बंगाल में ममता बनर्जी की सत्ता उखाड़ फेंकने वाले शुभेंदु को कितना जानते हैं आप? कभी दीदी का दाहिना हाथ थे, अब मुख्यमंत्री होंगे
West Bengal New CM: पढ़िए- विधानसभा चुनाव में बीजेपी को एतिहासिक जीत दिलाने वाले शुभेंदु अधिकारी का दिलचस्प सियासी सफर.

Published : May 6, 2026 at 5:17 PM IST
|Updated : May 8, 2026 at 6:01 PM IST
हैदराबाद. पश्चिम बंगाल में बीजेपी को पहली बार सत्ता तक पहुंचाने वाले शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी की सियासी लड़ाई कई मायनों में दिलचस्प है. इसे आप तमाम पौराणिक ग्रंथों तथा एतिहासिक घटनाओं से भी जोड़कर देख सकते हैं. तकरीबन 55 साल के अधिकारी कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद लेफ्टिनेंट थे, वह उनके दाहिने हाथ माने जाते थे. आज उन्हीं शुभेंदु ने बंगाल में दीदी का किला ध्वस्त कर दिया है और बंगाल के नए सीएम बनने जा रहे हैं. शनिवार को पद व गोपनीयता की शपथ लेंगे. दीदी की तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) ने 2011 में वाम दलों के लगभग तीन दशक से भी ज्यादा(34 साल) चले शासन को उखाड़ फेंका था पर अब वह 15 साल बाद 2026 में खुद सत्ता से बाहर हो गईं.
ममता बनर्जी फिलवक्त तक वेस्ट बंगाल की सीएम थीं. विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था. हालांकि कानूनन 9 मई के बाद उनकी पूरी सरकार का कार्यकाल खुद ब खुद खत्म हो जाता, लेकिन उससे पहले ही राज्यपाल आरएन रवि ने उनके पूरे मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर दिया. कहते हैं, कभी अपना घर-परिवार नहीं बसाने वाली दीदी राजनीति और जनता की सेवा में अपने आप को पूर्ण रूप से समर्पित कर रखा है, लेकिन सत्ता मिलने के बाद जब उन्हें भतीजा मोह (अभिषेक बनर्जी) शुरू हुआ तो सुवेंदु अधिकारी ने टीएमसी का साथ छोड़ दिया. भाजपा जाॅइन कर भगवा ध्वज थामा. ये बात सन् 2020 की है.
5 साल पहले दीदी से अलग हुए सुवेंदु अधिकारी
तब शुभेंदु को शायद लगता था कि पार्टी में उनकी जगह दीदी के बाद की है पर लीड रोल और सीन में आ चुके थे अभिषेक बनर्जी, दीदी के उत्तराधिकारी के रूप में. टीएमसी के लिए खून-पसीना बहाने वाले अधिकारी के लिए यह किसी झटके सरीखा था. उत्तराधिकार की इस लड़ाई में उन्होंने टीएमसी से सत्ता छीनने और ममता बनर्जी को पूर्व सीएम बनाने का बीड़ा उठाया. पांच साल की राजनीतिक उठापटक के बाद सुवेंदु ने उसे सच कर दिखाया. अब आगे पढ़िए बंगाल के इस टाइगर के बारे में रोचक बातें जो शायद लोगों को कम ही पता हैं.

बंगाल का रसूखदार परिवार, विरासत में मिली सियासत
सियासत शुभेंदु को विरासत में मिली, उनके पिता शिशिर अधिकारी 2009 से 2012 तक मनमोहन सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री रहे हैं. पूर्वी मेदिनीपुर जिले के कांथी में 15 दिसंबर, 1970 को पैदा हुए. जाति से उत्कल ब्राह्मण हैं. इनके पिता और परिवार का बंगाल की राजनीति में काफी दबदबा है, विशेषकर पूर्वी मेदिनीपुर में अधिकारी परिवार का खासा प्रभाव माना जाता है. शुभेंदु के दो भाई भी एक्टिव राजनीति में हैं और सांसद-विधायक रह चुके हैं. शुभेंदु ने पारिवारिक माहौल में ही सियासत की एबीसीडी सीखी और स्टूडेंट पाॅलिटिक्स से राज्य के सत्ता शीर्ष तक का सफर तय कर लिया.
ममता बनर्जी की तरह ही शुभेंदु भी अनमैरिड
ममता बनर्जी की तरह ही शुभेंदु अधिकारी भी अविवाहित हैं. टीएमसी से अलग होने से पहले ममता सरकार में कई अहम विभागों में मंत्रिपद संभाल चुके हैं. दीदी की तरह ही पुराने कांग्रेसी रहे हैं. जब 1998 में मूल कांग्रेस छोड़कर दीदी ने अपनी तृणमूल बनाई तब सुवेंदू भी साथ हो लिए. पूरा अधिकारी परिवार टीएमसी से साथ डटकर खड़ा हुआ और शुभेंदु ने दीदी के साथ हर जगह सड़क पर उतरकर संघर्ष किया, लाठियां खाईं. 2007 का नंदीग्राम आंदोलन तो सबको याद ही होगा, वही वाम सरकार की ताबूत में टीएमसी की आखिरी कील थी. नंदीग्राम ने शुभेंदु को भी बंगाल की राजनीति में एक बड़े चेहरे और जुझारू नेता के रूप में स्थापित कर दिया.
स्टूडेंट पाॅलिटिक्स से शुरुआत, वाम सरकार से मोर्चा
शुभेंदु ने पोस्ट ग्रेजुएट तक की पढ़ाई-लिखाई की. उनका राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं. बंगाल में जब वामपंथ चरम पर था तब 1989 में वह कांग्रेस के छात्र संगठन 'छात्र परिषद' से जुड़े. कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार से लोहा लिया. 1995 में पहली बार पार्षद बने. फिर सांसद, विधायक. जनता के मुद्दों को लेकर सड़क पर उतरना, शासन-सत्ता के खिलाफ दमखम से लड़ना इनकी फितरत रही है. चाहे सरकार वामपंथी रही हो या फिर ममता बनर्जी की.
लगातार दो चुनाव में मुख्यमंत्री को हराने वाले संभवत: पहले नेता
शुभेंदु अधिकारी देश के संभवत: पहले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने किसी मुख्यमंत्री को लगातार दो चुनाव में हराया. सुवेंदु ने 2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को नंदीग्राम सीट पर हराया. अब फिर 2026 में भवानीपुर सीट पर. भवानीपुर को टीएमसी का गढ़ और सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती रही है. इससे साफ है कि सुवेंदु अधिकारी की बंगाल की राजनीति और लोगों पर कितनी गहरी पकड़ पर है. बंगाल में वह भाजपा के लिए चाणक्य भी साबित हुए और अब सीएम की कुर्सी हासिल कर चंद्रगुप्त भी.
विवादों में भी नाम उछला
ऐसा भी नहीं है कि शुभेंदु अधिकारी की अब तक की यात्रा निर्विवादित रही हो. शारदा घोटाले में उनका भी नाम उछला. माओवादियों से साठगांठ के आरोप लगे. संदेशखाली में विरोध-प्रदर्शन के दौरान एक सिख पुलिस अफसर पर टिप्पणी से विवादों में घिरे. सुवेंदु पर करीब-करीब 39 मामले भी दर्ज हैं.
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