पश्चिम बंगाल में ध्रुवीकरण से बिगड़ सकते हैं समीकरण, त्रिकोणीय मुकाबला होने की उम्मीद
पश्चिम बंगाल की सियासत इन दिनों उबाल पर है. भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर के नई पार्टी बनाने से अल्पसंख्य वोट बंट सकता है.

Published : December 23, 2025 at 8:05 PM IST
अनामिका रत्ना
नई दिल्ली: 2026 में होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव (मार्च-अप्रैल में संभावित) की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है. 294 सीटों वाली विधानसभा में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच सीधा और कांटे का मुकाबला दिख रहा है. हाल के ओपिनियन पोल्स में टीएमसी थोड़ी बढ़त पर है, लेकिन सत्ता-विरोधी भावना, भ्रष्टाचार के आरोप और ध्रुवीकरण की राजनीति और अल्पसंख्यक (मुस्लिम) वोटों का बंटवारा टीएमसी के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है, और इसी रणनीति के तहत भाजपा पश्चिम बंगाल के चुनाव में ममता के गढ़ में भी सेंध लगाने की पूरी तैयारी कर रही है.
अगले हफ्ते ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल जाने वाले हैं जहां वो अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान पार्टी के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं में आगामी चुनाव को लेकर चुनावी रणनीति साझा करेंगे. साथ ही पार्टी सूत्रों की मानें तो कार्यकर्ताओं और नेताओं के सामने जिम्मेदारी तय कर उन्हें लक्ष्य भी देंगे जिससे सभी क्षेत्रों में विधानसभा चुनाव से पहले पहले ही पार्टी मतदाताओं के साथ पहले दौर का संपर्क अभियान पूरा कर ले, और दूसरे दौर के संपर्क अभियान से मतदाताओं के बीच नेताओं की पैठ बन जाए और केंद्र सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की उन्हें सही-सही जानकारी दे दी जाए.
देखा जाए तो भाजपा ने 2021 में 77 सीटें जीतकर मुख्य विपक्ष की भूमिका में आ गई. सूत्रों कि मानें तो आने वाले चुनाव में पार्टी जिन मुद्दों को टीएमसी के खिलाफ मजबूती से लेकर आएगी वो हैं- हिंदुत्व, बांग्लादेश से घुसपैठ का मुद्दा, केंद्र की योजनाओं का लाभ और संगठनात्मक ताकत.
वहीं, यदि पार्टी के सामने चुनौतियों की बात करें तो 2024 की लोकसभा में पार्टी की सीटें घटी हैं. इसके अलावा भाजपा में स्थानीय नेतृत्व की कमी है. सूत्रों की मानें तो पार्टी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, टीएमसी पर "तुष्टीकरण" के आरोप और "डबल इंजन" सरकार का वादा मजबूती से चुनावी मैदान में करेगी, और इन मुद्दों को ध्यान में रखते हुए हुमायूं कबीर के मुद्दे को टीएमसी के खिलाफ तूल दे रही है ताकि चुनावी मैदान में इसे एक मजबूत मुद्दा बनाया जा सके.
मुर्शिदाबाद जैसे अल्पसंख्यक बहुल जिलों में कबीर की पार्टी टीएमसी के वोट बैंक को चुनौती दे सकती है. भाजपा इसे मौका मान रही है. जनवरी में कबीर कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में बड़ी रैली करने की योजना बना रहे हैं. इससे 2026 का चुनाव त्रिकोणीय भी हो सकता है.
वैसे तो हुमायूं कबीर का दल-बदल का इतिहास रहा है. कबीर का राजनीतिक करियर कई दलों से गुजरा है जिनमें मुख्य तौर पर वो पहले कांग्रेस और टीएमसी में रहे. इसके बाद 2018 में भाजपा में शामिल हुए. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें मुर्शिदाबाद सीट से टिकट दिया. वह तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन भाजपा को अच्छे वोट मिले. चुनाव हार के बाद 2021 में फिर टीएमसी में लौटे और भरतपुर से विधायक बने. अब टीएमसी से निलंबन के बाद उन्होंने अपनी पार्टी बना ली है.
भाजपा के साथ उनका पुराना रिश्ता अब विवाद का केंद्र है. जहां भाजपा नेता उन्हें 'टीएमसी का गुप्त सहयोगी' बता रहे हैं, वहीं टीएमसी भाजपा पर कबीर को तूल देने का आरोप लगा रही है.
इस विवाद की शुरुआत नवंबर 2025 में हुई जब कबीर ने मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद की तर्ज पर एक नई मस्जिद बनाने की घोषणा की और 6 दिसंबर 2025 (बाबरी विध्वंस की 33वीं बरसी) को उन्होंने इस मस्जिद की नींव रखी. इस कार्यक्रम में हजारों लोग जुटे, सुरक्षा के कड़े इंतजाम थे.
इससे पहले, टीएमसी ने इसे 'सांप्रदायिक राजनीति' करार देते हुए 4 दिसंबर को कबीर को पार्टी से निलंबित कर दिया. बाद में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया. कबीर का दावा है कि यह मस्जिद मुस्लिम समुदाय की भावनाओं का सम्मान है और इसका निर्माण तीन साल में पूरा होगा. उन्होंने दान इकट्ठा करने की अपील भी की, जिससे लाखों रुपये जुटे.
सोमवार यानी 22 दिसंबर को बेलडांगा में बड़ी सभा में कबीर ने अपनी नई पार्टी JUP लॉन्च कर दी और ये ऐलान किया कि वो खुद बेलडांगा और रेजिनगर दो सीटों से लड़ेंगे. उनकी पार्टी 135 से 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. साथ ही ये भी दवा कर दिया कि उनकी पार्टी मुर्शिदाबाद में टीएमसी को 'जीरो' कर देगी और, ममता बनर्जी 100 सीट भी नहीं जीत पाएंगी. कबीर ने खुद को 2026 में किंगमेकर की स्थिति में होने की बात भी कही.
भाजपा ने कबीर पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि यह सब टीएमसी की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति है. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुग ने कहा कि ममता बनर्जी बताएं कैसे उनकी ही टीएमसी के विधायक बंगाल में बाबर के नाम पर मस्जिद बना रहे हैं. देश प्रभुराम की विचारधारा व संविधान के अनुसार चलेगा न कि विदेशी आततायी हमलावर, लुटेरे, हत्यारे और हिंदुओं के कातिल बाबर की विचारधारा पर. ममता बनर्जी की इस घटिया साजिश पर बंगाल की जनता करारा जवाब देगी.
वहीं टीएमसी ने कबीर को 'सांप्रदायिक' करार दिया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अल्पसंख्यकों से एकजुट रहने की अपील की है. पार्टी का कहना है कि कबीर की गतिविधियां पुरानी हैं और अब वह अप्रासंगिक हो गए.
हालांकि इतना तो तय है कि कबीर की नई पार्टी की एंट्री से अल्पसंख्यक वोटों में नया बंटवारा तो जरूर दिख रहा है और इसकी वजह से ही वो खुद को किंगमेकर बनने की दौड़ में भी बता रहे हैं. राज्य में करीब 90 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं. यहां ये नई पार्टि टीएमसी के वोट बैंक को चुनौती दे सकती है.
वहीं, कबीर की पार्टी के अलावा इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) जो अब्बास सिद्दीकी की पार्टी है, उसने भी 2021 में लेफ्ट-कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था और, एक सीट जीती थी और वो अब फिर गठबंधन की बात करते हुए मुस्लिम-दलित पर अपना फोकस बढ़ा रही है, जिसका कुछ असर दक्षिण बंगाल के कुछ इलाकों में वोट बंटवारे पर पड़ सकता है.
इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM की भी सीधे या गठबंधन से एंट्री की संभावना बताई जा रही है. ये नई ताकतें अगर एकजुट हुईं तो त्रिकोणीय मुकाबला बना सकती हैं, वरना वोट बंटवारा टीएमसी को कमजोर कर भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है.
चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन ध्रुवीकरण, घुसपैठ का मुद्दा और कल्याणकारी योजनाएं पश्चिम बंगाल के चुनाव में मुख्य थीम बनती जा रही हैं. मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में JUP और ISF का असर निर्णायक हो सकता है. अगर अल्पसंख्यक वोट एकजुट रहा तो टीएमसी मजबूत और बंटा तो भाजपा का पलड़ा भारी हो सकता है, यानी स्थिति साफ है इस अंक गणित के हिसाब से 2026 में बंगाल की सियासत नया मोड़ ले सकती है!
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