Explainer: बिहार के गवर्नर सैयद अता हसनैन को खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए क्यों चुना गया?
खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन ने किया, उनके चयन के पीछे क्या संदेश है? रिपोर्ट- कृष्णनंदन

Published : July 4, 2026 at 7:24 PM IST
पटना : ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आयातुल्लाह सैयद अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में भारत की ओर से बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा ने हिस्सा लिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ईरान की ओर से औपचारिक निमंत्रण मिला था, लेकिन पूर्व निर्धारित विदेश यात्राओं और अन्य कार्यक्रमों के कारण भारत ने उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया. विदेश मंत्रालय के अनुसार यह निर्णय भारत और ईरान के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और जनस्तरीय संबंधों की संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर लिया गया.
आखिर बिहार के राज्यपाल को ही क्यों चुना गया? : इस प्रतिनिधिमंडल में सबसे अधिक चर्चा बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन के चयन को लेकर हो रही है. आम तौर पर ऐसे अवसरों पर विदेश मंत्रालय या केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री ही भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं. ऐसे में बिहार के राज्यपाल को इस जिम्मेदारी का मिलना केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक सोच और संतुलित विदेश नीति का संकेत माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यक्ति की क्षमता, अनुभव और वैश्विक समझ को ध्यान में रखकर लिया गया.
कश्मीर से पश्चिम एशिया तक रणनीतिक मामलों के जानकार : सैयद अता हसनैन को केवल सैन्य अधिकारी के रूप में नहीं देखा जाता. राष्ट्रीय सुरक्षा, इस्लामिक दुनिया, पश्चिम एशिया की राजनीति और भू राजनीतिक समीकरणों पर उनकी गहरी समझ उन्हें अलग पहचान देती है. वर्षों से वे इन विषयों पर शोध, लेखन और व्याख्यान देते रहे हैं. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उन्हें एक गंभीर रणनीतिक विशेषज्ञ माना जाता है.
रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने बताया चयन के पीछे बड़े कारण : सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर प्रवीण कुमार के अनुसार सैयद अता हसनैन के चयन के पीछे तीन प्रमुख कारण हैं. पहला उनका व्यापक सैन्य और रणनीतिक अनुभव. दूसरा उनकी सांस्कृतिक और सामाजिक स्वीकार्यता. तीसरा उनका वर्तमान संवैधानिक पद. इन तीनों पहलुओं ने उन्हें इस महत्वपूर्ण अवसर के लिए स्वाभाविक विकल्प बना दिया. खामेनेई का अंतिम संस्कार 4 जुलाई से शुरू होकर 9 जुलाई तक चलेगा.
पश्चिम एशिया की राजनीति और सुरक्षा मामलों की गहरी समझ : ब्रिगेडियर प्रवीण कुमार का कहना है कि- ''सैयद अता हसनैन लंबे समय से पश्चिम एशिया की राजनीति, इस्लामिक समाज और क्षेत्रीय सुरक्षा पर अध्ययन करते रहे हैं. सेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इस कारण वे ऐसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय अवसर पर भारत की सोच और दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में सक्षम हैं.''
भारत की विविधता और समावेशी पहचान का प्रतीक : विशेषज्ञों का मानना है कि सैयद अता हसनैन की मौजूदगी भारत की बहुलतावादी और समावेशी पहचान को भी सामने लाती है. एक प्रतिष्ठित सैन्य अधिकारी, संवैधानिक पदाधिकारी और इस्लामिक दुनिया की समझ रखने वाले व्यक्तित्व के रूप में उनकी उपस्थिति ईरान सहित पूरी दुनिया को यह संदेश देती है कि भारत अपनी विविध सामाजिक संरचना और साझा सभ्यतागत विरासत को सम्मान देता है.
Hon’ble @GovernorBihar and I represented India at the funeral ceremony for Grand Ayatollah Seyyed Ali Khamenei, former Supreme Leader of Iran, in Tehran.
— Pabitra Margherita (@PmargheritaBJP) July 3, 2026
Conveyed our respects on behalf of the Government and the people of India.@PMOIndia@MEAIndia pic.twitter.com/cK4bYZ6Lot
''एक प्रतिष्ठित भारतीय व्यक्तित्व और पूर्व सैन्य अधिकारी के रूप में सैयद अता हसनैन की मौजूदगी भारत की बहुलतावादी और समावेशी पहचान को भी सामने लाती है. इससे ईरान को यह संदेश जाता है कि भारत अपने विविध समाज और साझा सभ्यतागत संबंधों को महत्व देता है. पश्चिम एशिया के सामरिक संबंधों पर उनके कई शोध हैं और इसके कारण एक वैश्विक व्यक्तित्व के रूप में उनकी मजबूत पहचान है.''- प्रवीण कुमार, ब्रिगेडियर, सेवानिवृत्त
राज्यपाल और विदेश राज्य मंत्री की संयुक्त मौजूदगी का संदेश : प्रतिनिधिमंडल में विदेश राज्य मंत्री पबित्रा मार्गेरिटा की मौजूदगी केंद्र सरकार और विदेश नीति का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि बिहार के राज्यपाल संघीय ढांचे और संवैधानिक व्यवस्था का प्रतीक हैं. दोनों की संयुक्त उपस्थिति यह संकेत देती है कि भारत ने इस अवसर को केवल राजनयिक औपचारिकता नहीं माना, बल्कि सम्मानजनक और संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया.
दुनिया को संदेश : ब्रिगेडियर प्रवीण कुमार के अनुसार भारत ने इस प्रतिनिधिमंडल के जरिए यह स्पष्ट कर दिया कि वह अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता है. भारत अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत संबंध रखता है और ईरान जैसे पुराने साझेदार देशों के साथ भी अपने रिश्तों को महत्व देता है. यह भारत की संतुलित और बहुध्रुवीय कूटनीति का उदाहरण है.

भारत-ईरान रिश्तों की हजारों साल पुरानी विरासत : भारत और ईरान के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं. दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषाई और व्यापारिक संबंध रहे हैं. ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार बंदरगाह, क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान प्रदान जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग लगातार बना हुआ है. बदलते वैश्विक हालात में भी भारत इन संबंधों को बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रहा है.
क्या यह केवल औपचारिकता थी? : बिहार के वरिष्ठ राजनीति शास्त्र के शिक्षक डॉ. वीसी झा का कहना है कि किसी राष्ट्राध्यक्ष या सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार में प्रतिनिधिमंडल भेजना केवल प्रोटोकॉल का हिस्सा नहीं होता. यह दोनों देशों के बीच संबंधों की गहराई, सम्मान और भविष्य की साझेदारी का भी संकेत होता है. उनके अनुसार सैयद अता हसनैन का चयन उनके सैन्य अनुभव, रणनीतिक समझ, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक दायित्वों के संयुक्त मूल्यांकन का परिणाम है.
''कूटनीतिक दृष्टि से किसी राष्ट्राध्यक्ष या सर्वोच्च नेता के अंतिम संस्कार में प्रतिनिधिमंडल भेजना केवल औपचारिकता नहीं माना जाता. यह देशों के बीच संबंधों की गहराई, पारस्परिक सम्मान और भविष्य की साझेदारी का भी संकेत होता है. ऐसे में सैयद अता हसनैन का चयन उनके सैन्य अनुभव, रणनीतिक समझ, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और संवैधानिक दायित्वों के संयुक्त मूल्यांकन का परिणाम है.''- डॉ वीसी झा, शिक्षक, रीजनीति शास्त्र
Represented India at the funeral ceremony of His Eminence Grand Ayatollah Seyyed Ali Khamenei in Tehran today, along with MoS External Affairs @PmargheritaBJP. Also extended deepest condolences to the families of those who lost their lives in the recent conflict.@MEAIndia… pic.twitter.com/4TwhWINdQZ
— Bihar Lok Bhavan (@GovernorBihar) July 3, 2026
'भारत की रणनीतिक सोच के प्रतिनिधि बनकर पहुंचे हसनैन' : डॉ. वीसी झा का कहना है कि इस अवसर पर सैयद अता हसनैन केवल बिहार के राज्यपाल के रूप में मौजूद नहीं थे. वे भारत की लोकतांत्रिक विविधता, रणनीतिक परिपक्वता और संतुलित विदेश नीति के प्रतिनिधि बनकर ईरान पहुंचे. उनके साथ विदेश राज्य मंत्री की मौजूदगी ने भारत की आधिकारिक और स्पष्ट विदेश नीति को और मजबूती से सामने रखा.
सैन्य जीवन में हासिल किए कई बड़े सम्मान : सैयद अता हसनैन भारतीय सेना की गढ़वाल राइफल्स से जुड़े रहे. उन्होंने कश्मीर, सियाचिन, उत्तर पूर्व और श्रीलंका सहित कई चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं. उत्कृष्ट सैन्य सेवा के लिए उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल, उत्तम युद्ध सेवा मेडल और अति विशिष्ट सेवा मेडल जैसे देश के प्रतिष्ठित सैन्य सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है.
सेना के बाद भी जारी रहा राष्ट्रीय सेवा का सफर : सेना से वर्ष 2013 में सेवानिवृत्त होने के बाद सैयद अता हसनैन कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय के चांसलर रहे. इसके अलावा वे राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों के प्रमुख स्तंभकार और विश्लेषक के रूप में लगातार सक्रिय रहे. उन्होंने शेरवुड कॉलेज नैनीताल, दिल्ली विश्वविद्यालय और किंग्स कॉलेज लंदन से शिक्षा प्राप्त की. वर्तमान में वे बिहार के राज्यपाल के रूप में संवैधानिक दायित्व निभाने के साथ सामाजिक और प्रशासनिक पहलों में भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

भारत की विदेश नीति का नया संकेत : ईरान में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए बिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन का चयन केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि एक सोची समझी रणनीतिक पहल माना जा रहा है. यह निर्णय दिखाता है कि भारत वैश्विक मंच पर अपने राष्ट्रीय हितों, ऐतिहासिक संबंधों और संतुलित कूटनीति को समान महत्व देता है. ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया का भू राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा है, भारत ने अपने प्रतिनिधिमंडल के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह संवाद, सम्मान और स्वतंत्र विदेश नीति के सिद्धांतों पर आगे बढ़ने वाला देश है.
कौन हैं सैयद अता हसनैन? : लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन भारतीय सेना के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी हैं और वर्तमान में बिहार के 43वें राज्यपाल हैं. लगभग चार दशक तक भारतीय सेना में सेवा देने वाले हसनैन ने देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में नेतृत्व किया. वे जम्मू कश्मीर में 15वीं कोर यानी चिनार कोर के कमांडर रहे, जहां आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान उनकी रणनीतिक क्षमता और नागरिकों के साथ संवाद आधारित नीति की व्यापक सराहना हुई. सेना से सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, सामरिक मामलों और पश्चिम एशिया से जुड़े विषयों पर विशेषज्ञ, लेखक और विश्लेषक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई.
4 जुलाई से 9 जुलाई तक खामेनेई का अंतिम संस्कार प्रक्रिया : ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई का अंतिम संस्कार 9 जुलाई को मशहद शहर में किया जाएगा. 6 दिनों तक चलने वाले अंतिम संस्कार की प्रक्रिया 4 जुलाई से शुरू हो गई है. 4 जुलाई को विभिन्न देशों के प्रतिनिधि इसमें शामिल हो रह हैं. जबकि 6 दिन में, जिसमें तेहरान, कोम और इराक के शहरों को भी शामिल किया जा रहा है, जिसके बाद उन्हें इमाम रजा दरगाह के पास दफनाया जाएगा.
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