आखिर मानसून क्यों थम गया? क्या अल नीनो लाएगा सूखा, महंगाई और पानी का संकट?
अगर बारिश कम हुई तो क्या होगा, क्या महंगाई बढ़ेगी? क्या फसलें प्रभावित होंगी?

Published : June 25, 2026 at 2:24 PM IST
|Updated : June 25, 2026 at 3:41 PM IST
ईटीवी भारत वीडियो टीम
जून का महीना करीब पूरा महीना गुजर चुका है, लेकिन देश के कई हिस्सों में अब भी लोग बारिश का इंतजार कर रहे हैं. मानसूनी बादल हैं, लेकिन बरस नहीं रहे. IMD के आंकड़े बताते हैं कि 4 जून से 15 जून के बीच देश में जितनी बारिश होनी चाहिए थी, उससे 64 प्रतिशत कम बारिश हुई है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत 16 राज्यों में मानसून की रफ्तार थम गई है.
सवाल है कि क्या इस साल मानसून कमजोर पड़ रहा है? क्या अल नीनो इसकी वजह है? अगर बारिश कम हुई तो क्या होगा, क्या महंगाई बढ़ेगी? क्या फसलें प्रभावित होंगी और आखिर वैज्ञानिक क्यों कह रहे हैं कि आने वाले महीने बेहद अहम हैं?
इस समय मानसून तेलंगाना के भद्राचलम इलाके के आसपास अटका हुआ है. मानसूनी हवाएं आगे बढ़ने की बजाय कमजोर पड़ गई हैं. 15 जून की सैटेलाइट तस्वीरों में देश के बड़े हिस्से से मानसूनी बादल गायब दिखाई दिए. IMD के मुताबिक 4 जून से 15 जून के बीच देश में सामान्य रूप से 53.7 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन हुई केवल 19.2 मिलीमीटर यानी बारिश में 64 प्रतिशत की कमी. इसी वजह से मौसम वैज्ञानिक लगातार एक शब्द दोहरा रहे हैं- अल नीनो.
क्या है अल नीनो?
भारत में बारिश कम हो रही है, लेकिन इसकी कहानी हजारों किलोमीटर दूर प्रशांत महासागर से शुरू होती है. सामान्य परिस्थितियों में, पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली ट्रेड विंड्स गर्म समुद्री पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती हैं. यही गर्म पानी बादलों को जन्म देता है और यही सिस्टम भारतीय मानसून को ऊर्जा देता है, लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं तो समुद्र का संतुलन बिगड़ जाता है और गर्म पानी वापस मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की ओर फैलने लगता है. समुद्र का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है. इसी स्थिति को वैज्ञानिक अल नीनो कहते हैं.
अल नीनो सिर्फ समुद्र का तापमान नहीं बढ़ाता. ये पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है. समुद्र गर्म होता है, उसके ऊपर की हवा गर्म होती है. बादलों का पैटर्न बदलता है. हवाओं की दिशा बदलती है और मानसून कमजोर पड़ सकता है. IMD के मुताबिक, अल नीनो के वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश होने की आशंका बढ़ जाती है.

वैज्ञानिक अल नीनों का पता कैसे लगाते हैं?
अब सवाल ये है कि वैज्ञानिकों को कैसे पता चलता है कि अल नीनो आ रहा है? वैज्ञानिक प्रशांत महासागर के एक विशेष हिस्से की लगातार निगरानी करते हैं. अगर प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान लगातार पांच महीनों तक सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा बना रहे, तो उसे अल नीनो का संकेत माना जाता है. इस बार चिंता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि कुछ हिस्सों में तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा ऊपर पहुंच चुका है और समुद्र की सतह के नीचे का पानी लगभग 6 डिग्री तक ज्यादा गर्म रिकॉर्ड किया गया है. ऐसे हालात 1997-98 और 2015-16 जैसे मजबूत अल नीनो वर्षों में भी देखे गए थे.
भारत पर अल नीनों का असर
विश्व मौसम संगठन यानी WMO ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से में सामान्य से कम बारिश हो सकती है. IMD ने भी इस बार मानसून को लोंग पीरियड एवरेज यानी LPA का लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान दिया है यानि इस बार 10 प्रतिशत कम बारिश का अनुमान. अगर बारिश और कम हुई तो सबसे पहले असर खेती पर दिखाई देगा. धान, मक्का, सोयाबीन और दूसरी खरीफ फसलें मानसून पर निर्भर हैं. बारिश कम हुई तो उत्पादन घटेगा. उत्पादन घटा तो कीमतें बढ़ेंगी और कीमतें बढ़ीं तो महंगाई सीधे आपकी जेब तक पहुंचेगी. वहीं, पीने के पानी पर भी संकट आ सकता है. बिजली उत्पादन पर असर पड़ सकता है. 2015-16 के अल नीनो के दौरान भारत में मक्का उत्पादन लगभग 4 प्रतिशत और धान उत्पादन करीब 1 प्रतिशत घट गया था. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां चेतावनी दे चुकी हैं कि इसका असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे एशिया के खाद्य बाजार प्रभावित हो सकते हैं.

भारत को बारिश का इंतजार
मानसून के सामान्य समय से एक हफ्ता ज्यादा बीत गया है. फिर भी बारिश के बादल मुंबई तक नहीं पहुंच पाए हैं. इससे देश भर में बारिश की कमी बढ़कर 35% हो गई है. यह आंकड़ा मंगलवार 16 जून तक का है। अल नीनो का असर सबसे ज्यादा महाराष्ट्र, कोंकण तट और मध्य भारत में दिख रहा है. यहां मानसून की उत्तर दिशा की चाल कई दिनों से अटकी हुई है. मौसम विभाग (IMD) के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर पश्चिम भारत में हालात थोड़े बेहतर हैं. वहां सामान्य से 5% ज्यादा बारिश हुई है। लेकिन बाकी सभी इलाके बारिश की कमी से जूझ रहे हैं.
पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में 43% कमी दर्ज हुई है. मध्य भारत में यह आंकड़ा सबसे खराब है, यानी 61% की कमी. दक्षिणी प्रायद्वीप में भी 14% कमी देखी गई है. इन आंकड़ों से साफ है कि मानसून का असर देश के बड़े हिस्से में कमजोर पड़ा है.

कब कमजोर पड़ जाता है अल नीनो?
क्या अल नीनो हमेशा सूखा लाता है. दिलचस्प बात ये है कि अल नीनो हमेशा सूखे की गारंटी नहीं होता. पिछले 70 सालों में तीन सुपर अल नीनो आए. 1982-83, 1997-98 और 2015-16. 1982 और 2015 में भारत के कई हिस्सों में कम बारिश और सूखे जैसी स्थिति बनी, लेकिन 1997 में ऐसा नहीं हुआ. उस साल अल नीनो बेहद मजबूत था, फिर भी भारतीय मानसून लगभग सामान्य रहा, क्योंकि उस समय हिंद महासागर की परिस्थितियां मानसून के पक्ष में थीं.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय मानसून को सिर्फ अल नीनो ही प्रभावित नहीं करता. इसके अलावा दो और बड़े मौसमीय कारक हैं इंडियन ओशन डाइपोल यानी आईओडी और मैडन-जूलियन ऑसिलेशन यानी एमजेओ. आईओडी हिंद महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों के समुद्री तापमान के अंतर को कहते हैं. जब पश्चिमी हिंद महासागर का पानी ज्यादा गर्म और पूर्वी हिस्सा अपेक्षाकृत ठंडा होता है, तो इसे सकारात्मक आईओडी कहा जाता है. ऐसी स्थिति भारत की ओर ज्यादा नमी खींच सकती है और मानसून को मजबूत बनाने में मदद करती है.
वहीं, एमजेओ बादलों और बारिश का एक विशाल चलता-फिरता सिस्टम है, जो पूरी पृथ्वी के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में घूमता रहता है. जब एमजेओ हिंद महासागर और भारत के आसपास सक्रिय होता है तो मानसूनी गतिविधियां तेज हो जाती हैं और बारिश बढ़ सकती है, लेकिन जब ये प्रशांत महासागर की ओर चला जाता है, तो भारत में बारिश कमजोर पड़ सकती है और 'ब्रेक इन मानसून' जैसी स्थिति बन सकती है. यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक सिर्फ अल नीनो को देखकर मानसून का अंतिम अनुमान नहीं लगाते. आईओडी और एमजेओ जैसे कारक भी यह तय करते हैं कि भारत में बारिश कितनी होगी.
फिलहाल अल नीनो भारत के लिए एक चेतावनी है, आपदा नहीं... लेकिन अगर आने वाले हफ्तों में मानसून मजबूत नहीं हुआ, तो इसका असर खेतों से लेकर बाजार तक और बाजार से लेकर आपकी जेब तक दिखाई दे सकता है. यानी इस समय सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक प्रशांत महासागर पर नजर टिकाए हुए हैं.

