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बच्चों में कैसे पहचानें ड्रग्स के लक्षण, क्या है पेरेंट्स और टीचर्स की जिम्मेदारी ?

स्कूल और अभिभावकों को बहुत देर होने से पहले ये कदम उठाने चाहिए. बालकृष्ण शर्मा और विनोद पाठक की रिपोर्ट

signal drug abuse India Battle Against Addiction
क्या आपका बच्चा भी नशा कर रहा है, जानें लक्षण (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : June 21, 2026 at 10:14 AM IST

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शिमला/कुल्लू: 'पिछले साल 9वीं क्लास के एक होनहार छात्र का स्वभाव अचानक बदल गया. रोज स्कूल आने और दोस्तों के साथ घुल-मिलकर रहने वाला छात्र अचानक अलग-थलग रहने लगा और स्कूल से गायब भी रहने लगा. मां-बाप से पूछा तो पता लगा कि वो घर में भी अपने कमरे में अकेले रहता है और न दोस्तों से मिलता है न खेलने जाता है. ऐसे में मुझे शक हुआ कि छात्र नशे की चपेट में आ गया है.'

पेशे से टीचर और कुल्लू में टीचर होम कमेटी के अध्यक्ष श्यामलाल हांडा के माथे पर ये वाकया बताते हुए चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं. वो बताते हैं कि नशे का फैलता जाल स्कूल-कॉलेज के छात्रों को अपनी जद में ले रहा है जो सबसे बड़ी त्रासदी है. वो बताते हैं कि 9वीं के उस छात्र को जब नशा मुक्ति केंद्र लाया गया तो पता लगा कि वो भांग का नशा कर रहा है. इसी तरह के लक्षण 12वीं के एक अन्य छात्र में देखे गए. जो हेरोइन का नशा कर रहा था लेकिन इन दोनों मामलों में अच्छी बात ये रही कि वक्त पर दोनों के लक्षण दिख गए और वक्त पर इलाज हो गया. दोनों ने नशा मुक्ति केंद्र में वक्त बिताया, डॉक्टरी सलाह को माना और अब फिर से अपनी सामान्य जिंदगी जी रहे हैं.

Bharat Against Drugs
नशे के खिलाफ भारत की लड़ाई (ETV Bharat GFX)

टीचर होम कमेटी के अध्यक्ष श्यामलाल हांडा निराशा भरे शब्दों में कहते हैं कि, इस उम्र के ज्यादातर बच्चों की किस्मत इन दो छात्रों की तरह नहीं होती. दरअसल नशे का फैलता जाल अब उन नौनिहालों को अपनी जद में ले रहा है जिसे परिवार, समाज और देश अपना भविष्य बताता है. सोशल मीडिया पर नशा ले रहे युवाओं के वायरल वीडियो किसी भी अभिभावक को चिंता में डालने के लिए काफी हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या नशा करने वालों के कुछ ऐसे लक्षण होते हैं जिन्हें देखकर मां-बाप पहले से सतर्क हो जाएं और वक्त रहते बच्चे को उस गर्त से निकाला जा सके. साथ ही इस सबमें स्कूल या टीचर्स की क्या भूमिका होनी चाहिए. ETV भारत की मुहिम Bharat Against Drugs में हमने इसी विषय पर एक्सपर्ट्स से बात की है.

कैसे पहचानें लक्षण?

कुल्लू में नशा मुक्ति केंद्र के प्रभारी डॉक्टर सत्यव्रत वैद्य बताते हैं कि, ऐसे युवा भी हैं जो नशे से मुक्ति पाना चाहते हैं लेकिन इसे लेकर जागरुकता का भारी अभाव है. खासकर स्कूली छात्रों के मामले में घर से लेकर स्कूल तक की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. क्योंकि हर नशा करने वाला शख्स कुछ लक्षण दिखाता है, जिन्हें पहचानकर उसका वक्त पर निवारण किया जा सकता है.

Symptoms of drug addiction in children
बच्चों में ड्रग एडिक्शन के लक्षण (ETV Bharat GFX)

डॉ. सत्यव्रत वैद्य कहते हैं, "आंखें लगातार लाल रहना, मुंह से बदबू आना ड्रग एडिक्शन की निशानी भी हो सकते हैं. इंजेक्शन के जरिये नशा लेने वाले युवा हमेशा फुल बाजू के कपड़े पहनना शुरू कर देते हैं चाहे मौसम कोई भी हो ताकि इंजेक्शन के निशान कोई न देखे. ऐसे बच्चे का शिक्षा से लेकर खेल में प्रदर्शन गिर जाएगा, उसके दोस्त बदल जाएंगे और अकेला रहने के साथ-साथ हमेशा तनाव में नजर आएगा. ऐसे लक्षण दिखने पर बिल्कुल भी नजर अंदाज न करें. बच्चे की हरकतों पर नजर बनाए रखें और डॉक्टरी सलाह लें."

बढ़ती जाती है नशे की लत

कुल्लू जिले के भुंतर में स्थित डी-एडिक्शन सेंटर में 2022 से 2026 के बीच 13 हजार नशे के शिकार लोगों का इलाज हो चुका है. इस केंद्र के नोडल अधिकारी डॉ. सत्यव्रत वैद्य बताते हैं कि इनमें से ज्यादातर संख्या युवाओं की है. 16 से 28 साल की उम्र के युवा हेरोइन/चिट्टा जैसा नशा कर रहे हैं. इसी आयु वर्ग की करीब 1500 लड़कियों का भी इस केंद्र में इलाज हुआ है. नशे की लत वक्त के साथ बढ़ती ही जाती है. इस केंद्र पर इलाज के दौरान पाया गया कि ज्यादातर युवाओं ने पहले भांग का नशा करना शुरू किया था. फिर वो धीरे-धीरे हेरोइन के नशे के चंगुल में फंस गए.

Kullu De-addiction Centre
कुल्लू नशा मुक्ति केंद्र में मरीज़ (ETV Bharat)

ये भी हैं लक्षण

व्यवहार में बदलाव, पढ़ाई में परफॉर्मेंस गिरना, गुमसुम रहना या अकेले रहना नशा करने वालों के कुछ कॉमन लक्षण हैं लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक कुछ ऐसे लक्षण भी हैं जिन्हें मामूली समझकर अनदेखा करना बड़ी भूल हो सकती है.

Symptoms of drug addiction in children
बहुत देर होने से पहले इन लक्षणों का रखें ध्यान (ETV Bharat GFX)

इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज शिमला के डिप्टी एमएस और मनोचिकित्सक प्रवीण एस. भाटिया के मुताबिक, नशा करने वाले सेल्फ केयर या हाइजीन से दूर हो जाते हैं. नशे की जद में होने के कारण वो नहाना, दाढ़ी बनाना या बाल कटवाने जैसी सेल्फ केयर नहीं करते हैं.

IGMC शिमला के डिप्टी एमएस और मनोचिकित्सक प्रवीण एस. भाटिया (ETV Bharat)

आईजीएमसी के मनोचिकित्सा विभाग के एचओडी डॉ. दिनेश दत्त बताते हैं कि बच्चों में अचानक चिड़चिड़ापन बढ़ना, स्कूल से भागना, परफॉर्मेंस गिरना, बिना बताए लंबे वक्त तक घर से बाहर रहना, पहले के मुकाबले ज्यादा पैसे खर्च करना, अकेले रहना, कमरे में बंद रहना, बातचीत कम करने लगना भी ऐसे लक्षण हैं जो देखने में आम हो सकते हैं लेकिन मां-बाप इन्हें इग्नोर न करें.

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IGMC मनोचिकित्सा विभाग के एचओडी डॉ. दिनेश दत्त और मनोचिकित्सक प्रवीण एस. भाटिया (ETV Bharat)

डॉ. दिनेश बताते हैं कि, अगर बच्चा भांग का नशा कर रहा है तो उसकी आंखें लाल रहने लगेंगी, भूख बढ़ जाएगी, चिड़चिड़ापन भी बढ़ेगा. उसके पास कुछ ऐसी चीजें भी मिल सकती हैं जो इशारा करती हैं कि बच्चा नशे के जाल में फंस रहा है. इसके साथ ही नींद न आना, बेचैन रहना, पेट और शरीर में दर्द जैसी समस्याएं आम हो जाएंगी. इसलिए अभिभावक बच्चों पर नजर रखें और उनके स्कूल बैग, अलमारी और कमरे वक्त वक्त पर चेक करते रहें.

स्वास्थ्य विभाग के डायरेक्टर डॉक्टर रमेश बताते हैं कि, शांत रहने वाले बच्चे का अचानक जिद्दी हो जाना, जेब खर्च या किसी भी बहाने से पैसे मांगना या घर से सामान चोरी होने लगे तो मां-बाप इन बातों को बिल्कुल भी अनदेखा न करें क्योंकि हो सकता है कि बच्चा नशे के जाल में फंस गया हो.

स्कूल की भी बराबर की जिम्मेदारी

टीचर होम कमेटी के अध्यक्ष श्यामलाल हांडा कहते हैं कि, घर के बाद एक छात्र सबसे ज्यादा वक्त स्कूल या कॉलेज में बिताता है. ऐसे में अभिभावकों के साथ-साथ शिक्षकों की भी बच्चों पर नजर रखने की पूरी जिम्मेदारी होनी चाहिए ताकि बच्चे नशे के दलदल में ना फंसे. वो कहते हैं कि नशे के खिलाफ सिर्फ नारेबाजी या फिर साल में एक दिन प्रतियोगिता कराने से कुछ नहीं बदलेगा. कुछ कड़े और अच्छे फैसले लेकर उनका सख्ती से पालन करना और करवाना होगा. वो इसके लिए कुछ सुझाव भी देते हैं.

Responsibility of schools and teachers
स्कूल और शिक्षकों की जिम्मेदी भी महत्वपूर्ण (ETV Bharat GFX)
  • शिक्षण संस्थानों में एंटी ड्रग एंबेसडर नियुक्त किए जाने चाहिए, जिसमें शिक्षक और छात्रों की भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए. जिनका काम निगरानी रखने के साथ-साथ संवाद करना भी होगा. छात्रों की दिनचर्या से लेकर उनके रिजल्ट और आदतों में आए बदलाव पर नजर रखना जरूरी है.
  • मॉर्निंग असेंबली में 15 मिनट नशे और इसके दुष्प्रभावों पर चर्चा की जानी चाहिए.
  • महीने में एक बार छात्रों को मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए या ऐसे कैंप लगाने चाहिए जहां मनोचिकित्सक छात्रों के मनोभाव को समझ लें.
  • स्कूल के आस-पास किसी भी तरह के नशे की दुकानें नहीं होनी चाहिए. जहां नशा बिकता हो स्कूल प्रशासन को उसकी शिकायत पुलिस में देनी चाहिए.
  • स्कूलों में समय-समय पर निरीक्षण करना चाहिए खासकर कैंटीन या शौचालयों का निरीक्षण जरूर होना चाहिए. जहां बीड़ी, सिगरेट या नशे से जुड़ा अन्य सामान छिपाने की संभावना सबसे ज्यादा होती है.
  • स्कूल और अभिभावकों के बीच लगातार संवाद होना चाहिए ताकि छात्र के स्कूल से गायब रहने, रिजल्ट में उतार-चढ़ाव या आदतों में हो रहे बदलाव की जानकारी अभिभावक और टीचर्स दोनों को रहे.

कुल्लू जिले में स्वास्थ्य विभाग की ओर से स्कूल टीचर्स को इसका प्रशिक्षण दिया जा रहा है. ताकि टीचर्स छात्रों की संदिग्ध गतिविधियों का पता लगते ही जरूर कदम उठा सकें. डी एडिक्शन सेंटर के प्रभारी डॉक्टर सत्यव्रत वैद्य ने बताया कि युवाओं में नशे की पहचान करना अभिभावकों और शिक्षकों को जल्दी हो जाती है.

शिमला जिले के रामपुर बुशहर में स्कूल टीचर दिनेश के मुताबिक स्कूली छात्रों में नशे के मामले कई बार सामने आते हैं. ऐसे में स्कूल और टीचर्स की भूमिका भी अहम हो जाती है. छात्र के व्यवहार में बदलाव, स्कूल समय पर नहीं आना या स्कूल नहीं आना, होमवर्क या पढ़ाई में ध्यान न होने जैसी चीजें बहुत आम लक्षण हैं. ऐसे में स्कूल और टीचर्स को अभिभावकों के साथ संवाद जरूर करना चाहिए.

Kullu De-addiction Centre
कुल्लू डी एडिक्शन सेंटर में योग करते हुए मरीज (ETV Bharat)

दिनेश बताते हैं कि ऐसे भी मामले आए हैं जहां छात्र स्कूल की फीस या एक्स्ट्रा करिक्युलर या एक्सट्रा क्लास के नाम पर अभिभावकों से बार-बार पैसे मांगता है. पेरेंट्स टीचर मीटिंग के दौरान कई बार ऐसा हुआ है जब अभिभावक बताते हैं कि उनका बच्चा रोज वक्त पर स्कूल निकलता है लेकिन टीचर्स शिकायत करते हैं कि छात्र स्कूल नहीं आ रहा या रोज देर से पहुंचता है. ऐसे मामलों में अभिभावक और टीचर्स को मिलकर छात्रों की काउंसलिंग करनी होगी. छात्र को नशे के दुष्प्रभाव के बारे में समझाने के साथ-साथ अच्छे इलाज और काउंसलिंग से छात्रों ने नशा छोड़ा भी है.

नशे की जद में हों छात्र तो क्या करें?

कुल्लू के डॉक्टर सत्यव्रत वैद्य के मुताबिक किसी भी शख्स में नशे के लक्षण दिखते ही तुरंत डॉक्टर की सलाह लें. शुरुआत में यूरीन टेस्ट की सलाह दी जाती है. जिसके बाद नशा मुक्ति केंद्र जाने की भी जरूरत पड़े तो जरूर जाएं. इस तरह की जागरुकता का अभाव नशे में फंसे किसी भी शख्स की परेशानी और बढ़ा सकता है.

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कुल्लू में नशा मुक्ति केंद्र के प्रभारी डॉक्टर सत्यव्रत वैद्य (ETV Bharat)

डॉ. सत्यव्रत बताते हैं कि कुल्लू जिले में स्थित डी-एडिक्शन सेंटर में नशे के शिकार युवा खुद भी इलाज के लिए आते हैं. उन्हें 28 दिन का कोर्स करवाया जाता है. इस दौरान मरीज के डी-एडिक्शन सेंटर में भी रुकने की व्यवस्था होती है और जो मरीज यहां नहीं रहना चाहते वो दवाएं लेकर घर से ही केंद्र के एक्सपर्ट डॉक्टर्स की सलाह का पालन कर सकते हैं. इस दौरान दवाओं के साथ-साथ कुछ कसरत और बेहतर खान-पान का ध्यान रखा जाता है. साथ ही उनकी लगातार काउंसलिंग भी की जाती है. नशे के जाल में फंसे लोगों खासकर छात्रों के साथ काउंसलिंग ही बहुत बड़ी भूमिका निभाती है. इसलिए अभिभावक और शिक्षकों को चाहिए कि वो मिलकर इस मुसीबत को हराएं.

नशे के साथ कई बीमारियां भी आती हैं

आईजीएमसी में मनोचिकित्सा विभाग में एचओडी डॉ. दिनेश का कहना है कि नशे की लत अगर बढ़ जाए तो पीढ़ियां तक बर्बाद हो जाती हैं और नशे की लत अपने साथ कई बीमारियां भी लाती हैं. हेपेटाइटिस सी के अलावा नशे के लिए सीरिंज का इस्तेमाल एचआईवी का खतरा बढ़ाता है. गलत तरह से इंजेक्शन लेने से इंफेक्शन का खतरा भी होता है. दिल की बीमारी के साथ-साथ नशे की ओवरडोज का खतरा भी बढ़ सकता है. जिससे मौत भी हो सकती है.

dr dinesh dutt dr praveen S bhatia
IGMC मनोचिकित्सा विभाग के एचओडी डॉ. दिनेश दत्त और मनोचिकित्सक प्रवीण एस. भाटिया (ETV Bharat)

नशा छोड़ने के बाद फिर से लग सकती है लत

नशा मुक्ति केंद्रों में हर साल हजारों लोग नशा छुड़वाने के लिए जाते हैं. अच्छे इलाज के बाद वो नशा छोड़ भी देते हैं लेकिन नशे के खिलाफ जंग यहीं खत्म नहीं होती. डॉ. दिनेश कहते हैं कि बहुत मौकों पर ये होता है कि नशा छोड़ने के बाद दोबारा नशे की लत लग जाए और वो ये लत कभी भी लग सकती है. इसलिए मरीज की संकल्प शक्ति के साथ-साथ परिवार का साथ और समाज का जागरूक होना भी जरूरी है. सिर्फ दवाओं से नशा नहीं छुड़ाया जा सकता है. एक बार नशे के चंगुल में फंसने वाले शख्स को समाज हमेशा अलग निगाहों से देखता है, उसे हमेशा ताने मारे जाते हैं. उन्हें नौकरी मिलने, फिर से पढ़ाई पूरी करने या जिंदगी को फिर से पटरी पर लाने के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है. इसलिए इलाज के साथ परिवार का प्यार और सोसायटी का संबल भी बहुत जरूरी है.

kullu de addiction centre
कुल्लू नशा मुक्ति केंद्र (ETV Bharat)

हर तनाव या परेशानी का समाधान नशा नहीं

किशोरावस्था तनाव पूर्ण अवस्था है. इस दौर में युवाओं के मन में तरह-तरह विचार पैदा होते हैं. पढ़ाई के बोझ, परीक्षा की टेंशन से लेकर करियर की चिंता के बीच नई-नई जिज्ञासा और प्रयोग इस उम्र में बहुत आम बात है. वहीं, नशीले पदार्थों की उपलब्धता युवाओं की इस प्रवृत्ति के साथ मिलकर ऐसा जाल बुनती हैं कि सही गलत का अंदाजा ही नहीं लगता. ऐसे में उन्हें ये समझाना बड़ी चुनौती है कि हर तनाव या परेशानी का समाधान नशा नहीं है. एक्सपर्ट बताते हैं कि इस चुनौती से पार पाने के लिए अकेले दवाई या इलाज कुछ नहीं कर सकता. नशीले पदार्थों का सेवन दिमाग को शिथिल बना देता है. नशेड़ी एक तरह की दिमागी बीमारी से ग्रस्त हो जाता है वह सही और गलत में फर्क नहीं कर पाता. इसलिए उन्हें बीमारी समझने की बजाय बीमार समझें, क्योंकि उन्हें सजा की नहीं सही मार्गदर्शन के साथ सही इलाज की जरूरत है.

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