलना पड़ता है. लेकिन पिछले 25-30 सालों में हमारे पास जो संतुलन है, वह पहले के मुकाबले भारत की जरूरतों के लिए बहुत बेहतर है.

हम पूरी तरह सरकार के भरोसे अर्थव्यवस्था नहीं चला सकते, क्योंकि प्लानिंग की अपनी सीमाएं होती हैं. लेकिन हम सब कुछ पूरी तरह बाजार के भरोसे भी नहीं छोड़ सकते. भारत जैसे देश में, जहां आज भी अवसर सबके लिए समान नहीं हैं, वहां सरकार की बहुत बड़ी भूमिका है. शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा और गरीबों को आर्थिक मदद देना सरकार का फर्ज है, क्योंकि विकास का फायदा सब तक पहुंचने में वक्त लगता है. जो लोग पहले अवसरों का लाभ उठा लेते हैं वे समृद्ध हो जाते हैं, जबकि बाकी लोगों को आधुनिक अर्थव्यवस्था में शामिल होने में समय लगता है.

aa
प्रशंसित अर्थशास्त्री निरंजन राजाध्यक्ष की नई पुस्तक 'द आइडियाज दैट शेप्ड मॉडर्न इंडिया एंड इट्स इकॉनमी (1870-2017)' का आधिकारिक बुक कवर लॉन्च (ETV Bharat)

सवाल: पंडित जवाहरलाल नेहरू के आर्थिक मॉडल को लेकर आज बहुत बहस होती है. आपकी रिसर्च क्या कहती है—क्या इस मॉडल ने शुरुआती दशकों में भारत की रफ्तार को रोका, या फिर इसने उस मजबूत विकास की नींव रखी जो हमें बाद में मिला?
निरंजन राजाध्यक्ष: मेरा मानना है कि नेहरूवियन मॉडल के शुरुआती दौर में काफी सफलताएं मिलीं, लेकिन समय के साथ इसकी सीमाएं भी सामने आ गईं. जब 1951 में भारत ने योजनाबद्ध विकास शुरू किया, तब हम दशकों की आर्थिक सुस्ती से बाहर निकल रहे थे. उसके बाद देश की विकास दर बढ़कर 4 से 4.5% तक पहुंच गई, जो उस समय के लिहाज से एक बड़ा बदलाव था. इसी दौर में स्टील, और भारी उद्योगों की नींव पड़ी. ये देश के लिए बेहद जरूरी बुनियादें थीं.

लेकिन दिक्कत यह थी कि यह पूरा विकास भारी सरकारी संरक्षण के बीच हुआ. उद्योगों को बाहरी प्रतिस्पर्धा से बचाकर रखा गया, जिससे हमारे कारखाने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने के काबिल नहीं बन पाए. संक्षेप में कहें तो, शुरुआती 10-15 साल अच्छे रहे, लेकिन लंबी अवधि में यह मॉडल बोझ बन गया. साल 1965 के आसपास यह साफ हो गया था कि अब हमें रास्ता बदलने की जरूरत है.

सवाल: अक्सर 1950 से 1980 के दौर की धीमी विकास दर को 'हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ' कहकर उसका मजाक उड़ाया जाता है. इसके लिए योजनाबद्ध मॉडल कितना जिम्मेदार था और बाहरी परिस्थितियां कितनी?
निरंजन राजाध्यक्ष: सच कहूं तो मुझे 'हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ' शब्द बिल्कुल पसंद नहीं है. यह सिर्फ एक मजाक के तौर पर शुरू हुआ था, लेकिन दुर्भाग्य से यह आर्थिक बहसों का हिस्सा बन गया.

जैसा कि मैंने कहा, असली गिरावट 1965 के बाद आई. उस दौरान भारत पर कई बाहरी मुसीबतएं एक साथ आईं—1962 में चीन के साथ युद्ध, 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध, 1967-68 और 1972-73 में देश में भीषण सूखा, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल का संकट, 1971 का युद्ध और बांग्लादेशी शरणार्थियों का संकट. इन सभी बाहरी कारणों ने देश की अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा वित्तीय बोझ डाला था. इन झटकों की बड़ी भूमिका थी, लेकिन मैं यह भी कहूंगा कि सिर्फ यही अकेले कारण नहीं थे. हमारी आर्थिक नीतियों में हुई गलतियां भी देश की रफ्तार धीमी होने के लिए उतनी ही जिम्मेदार थीं.

सवाल: जापान, चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों जैसे दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर ने भारत से बहुत पहले अपनी आर्थिक दिशा बदल ली थी. भारत कहां पीछे रह गया?
निरंजन राजाध्यक्ष: यह बहुत जरूरी सवाल है. 1950 के दशक में दक्षिण कोरिया, ताइवान और सिंगापुर जैसे देश भी वही कर रहे थे जो भारत कर रहा था. लेकिन 1960 के दशक के मध्य में उन्होंने अपनी रणनीति बदल दी. उन्होंने अपने उद्योगों को निर्यात-आधारित बनाया. वहां भी सरकारों की भूमिका थी, लेकिन उन्होंने अपने उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए खुला छोड़ दिया ताकि वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उत्पादन कर सकें.

भारत ने यहीं पर मौका गंवा दिया. हमें भी 1960 के दशक में अपनी अर्थव्यवस्था को खोल देना चाहिए था. इसके विपरीत, हम और ज्यादा बंद हो गए और संरक्षणवाद का रास्ता चुन लिया. नतीजा यह हुआ कि जब वैश्विक व्यापार तेजी से बढ़ रहा था, हम वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ने का एक बड़ा मौका चूक गए.

सवाल: क्या 1991 के आर्थिक सुधार सिर्फ एक मजबूरी का नतीजा थे, या फिर देश के भीतर लंबे समय से यह सोच बन रही थी कि अब बदलाव जरूरी है?
निरंजन राजाध्यक्ष: आम तौर पर लोग सोचते हैं कि 1991 के सुधार अचानक हुए क्योंकि हमारे पास विदेशी मुद्रा खत्म हो गई थी और हमें आईएमएफ से कर्ज लेना पड़ा था. लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है. देश के भीतर 1980 के दशक से ही यह समझ बनने लगी थी कि पुरानी नीतियां अब काम नहीं कर रही हैं. इंदिरा गांधी के दूसरे कार्यकाल (1980 के बाद) और फिर राजीव गांधी के समय में धीरे-धीरे घरेलू उद्योगों पर से नियंत्रण कम करने की शुरुआत हो चुकी थी. 1991 के संकट ने बस उस बदलाव की रफ्तार को बहुत तेज कर दिया.

सवाल: आपकी किताब में आर्थिक विचारों की बात की गई है. क्या भारत में नीतियों को अर्थशास्त्री तय करते हैं या राजनेता?
निरंजन राजाध्यक्ष: नीतियां हमेशा राजनेता ही तय करते हैं, क्योंकि लोकतंत्र में जनता के प्रति वे ही जवाबदेह होते हैं. अर्थशास्त्रियों का काम राजनेताओं को विकल्प और उनके परिणाम बताना होता है. जब तक किसी आर्थिक विचार को राजनीतिक समर्थन नहीं मिलता, वह नीति का रूप नहीं ले सकता. उदाहरण के लिए, 1991 में मनमोहन सिंह के विचारों को यदि पी.वी. नरसिम्हा राव का मजबूत राजनीतिक सहारा न मिलता, तो वे सुधार लागू नहीं हो पाते.

सवाल: भारत सरकार आज एक बार फिर घरेलू विनिर्माण और 'आत्मनिर्भरता' पर बहुत जोर दे रही है. आज की यह आत्मनिर्भरता पुराने दौर के संरक्षणवाद से कितनी अलग है?
निरंजन राजाध्यक्ष: आज की आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं है कि हम दुनिया से cut हो जाएं या पुरानी गलतियों को दोहराएं. असली 'आत्मनिर्भरता' का मतलब यह है कि देश के पास इतना विदेशी मुद्रा भंडार होना चाहिए कि हमें अपनी जरूरतों के लिए विदेशी कर्ज पर निर्भर न रहना पड़े.

आज की दुनिया में कोई भी देश सब कुछ अपने घर में नहीं बना सकता. लेकिन मौजूदा वैश्विक अनिश्चितताओं और युद्ध जैसे हालातों को देखते हुए कुछ चीजें बहुत संवेदनशील हो गई हैं—जैसे सेमीकंडक्टर या दवाओं के लिए जरूरी कच्चा माल (APIs). अगर संकट के समय इनकी सप्लाई रुक जाए, तो पूरा देश ठप हो सकता है. इसलिए, आज की नीति का मकसद पूरी दुनिया से कटना नहीं, बल्कि इन बेहद जरूरी और रणनीतिक चीजों में खुद को सुरक्षित करना है.

सवाल: आज भारत सेवा क्षेत्र में बहुत आगे है, लेकिन विनिर्माण में हम अभी भी पीछे हैं. क्या भारत बिना मजबूत मैन्युफैक्चरिंग के एक अमीर देश बन सकता है?
निरंजन राजाध्यक्ष: यह भारत के सामने सबसे अनोखी चुनौती है. दुनिया के इतिहास में जितने भी देश अमीर बने हैं, वे पहले खेती से मैन्युफैक्चरिंग में गए और फिर सर्विस सेक्टर में आए. भारत ने सीधे सर्विस सेक्टर में छलांग लगा दी. सर्विस सेक्टर ने हमें बहुत समृद्धि दी है, लेकिन यह कम कुशल या कम पढ़े-लिखे लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं दे सकता. करोड़ों युवाओं को रोजगार देने के लिए हमें फैक्ट्रियों और विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना ही होगा. हम केवल एक पैर पर खड़े होकर विकसित देश नहीं बन सकते.

सवाल: डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर UPI, आधार आदि ने भारत की अर्थव्यवस्था को कैसे बदला है और इसे आप इतिहास के किस मोड़ पर देखते हैं?
निरंजन राजाध्यक्ष: डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) या जिसे हम 'इंडिया स्टैक' कहते हैं, वह आधुनिक भारत की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक है. इसने दो बड़े काम किए हैं—पहला, इसने देश के सबसे गरीब नागरिक को सीधे बैंकिंग और डिजिटल इकॉनमी से जोड़ दिया है. दूसरा, इसने व्यापार करने की लागत को बहुत कम कर दिया है. आज एक छोटा रेहड़ी-पटरी वाला भी बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के डिजिटल भुगतान ले रहा है. यह एक ऐसा क्रांतिकारी विचार है जिसने भारत को दुनिया के कई विकसित देशों से भी आगे खड़ा कर दिया है.

सवाल: अगले 25 साल में भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनने के लिए किन मुख्य चुनौतियों को पार करना होगा?
निरंजन राजाध्यक्ष: भारत के सामने तीन सबसे बड़ी चुनौतियां हैं:

  • रोजगार और कौशल (Jobs & Skills): हमारे पास दुनिया की सबसे युवा आबादी है, लेकिन उन्हें सही कौशल देना होगा ताकि वे आधुनिक नौकरियों के काबिल बन सकें.
  • असमानता को कम करना: विकास का लाभ समाज के हर वर्ग और देश के हर हिस्से तक समान रूप से पहुंचना चाहिए, ताकि ग्रामीण भारत की मांग और खपत भी मजबूत बनी रहे.
  • जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा: हमें बड़े पैमाने पर ऊर्जा की जरूरत होगी, लेकिन हमें पर्यावरण को बचाते हुए ग्रीन एनर्जी (सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन) की तरफ तेजी से बढ़ना होगा.

यह भी पढ़ें- सिर्फ GDP ग्रोथ काफी नहीं; बाहरी झटकों को झेलने की आंतरिक क्षमता से तय होगी देश की असली तरक्की: एक्सपर्ट्स

Last Updated : October 3, 2026 at 2:16 PM IST