Explainer: 25 सीटों पर सिमटी RJD, विस्तार से समझिए कारण और अब तेजस्वी के सामने क्या क्या होगी चुनौती?
विधानसभा चुनाव में आरजेडी का दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन रहा है. ऐसे में सवाल है कि तेजस्वी के सामने क्या परेशानी है, क्या चुनौती है?

Published : November 16, 2025 at 6:47 AM IST
पटना : बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की ऐतिहासिक जीत और महागठबंधन की करारी शिकस्त ने राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दे दिया है. इस चुनाव में आरजेडी को अपने इतिहास की सबसे बड़ी हारों में से एक का सामना करना पड़ा है. पार्टी न सिर्फ सीटों में बुरी तरह पिछड़ी, बल्कि पहली बार यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या तेजस्वी यादव, लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत को उसी मजबूती के साथ आगे बढ़ा पाएंगे?
नेतृत्व क्षमता पर उठा सवाल : राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद हैं, लेकिन पार्टी के सभी बड़े नीतिगत फैसला अब तेजस्वी यादव लेने लगे हैं. 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने पूरे कैंपेनिंग की जिम्मेदारी अपने कंधे पर ली थी उसके बाद से लगातार पार्टी के नीतिगत फैसला हो या संगठन को लेकर कोई भी निर्णय लेना हो तेजस्वी ही सबकुछ देख रहे हैं.
2025 बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम ने तेजस्वी यादव की रणनीति, नेतृत्व, संगठन क्षमता और गठबंधन में कोऑर्डिनेशन पर बड़े प्रश्न चिह्न लगा दिए हैं. अब तेजस्वी के सामने कई ऐसी चुनौतियाँ खड़ी हैं, जिनसे निपटना न सिर्फ मुश्किल होगा बल्कि आने वाले वर्षों में उनके सामने राजनीतिक चुनौती भी होगा.

विधानसभा का चुनाव परिणाम : तेजस्वी यादव 2020 से लगातार पार्टी के सभी बड़े नीतिगत फैसला चाहे वह टिकट का बांटने का फैसला हो या संगठन में कोई फैसला. 2020 विधानसभा चुनाव में 75 सीटें जीतने वाली आरजेडी 2025 में 25 सीट पर सिमट गई.

EVM पर सवाल : विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद एक बार फिर से राजद की तरफ से ईवीएम पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं. पार्टी के मुख्य प्रवक्ता और हिलसा से पार्टी के उम्मीदवार रहे शक्ति सिंह यादव का कहना है कि लोकतंत्र में ऐसा कभी हुआ है, क्या ऐसा स्ट्राइक रेट किसी ने कभी देखा है? यह चुनाव परिणाम पूरी तरीके से मिशनरी मैनेजमेंट का परिणाम है. ईवीएम की सुनामी इसी रूप में आई है. बिहार के बाहर काम करने वाले मजदूरों का सपना था कि वह लोग अब जाकर बिहार में काम करेंगे.

''विधानसभा चुनाव के दौरान कहीं भी एनडीए नजर नहीं आ रहा था. इसके बावजूद भी इस तरीके का परिणाम आया है. बिहार के लोग इस मिशनरी के दुरुपयोग को जानती है. इस चुनाव के बाद यह तय हो गया है कि लोकतंत्र अब और सुरक्षित नहीं है. दुनिया के किसी भी देश में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं होता है लेकिन भारत में इसका उपयोग होता है, यह सवाल खड़े कर रही है."- शक्ति सिंह यादव, प्रवक्ता, आरजेडी
तेजस्वी की चुनौती : वरिष्ठ पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी का मानना है कि राजनीति में हार सबसे खतरनाक क्षण होता है. तेजस्वी यादव के सामने चुनौती पहले से थी लेकिन इस चुनाव के बाद उनके सामने और बड़ी चुनौती आ गई है. इस चुनाव में राजद 25 सीटों पर सिमट गई है. 2010 विधानसभा चुनाव में राजद 22 सीटों पर सिमट कर रह गई थी.

''परिवार के अंदर फूट की बीज उसी दिन बो दी गई थी जिस दिन पहली बार तेज प्रताप यादव के रहते तेजस्वी यादव को बिहार का डिप्टी सीएम बनाया गया था. उस समय तेज प्रताप यादव मन पर पत्थर रखकर यह सब चीज देख रहे थे. बड़े भाई के रहते दो-दो बार तेजस्वी यादव को बिहार का डिप्टी सीएम बनाया गया. वहीं से परिवार में फूट की नींव पड़ गई."- कौशलेंद्र प्रियदर्शी, वरिष्ठ पत्रकार

रोहिणी प्रकरण : एसआईआर के समय तेजस्वी यादव बिहार अधिकार यात्रा पर निकले थे. उस समय भी परिवार में फूट देखने को मिला. तेज प्रताप यादव के बाद रोहिणी आचार्य ने खुलकर संजय यादव एवं तेजस्वी यादव के आसपास रहने वाले लोगों के खिलाफ एक्स पर पोस्ट किया.
आज स्थिति ऐसी आ गई है कि विधानसभा चुनाव में राजद की करारी हार के बाद रोहिणी आचार्य ने न केवल राजनीति को अलविदा कह दिया है बल्कि परिवार को भी छोड़ने का ऐलान कर दिया है. तेजस्वी यादव के सामने राजनीति के अलावा परिवार को भी एकजुट रखने की बड़ी चुनौती है. तेजस्वी यादव के सामने यह भी एक चुनौती है कि अपने आसपास के रहने वाले सिपह सालारों के साथ-साथ परिवार को एक साथ लेकर कैसे चलें.
पार्टी की एकजुट चुनौती : कौशलेंद्र प्रियदर्शी का मानना है कि बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद तेजस्वी यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपने पार्टी को एकजुट रखना. दूसरी चुनौती होगी पार्टी के नेताओं के बीच फिर से आत्मविश्वास कैसे भरें. मुस्लिम मतदाताओं को राजद के पक्ष में जोड़े रखना तेजस्वी यादव की सबसे बड़ी चुनौती है, क्योंकि अब ओवैसी बिहार में उनके सामने मुसलमान के बेहतर विकल्प बनकर उभरे हैं.
''ओवैसी की पार्टी ने चुनाव से पहले आरजेडी को गठबंधन करने का ऑफर भी दिया था लेकिन राजद ने इसे ठुकरा दिया जिसका परिणाम चुनाव में देखने को मिला. 5 सीट न केवल ओवैसी जीते बल्कि 8 सीट पर राजद को हराने का भी काम किया. अब आरजेडी से मुस्लिम मतदाता भी छिटकने लगे हैं. इसके अलावा यह भी चर्चा हो रही है कि मुकेश सहनी का गठबंधन में रखने का क्या फायदा हुआ. अब तो यह मिम चलने लगा है की मछली और दूध एक साथ नहीं खाया जाता."- कौशलेंद्र प्रियदर्शी, वरिष्ठ पत्रकार
क्या है कठिनाई? : वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रो. नवल किशोर चौधरी का मानना है कि आरजेडी को मिली हार ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी का संगठन कमजोर हुआ है. 2025 चुनाव ने यह दिखा दिया है कि आरजेडी में लालू प्रसाद एवं तेजस्वी यादव के अलावा कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसके दम पर चुनाव में वोट मिल सके. तेजस्वी यादव युवाओं को अपने साथ लाने के लिए अनेक घोषणाएं की लेकिन युवाओं को वह अपने साथ जोड़ने में नाकाम हुए.

"राजद के पास मजबूत बूथ कमिटी नहीं है. एनडीए का बूथ प्रबंधन सफलता का प्रमुख कारण रहा, जबकि आरजेडी वहां बहुत पिछड़ गई. इसके अलावे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता अब खुद को हाशिये पर महसूस करते हैं. तेजस्वी के फैसलों से कई नेताओं में नाराजगी है. चुनाव के बाद यह असंतोष और खुलकर सामने आ सकता है."- प्रो एनके चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक

सहयोगी दलों को साथ रखने का चैलेंज : वरिष्ठ पत्रकार रवि उपाध्याय का कहना है कि बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद महागठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है गठबंधन में एकता बनाए रखना. चुनाव परिणाम के बाद महागठबंधन कमजोर पड़ चुका है. गठबंधन के सहयोगी दल परिणामों से निराश हैं.
''सीट बंटवारे के समय सभी घटक दल अपनी अपनी मांग पर अड़े थे. इस परिणाम के बाद कांग्रेस, VIP और आरजेडी के बीच आपसी तनाव बढ़ सकता है. कांग्रेस पहले से ही बिहार में अपना जनाधार खोजने की कोशिश में लगी है. इस परिणाम के बाद खराब प्रदर्शन का ठीकरा वह आरजेडी के नेतृत्व पर फोड़ सकती है. खराब परिणाम का असर 2025 के बाद विपक्षी एकजुटता पर पड़ेगा."- रवि उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
EBC वोट की बेरुखी : रवि उपाध्याय कहते हैं कि आरजेडी ने अति पिछड़ा कार्ड खेलते हुए, विधानसभा चुनाव से ठीक पहले जगदानंद सिंह की जगह पर मंगनी लाल मंडल को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया. तेजस्वी यादव एवं लालू प्रसाद को उम्मीद थी कि अति पिछड़ा वोट बैंक यदि उनके साथ जुड़ता है तो बिहार की सत्ता आसानी से तेजस्वी के हाथ में आ सकती है. लेकिन नीतीश कुमार के सोशल इंजीनियरिंग के सामने तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद की यह रणनीति भी कामयाब नहीं हुई. महागठबंधन की तरफ से कई कुशवाहा उम्मीदवार खड़े किए गए लेकिन इस चुनाव में कुशवाहा कार्ड भी राजद के काम नहीं आई.
MY को जोड़े रखना बड़ी चुनौती : वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय ने कहा कि लालू यादव की राजनीति की रीढ़ माने जाने वाले एम-वाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा. कई यादव और मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर आरजेडी पिछड़ गई. यादव वोटरों का एक हिस्सा अब BJP और JD(U) की ओर झुका है. जिसका उदाहरण कोसी के इलाकों में देखने को मिला है. मधेपुरा की कई सीटों पर जदयू को जीत मिली जो राजद की परंपरागत सीट थी.

"जहां तक मुस्लिम वोटों का सवाल है सीमांचल के इलाके में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एक बार फिर से अपनी मजबूती दिखाई है. 2020 के चुनाव में जिन सीटों पर AIMIM की जीत हुई थी, उन सभी सीटों पर फिर से ओवैसी की पार्टी ने जीत दर्ज की. आश्चर्य की बात यह है कि 2020 के बाद ओवैसी की पार्टी के चार विधायकों को राजद ने तोड़कर अपने पाले में मिला लिया. उन सभी सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं ने राजद के बदले फिर से ओवैसी की पार्टी में ही अपना विश्वास जताया. इसके अलावा लगभग एक दर्जन के आसपास ऐसी सीट रही जिस पर ओवैसी की पार्टी ने आरजेडी ने न केवल नुकसान पहुंचाया बल्कि वहां पर मुसलमान का वोट अपने तरफ आकर्षित किया. यह आरजेडी के लिए खतरे की घंटी है."- सुनील पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार
5 वर्ष तक संघर्ष : वरिष्ठ पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी का मानना है कि विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद अब यह साफ हो गया है कि तेजस्वी यादव को अगले 5 साल तक बिहार की सड़कों पर संघर्ष करना पड़ेगा. लोगों के बीच उन्हें फिर से नए एजेंडों के साथ जाना होगा. विधानसभा से लेकर सड़क तक आरजेडी का सियासी रास्ता क्या होगा यह तय करना होगा.

"तेजस्वी के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां है कि क्या वह बिहार में फिर से फुल टाइम पॉलिटिशियन के रूप में एक्टिव रहेंगे? अपने आसपास के लोगों के कारण परिवार के अंदर जो विद्रोह की स्थिति उत्पन्न हो गई है उसे कैसे खत्म करेंगे? यदि इन चुनौतियों से तेजस्वी ने सफलतापूर्वक मुकाबला कर लिया तो फिर वह बिहार की राजनीति में अपने आप को कमबैक कर पाएंगे."- कौशलेंद्र प्रियदर्शी, वरिष्ठ पत्रकार
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