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स्पोर्ट्स गुड्स में ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने का टारगेट; क्या भारत तोड़ पाएगा चीनी दीवार?

जालंधर-मेरठ में खेल का सामान बनाने वाली हजारों फैक्ट्रियां, बजट में 500 करोड़ का प्रावधान, दुनियाभर में जाएंगे हमारे खेल के आइटम.

भारत से खेल के सामानों का बढ़ेगा निर्यात.
भारत से खेल के सामानों का बढ़ेगा निर्यात. (Photo Credit; ETV Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : February 4, 2026 at 10:51 AM IST

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हैदराबाद : खेलकूद के सामानों के निर्माण में भारत ग्लोबल हब बनेगा. अब यहां मैक्सिमम इंटरनेशनल लेवल के आइटम तैयार होंगे. मैन्युफैक्चरिंग को रफ्तार देने के लिए भारत सरकार ने बजट में 500 करोड़ का प्रावधान किया है. कुछ नई स्ट्रेटजी भी बनाने पर जोर है. एक्सपर्ट का मानना है कि इस कदम से भारत चीन को चुनौती दे सकता है.

देश में आगामी वर्षों में होने वाली खेलकूद प्रतियोगिताओं को लेकर इसे अहम फैसला माना जा रहा है. साल 2026 में एथलेटिक्स चैंपियनशिप होगी. साल 2030 में कॉमनवेल्थ गेम भी होने हैं. इसके अलावा वर्ष 2036 में भारत ओलंपिक की मेजबानी के लिए भी दावेदारी कर चुका है.

अब काफी युवा खेलकूद में अपना करियर बनाने लगे हैं. अरबों के खेलकूद के सामान भी यहीं तैयार हो रहे हैं. विदेश में भी इनका निर्यात (Export) किया जाता है. काफी लोगों को इससे रोजगार भी मिला हुआ है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खेलो इंडिया मिशन शुरू करने की भी बात कही है.

उन्होंने खेलकूद के सामानों के निर्माण और गुणवत्ता में सुधार के लिए 'समर्थ पहल' का प्रस्ताव भी रखा है. इससे क्रिकेट बैट, हॉकी स्टिक, फुटबॉल जिम, जिम उपकरण समेत कई सामान अब अपने देश में बड़े लेवल पर तैयार हो सकेंगे. दुनिया में सबसे ज्यादा खेल के सामान चीन बनाता है. जबकि भारत एशिया में तीसरे स्थान पर है.

देश में स्पोर्ट इंडस्ट्री की मौजूदा हालत क्या है?, कितने करोड़ के सामान विदेश भेजे जाते हैं?, कंपनियों का कितना टर्नओवर है?. देश में खेलों के सामान बनाने वाली कितनी कंपनियां हैं?, कितने लोगों को इससे रोजगार मिला हुआ है?. ईटीवी भारत के इस एक्सप्लेनर में इन सभी सवालों के जवाब जानेंगे...

खेल सामान उद्योग के लिए सरकार की क्या है प्लानिंग? : यूनियन बजट 2026–27 में भारत के स्पोर्ट्स इकोसिस्टम को मजबूत करने के लिए बड़ा कदम उठाया गया है. डेवलपमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है. रोजगार के मौके भी पैदा करने पर फोकस है.

ग्लोबल स्पोर्ट्स मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम में भारत की क्षमता को पहचानते हुए इस बार के बजट में 500 करोड़ का प्रावधान किया गया है. वित्त मंत्री ने कहा कि भारत में हाई क्वालिटी के सस्ते स्पोर्ट्स गुड्स तैयार होते हैं. ऐसे में देश इस क्षेत्र में ग्लोबल हब बनने की क्षमता रखता है. वहीं सरकार की इस पहल से इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा, ग्लोबल स्पोर्ट्स सप्लाई चेन में भारत की स्थिति मजबूत होगी.

खेल के सामानों के निर्यात में नंबर वन है चीन.
खेल के सामानों के निर्यात में नंबर वन है चीन. (Graphics Credit; ETV Bharat)

कितने करोड़ के खेल के सामानों का निर्यात होता है? : भारत सरकार के कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री, डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स के लेटेस्ट डेटा के मुताबिक साल 2024–25 के वित्तीय वर्ष के दौरान भारत से 3,378.49 करोड़ के स्पोर्ट के सामान विदेश भेजे गए थे. साल 2024 में अप्रैल से नवंबर तक 287.74 करोड़ का निर्यात हुआ था. जबकि साल 2025 में इन्हीं महीनों के दौरान 295.39 करोड़ रुपये के सामानों का निर्यात किया गया था.

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कितना है सालाना टर्नओवर, कितने लोगों को मिला है रोजगार? : देश के खेल के सामान बनाने वाली कंपनियों का सालान टर्नओवर मौजूदा समय करीब 57 हजार करोड़ है. साल 2030 में इसके 90 हजार 420 करोड़ होने का अनुमान है. यानी कि इसमें काफी बढ़ोतरी देखने को मिलेगी. भारतीय स्पोर्ट्स गुड्स इंडस्ट्री में करोब 5 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है.

देश में सबसे पहले स्पोर्ट्स का सामान किस जगह बनना शुरू हुआ? : भारत में स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री 13 अप्रैल 1883 को सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में शुरू हुई थी. सरदार गंडा सिंह ओबेरॉय ने इस इंडस्ट्री को शुरू करने का सपना देखा. उन्होंने सियालकोट में ओबेरॉय लिमिटेड की स्थापना की. मई 1884 में इंग्लैंड को स्पोर्ट्स का पहला सामान भेजा.

भारत से कई देशों में भेजे जाते हैं खेल के सामान.
भारत से कई देशों में भेजे जाते हैं खेल के सामान. (Graphics Credit; ETV Bharat)

जब 1947 में भारत का बंटवारा हुआ तो सियालकोट के बहुत सारे काबिल हिंदू कारीगर सीमा पार करके पंजाब चले गए, और जालंधर और मेरठ में बस गए, जहां आज भारतीय स्पोर्ट्स प्रोडक्ट्स इंडस्ट्री है. जब इन इलाकों में एक्सपर्ट्स का आना शुरू हुआ तो बिजनेसमैन जालंधर और मेरठ आने लगे. इस तरह भारतीय स्पोर्ट्स गुड्स इंडस्ट्री की शुरुआत 1948 में हुई. ये इंडस्ट्री मुख्य रूप से जालंधर और मेरठ में हैं.

दुनिया के और कौन से देश बनाते हैं खेल के सामान? : चीन, वियतनाम, चीनी ताइपे, यूएस, जर्मनी इटली, फ्रांस, थाईलैंड, नीदरलैंड, जापान, ऑस्ट्रिया आदि देशों में खेल के सामान बनते हैं. इन देशों में स्थित इकाइयां भी लाखों-करोड़ों में व्यापार करती हैं. सबसे ज्यादा खेल के सामानों का प्रोडक्शन एशिया-पैसिफिक इलाके में होता है. यह दुनिया के सबसे बड़े स्पोर्ट्स गुड्स इंडस्ट्री में से एक है.

भारत से खेल के सामानों के निर्यात का टर्नओवर.
भारत से खेल के सामानों के निर्यात का टर्नओवर. (Graphics Credit; ETV Bharat)

स्पोर्ट्स का सामान बनाने में कौन सा देश है नंबर 1? : चीन लंबे समय से दुनियाभर में स्पोर्ट्स के सामान का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है. 1996 में इस देश का पूरी दुनिया के स्पोर्ट्स के सामान के एक्सपोर्ट के मामले में 32% हिस्सेदारी थी. साल 2010 में यह 59% तक पहुंच गया. साल 2024 में चीन ने 1,650 करोड़ के स्पोर्ट्स इक्विपमेंट एक्सपोर्ट किए.

स्पोर्ट्स इक्विपमेंट (खेल सामग्री) चीन से सबसे ज्यादा एक्सपोर्ट होने वाले प्रोडक्ट में से एक था. चीन के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ स्पोर्ट और नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स की ओर से जारी डेटा के मुताबिक चीन में स्पोर्ट्स के सामान और उससे जुड़े प्रोडक्ट का कारोबार 21 हजार 460 करोड़ रुपये हैं.

साल 2024 के आंकड़ों के अनुसार चीन ने अपने प्रोडक्ट यूनाइटेड स्टेट्स, जर्मनी, जापान, कनाडा भेजे. यूनाइटेड स्टेट्स, हांगकांग और वियतनाम ने चीन से सबसे ज्यादा सामान लिए. चीन ने मुख्य रूप से स्पोर्ट्सवियर, एथलेटिक फुटवियर, ट्रेडमिल, फिटनेस इक्विपमेंट, आर्टिफिशियल टर्फ, रोलर स्केट्स और स्केटबोर्ड का निर्यात किया.

स्पोर्ट्स गुड्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए सरकार की पॉलिसी क्या है ? : भारतीय स्पोर्ट्स गुड्स के डेवलपमेंट और उनके प्रदर्शन के लिए स्पोर्ट्स गुड्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (SGEPC) रेगुलर तौर पर इंटरनेशनल और डोमेस्टिक ट्रेड इवेंट्स ऑर्गनाइज करती है. भारतीय खेल के सामानों, इसकी सेवा को प्रमोट और निर्यात में अहम रोल निभाने के लिए मार्केट एक्सेस इनिशिएटिव (MAI) स्कीम लागू की गई है. भारतीय निर्यातकों को सपोर्ट करने के लिए ड्यूटीज और एक्सपोर्टेड प्रोडक्ट्स की छूट की स्कीम भी लागू की गई है.

मार्केट डेवलपमेंट असिस्टेंस (MDA) स्कीम : MDA स्कीम मुख्य रूप से इंटरनेशनल मार्केट में एक्सपोर्ट प्रमोशन एक्टिविटी में एक्सपोर्टर्स की मदद करने के लिए काम करती है. यह स्कीम LAC, अफ्रीका, CIS और ASEAN इकॉनमी जैसे इंटरनेशनल रीजन पर एक्सपोर्ट प्रमोशन प्रोग्राम को फोकस करने में मदद करती है.

मार्केट एक्सेस इनिशिएटिव (MAI) : MAI स्कीम का मुख्य मकसद इंटरनेशनल मार्केट में भारतीय सामान के एक्सपोर्ट को बढ़ावा देना है. इस स्कीम के तहत एक्सपोर्ट और ट्रेड प्रमोशन ऑर्गनाइजेशन, नेशनल इंस्टीट्यूट, रिसर्च इंस्टीट्यूट, एक्सपोर्टर वगैरह को वित्तीय सहायता मुहैया कराई जाती है. भारत सरकार खेल के सामानों के निर्माण को बढ़ावा देती है.

भारत में कई कंपनियां बनाती है खेल के सामान.
भारत में कई कंपनियां बनाती है खेल के सामान. (Graphics Credit; ETV Bharat)

स्पोर्ट्स गुड्स बनाने वाली कंपनियों की क्या है हालत? : भारत एशिया में खेल के सामान बनाने वाला तीसरा बड़ा निर्माता है. भारत में स्पोर्ट्स गुड्स इंडस्ट्री ने पिछले 6 दशकों में काफी विकास किया है. भारतीय अर्थव्यवस्था में भी इसका योगदान रहता है. इंडियन स्पोर्ट्स गुड्स इंडस्ट्री में 318 आइटम बनते हैं.

इनमें फुलाने योग्य बॉल, हॉकी स्टिक और बॉल, क्रिकेट बैट और बॉल, बॉक्सिंग का सामान, मछली पकड़ने का सामान, कैरम और चेस बोर्ड जैसे इनडोर गेम और अलग-अलग तरह के उपकरण शामिल हैं. इस इंडस्ट्री में काफी संख्या के कमजोर तबके को रोजगार मिला हुआ है. काफी संख्या में महिलाएं भी काम कर रहीं हैं. इंडिया Mitre, Lotto, Umbro और Wilson जैसे ब्रांड इन सामानों को तैयार कर रहे हैं.

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खेल सामग्री बनाने वाले उद्यमियों की परेशानी : उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले को स्पोर्ट सिटी कहा जाता है. यहां काफी संख्या में बैट, बॉल समेत अन्य खेलकूद सामग्री तैयार की जाती है. स्पोर्ट्स गुड्स एवं टॉयज एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (SGEPC) के चेयरमैन सुमनेश अग्रवाल का कहना है कि सरकार को इकाई लगाने के लिए सस्ती दरों पर जमीन उपलब्ध करानी चाहिए. जिससे उन्हें सुविधा मिल सके.

उनका कहना है कि स्पोर्ट्स गुड्स सहित तमाम कच्चे उत्पादों पर 18% तक जीएसटी है, जबकि तैयार माल पर 5% जीएसटी है. इसे कम किया जाना चाहिए. स्पोर्ट्स कारोबारी राकेश महाजन का कहना है कि काफी समय से उद्यमी कश्मीर विलो (kashmiri willow) की मांग कर रहे हैं. इसी से बैट बनता है. कारोबारियों को देश के बाहर से (English willow) मंगानी पड़ रही है. जबकि जम्मू कश्मीर में देशी विलो है. धारा 370 हटने के बावजूद वह नहीं मिल पा रही है.

देश में बनाए जाते हैं 300 से अधिक खेल के सामान.
देश में बनाए जाते हैं 300 से अधिक खेल के सामान. (Graphics Credit; ETV Bharat)

यूपी का मेरठ नंबर 1, जालंधर दूसरा बड़ा हब : भारत में स्पोर्ट्स गुड्स के प्रोडक्शन की इकाइयां माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइजेज (MSMEs) की ओर से चलाई जाती हैं. उत्तर प्रदेश का मेरठ सबसे बड़ा क्लस्टर है. यहां 35,200 से ज्यादा रजिस्टर्ड स्पोर्ट्स गुड्स बनाने वाली यूनिट हैं. पूरे भारत के खेल के सामानों के निर्यात का 40% यहीं से आता है.

पंजाब का जालंधर दूसरा बड़ा हब है. यहां 3 हजार से ज्यादा यूनिट हैं. यहां हाथ से सिले हुए बॉल और प्रोटेक्टिव गियर बनाए जाते हैं. इन पुराने हब के अलावा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और जम्मू जैसे उभरते हुए मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र भी स्पोर्ट्सवियर, इनडोर स्पोर्ट्स एक्सेसरीज आदि में अपनी क्षमताएं बढ़ा रहे हैं.

पंजाब का जालंधर और यूपी का मेरठ देश के कुल खेल सामग्री का करीब 75 से 80% हिस्सा तैयार करते हैं. साल 2019-20 में भारत खेल सामग्री का 24वां सबसे बड़ा निर्यातक था. उस दौरान वैश्विक निर्यात में इसकी हिस्सेदारी .56% थी.

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