मिट्टी भूल जाइए, अब पुआल पर उगेगा आलू! बिहार के किसान का देसी जुगाड़ करेगा मालामाल
आलू की परंपरागत खेती काफी खर्चीली है ऐसे में नालंदा के किसान ने पुआल पर 'जीरो टिलेज' खेती करके कमाल कर दिखाया है-

Published : January 18, 2026 at 1:19 PM IST
नालंदा : क्या आपने कभी सुना है कि बिना खेत जोते और बिना मिट्टी चढ़ाए आलू की खेती हो सकती है? शायद नहीं, लेकिन बिहार के नालंदा में एक किसान ने इसे सच कर दिखाया है. जिसे लोग कचरा समझकर आग लगा देते थे, उसी 'पुआल' (पराली) पर यह किसान आलू उगा रहा है.
आधुनिक तरीके से आलू की खेती : जीरो टिलेज तकनीक कोई जादू नहीं, बल्कि आधुनिक खेती का वह नायब तरीका है, जिसने खेती की लागत को जमीन पर और मुनाफे को आसमान पर पहुंचा दिया है. एकंगरसराय प्रखंड के कुकुड़बर गांव के किसान विजेंद्र चौधरी और उनकी पत्नी यशोदा कुमारी का यह प्रयोग अब पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है.
जीरो टिलेज तकनीक से आलू की खेती : 55 वर्षीय विजेंद्र चौधरी और उनकी 40 वर्षीय पत्नी यशोदा कुमारी जीविका के साथ जुड़कर काम करते हैं. ये दोनों हमेशा कुछ नया करने की फिराक में रहते हैं. हाल ही में वे राजगीर में एक प्रशिक्षण शिविर में गए थे, जहां उन्हें 'जीरो टिलेज' (Zero Tillage) तकनीक के बारे में पता चला.
बिना जुताई आलू की खेती : घर लौटते ही विजेंद्र ने रिस्क लिया और अपने एक कट्ठा खेत में ट्रैक्टर चलवाने के वजाय सीधे धान की कटाई के बाद बचे खेत में आलू की बुआई कर दी. उन्होंने रस्सी के सहारे लाइन बनाई, जमीन पर खाद और बीज रखा और फिर उसे मिट्टी से ढंकने के बजाय धान के पुआल (बिचाली/पराली) से 10 इंच तक ढंक दिया.

30 किलो आलू की हुई है बुआई : गांव वाले हैरान थे कि यह कैसा पागलपन है, लेकिन आज जब पुआल के बीच से आलू के हरे-भरे पौधे और फूल निकल आए हैं, तो हर कोई इस तकनीक का मुरीद हो गया है. आलू की खेती में सबसे ज्यादा पैसा, खेत की तैयारी, जुताई और मजदूरों पर खर्च होता है.
1200 रुपए में 6 क्विंटल उपज : विजेंद्र ने इस तकनीक से इन सारे खर्चों को जीरो कर दिया है. उन्होंने बताया कि एक कट्ठा खेती में उनका कुल खर्च मात्र 1200 रुपए आया है. इसमें 30 किलो पोखराज आलू का बीज और खाद शामिल है. जुताई का एक पैसा नहीं लगा.

अब मुनाफे का गणित देखिए- विजेंद्र को उम्मीद है, कि इस एक कट्ठे से कम से कम 400 किलो और मौसम ने साथ दिया तो 600 किलो तक आलू निकलेगा. यानी 'हींग लगे न फिटकरी, और रंग चोखा'. वहीं दूसरी ओर पराली का सही इस्तेमाल से खेत में जलाने से रोकने में ये तकनीक काफी हद तक कारगर है. अक्सर धान की कटाई के बाद किसान पराली जला देते हैं, जिससे प्रदूषण फैलता है और खेत की मिट्टी भी खराब होती है. विजेंद्र चौधरी का यह मॉडल 'आम के आम और गुठलियों के दाम' वाली कहावत चरितार्थ करता है.
पराली न जलाने का विकल्प भी मिला : विजेंद्र चौधरी ने पराली को जलाने के बजाय उसे मल्चिंग (ढकने) के लिए इस्तेमाल किया. इससे खेत में नमी बनी रही और सिर्फ एक बार स्प्रे से सिंचाई करनी पड़ी. आलू तैयार होने के बाद यही पुआल खेत में सड़कर खाद बन जाएगा, जो अगली फसल के लिए वरदान साबित होगा. मैट्रिक और इंटर में पढ़ने वाले अपने बच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहे विजेंद्र अब दूसरे किसानों को भी सिखा रहे हैं कि खेती घाटे का सौदा नहीं, बस तरीका बदलने की जरूरत है.

"अभी हमने एक कट्ठे में आलू की खेती जीरो टिलेज विधि से की है. खेत में पुआल बिछाकर खाद छिड़कर आलू की बुआई कर दी. खेत में थोड़ी नमी होनी चाहिए फिर पूरे खेत में पुआल बिछाकर आलू की बुआई की जाती है. अभी तक परिणाम काफी अच्छे मिले हैं. सबकुछ ठीक रहा तो 1200 की लागत में 6 क्विंटल तक आलू निकल आएगा. ये खेती सफल होने पर अगली साल व्यापक तौर पर करेंगे." विजेंद्र चौधरी, किसान
कौन हैं आधुनिक किसान विजेन्द्र चौधरी : विजेंद्र चौधरी मध्ययम वर्गीय परिवार से आते हैं. दो संतान हैं. दोनों पढ़ाई कर रहे हैं. 2016 में जीविका समूह से जुड़कर अपनी आजीविका को नई उड़ान दे रहे हैं. एकंगरसराय के कुकुरबर गांव की पहचान कारगिल युद्ध में शहीद हरदेव प्रसाद सिंह के बाद ज़ीरो टिलेज पद्धति से आलू की खेती कर रहे किसान विजेंद्र चौधरी और उनकी पत्नी यशोदा कुमारी के नाम से चर्चित हो रहा है.
Research revealed various benefits of growing potato 🥔 in rice paddies between crop cycles using zero tillage and rice stalks or mulch as a ground cover:
— International Potato Center (@Cipotato) March 25, 2024
✅ high potato yield
✅ profitability
✅ nutrient-use efficiency
✅ water efficiency
👉🏽 https://t.co/e7ovmJhLbU pic.twitter.com/kjyJRp1mmF
जीरो टिलेज खेती क्या है? : इस पद्धति के जरिए खेत में जुताई की शून्य जरूरत होती है इसलिए इसे Zerp Tillage Farming कहते हैं. जुताई किए बिना फसल के अवशेषों को मिट्टी पर ही छोड़कर विशेष ड्रिल मशीन के जरिए सीधे जमीन में बोया जाता है. इस पद्धति से खेत की नमी को पुआल टूटने नहीं देता. पुआल के नीचे जैविक गतविधि और संरचना बनी रहती है, मिट्टी का कटाव रुकता और पानी को बचाया जाता है. पानी की बचत होने से खेती की लागत में कमी आती है.
आलू की खेती में मुनाफा ही मुनाफा : नालंदा के एकंगरसराय प्रखंड की विजेंद्र चौधरी और पत्नी यशोदा कुमारी जीरो टिलेज तकनीक से आलू की खेती करके मुनाफा का जरिया बना रही हैं. कम लागत, कम समय और अधिक उत्पादन देने वाली जीरो टिलेज पद्धति से आलू की खेती नालंदा जिले में तेजी से लोकप्रिय हो रही है. इस आधुनिक तकनीक से किसान बिना जुताई, धान कटनी के बाद बचे पराली का उपयोग कर आलू की खेती कर रहे हैं. इस विधि से जहां खेती की लागत में भारी कमी आ रही है, वहीं मिट्टी की उर्वरता बनी रह रही है, साथ ही पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिल रहा है.

कारगर है जीरो टिलेज आलू की खेती : स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं भी इस तकनीक को अपनाकर सफल खेती कर रही हैं, जो अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बन रही हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, जीरो टिलेज पद्धति से कम मजदूरी, कम मेहनत और अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन मिलता है. यदि यह प्रयोग सफल रहा तो आने वाले वर्षों में इसे बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा. किसान विजेन्द्र चौधरी ने इस तकनीकि से 1 कट्ठे में खेती की है, ताकि इसके बताए गए मुनाफे को आंककर आगे इसी पद्धति से खेती को अपना सकें.
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