बिहार के इस परिवार में 85 साल बाद निकली बारात, 3 पीढ़ी से क्यों लगी थी रोक?
बिहार के एक परिवार में 85 साल बाद बारात निकली है. आखिर क्यों इतने वर्षों तक बिना बारात की शादी होती थी. पढ़ें स्पेशल रिपोर्ट..

Published : February 13, 2026 at 8:55 PM IST
- रिपोर्ट: सरताज अहमद
गयाजी: 'आईआईटियन गांव' और 'मैनचेस्टर ऑफ बिहार' के नाम से प्रसिद्ध गया के पटवा टोली में एक परिवार में 85 सालों बाद शादी की बारात निकली है. 8 दशकों तक परिवार में कोई भी दूल्हा घोड़ी चढ़कर और बारात लेकर दुल्हन के घर नहीं गया. अब बारात निकलने के बाद इलाके में चर्चा हो रही है और लोग वर-वधु के साथ-साथ उनको परिवार को भी खूब बधाई दे रहे हैं.
पटवा टोली में अनोखी शादी: इस महीने की 4 तारीख को इस फैमिली की तीसरी पीढ़ी के छोटे बेटे की शादी हुई है. शाम को जब राजू पटवा की बारात निकली तो उनके दादा जानकी प्रसाद राम, पिता पन्ना लाल और परिवार के अन्य सदस्य खुश होने के साथ-साथ भावुक भी थे. ऐसा होना लाजमी भी था, क्योंकि देश की आजादी से भी 7 साल पहले 1940 में आखिरी बार इस परिवार में बारात निकली थी.
1940 में आखिरी बार निकली बारात: असल में 1940 में इस फैमिली में बेहद दर्दनाक घटी थी. तब परिवार के मुखिया जानकी प्रसाद की उम्र लगभग 9-10 साल रही होगी. उनके पिता ने कम उम्र में ही शादी के बंधन में बांधने के लिए रिश्ता तय कर दिया था. काफी धूमधाम से घर से बारात निकली और लड़की के घर पहुंची थी लेकिन तभी किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. जानकी राम दूल्हा बनकर घर से निकले जरूर थे लेकिन उनकी शादी उस दिन नहीं हो सकी, क्योंकि वहां अनहोनी घट गई.

विवाह से पहले भाई की हो गई थी मौत: जानकी राम की उम्र आज लगभग 99 साल है. वह बताते हैं कि जब साल 1940 में उनकी बारात निकली थी, तब सब कुछ ठीक ठाक था. गाते-बजाते हम लोग बारात लेकर लड़की के घर पहुंचे थे. स्वागत की रस्म हो चुकी थी. मंडप में बैठते लेकिन उससे पहले ही रात के 2 बजे उनके बड़े भाई नाथू पटवा की अचानक मृत्यु हो गई. ऐसे में बगैर शादी के ही बारात वापस लौट गई. हालांकि कुछ सालों बाद जानकी राम की शादी उसी लड़की से हुई, लेकिन बिना बारात निकाले बेहद सादगी के साथ.

85 साल से क्यों नहीं निकली बारात?: इस सवाल पर जानकी प्रसाद कहते हैं कि उसी घटना के बाद परिवार में ये तय हो गया था कि घर में किसी की बारात नहीं निकलेगी. दूल्हा बनकर ढोल-बाजे के साथ लड़की के घर दूल्हा नहीं जाएगा. बारात निकालना एक तरह से अशुभ हो गया था. परिवार में दूल्हा का सजना-संवरना और घोड़ी पर सवार होना एक अचल परंपरा के रूप में स्थापित हो गई थी. फैमिली में इस बात पर सहमति बनी कि लड़की के घर दूल्हा बारात लेकर तभी जा सकता है, जब उसके घर में लग्न की अवधि में किसी बच्चे का जन्म हो.

"80-85 साल पहले की बात है. मेरी शादी थी, बारात लेकर लड़की के घर गए थे. वहां अचानक मेरे बड़े भाई नाथू पटवा की मौत हो गई. खुशी का माहौल मातम में बदल गया और शादी की रस्म पूरी किए बिना ही बारात वापस हो गई. उसी के बाद तय हुआ कि अब तबतक बारात नहीं निकलेगी, जबतक कि लग्न के समय किसी बच्चे का जन्म नहीं होता. मेरी, मेरे बेटों-भतीजों और दूसरे पोतों की शादी भी बिना बारात के ही संपन्न हुई. अभी शादी से पहले एक पोता को बेटा हुआ, जिसके बाद बारात निकालकर शादी हुई. बहुत खुश हैं हमलोग."- जानकी प्रसाद राम, दूल्हा राजू पटवा के दादा

8 दशक बाद निकली बारात: पिछले 85 सालों में तीसरी पीढ़ी के भी कई लड़कों की शादी हो चुकी है. जानकी राम की तीसरी पीढ़ी में राजू पटवा भी हैं, उनकी भी शादी तय हो चुकी थी. 85 सालों की अशुभ परंपराओं के अनुसार राजू पटवा की भी शादी बिना बारात और धूमधाम के तय थी लेकिन शादी के दो दिन पहले परिवार में एक बच्चे की किलकारी गूंजी. जिससे पूरे परिवार में खुशियों की लहर दौड़ गई.

शादी से दूल्हा बेहद खुश: दूल्हा राजू पटवा बताते हैं कि उनकी शादी समाज की ही लड़की से हुई है. पहले से यह तय था कि लड़की वाले उनके घर आएंगे और जिस तरह से हमारे घर में पिछले 85 सालों से बेहद सादगी के साथ शादी की रस्में होती रही हैं. उसी तरह इस बार भी होगी. लड़की वाले उनके घर आएंगे और फिर शादी हो जाएगी. ना तो बारात निकलेगी और न ही कोई दूसरे कार्यक्रम होंगे लेकिन तभी पुणे में रहने वाले भाई-भाभी को बेटा होने की सूचना मिली. बच्चे के जन्म की खुशी और पिछले 85 सालों की बंदिश भी खत्म हो गई.

"जब भाई के घर में बच्चे का जन्म हुआ तो सभी बड़े बुजुर्गों ने बैठकर निर्णय लिया कि उनकी शादी धूम धाम से होगी. हालांकि इतना जल्दी निर्णय लिया जाना आसान नहीं था. घर में सादगी के साथ शादी होने की ही तैयारी थी. ऐसे में बारात निकालना और लड़की के घर जाकर सारी रीति रिवाज को अंजाम देने का निर्णय आसान भी नहीं था लेकिन फिर भी 85 सालों की बंदिश को खत्म करने का यह सुनहरा अवसर हम लोगों के लिए था. मैं बहुत खुश हूं कि मेरी शादी में धूमधाम से बारात निकली है."- राजू पटवा, दूल्हा

'शादी से पहले हमलोग डरे हुए थे': राजू पटवा की मां तेजमनी देवी कहती हैं कि जब राजू की शादी के लग्न के दौरान घर में बच्चे का जन्म हुआ तो बहुत खुशी हुई. मुझे अपनी शादी के बाद से ही इच्छा थी के परिवार में किसी बच्चे का जन्म लग्न में हो और परिवार के बेटों की बारात धूमधाम से जाए लेकिन ऐसा नहीं होता था. भारी मन से मैंने बड़े बेटे की शादी ऐसे ही बिना रस्म के किया था. हालांकि राजू की जब बारात निकल रही थी तो खुशी के साथ-साथ मन में डर भी था, क्योंकि पहले बारात ले जाने में अनहोनी हो चुकी है लेकिन सब ठीक-ठाक से हो गया.

"हर माता-पिता की यही इच्छा होती है कि बेटे की बारात धूमधाम से निकाली जाए. हम लोगों में दहेज लेने की प्रथा शुरू से नहीं है. खुशी तो तब होती है, जब बेटे की बारात धूमधाम से निकले. बड़े बेटे की शादी बिना गाजा-बाजा और बारात के हुई थी लेकिन इस बार छोटे बेटे की शादी धूमधाम से हुई. हम सबलोग बहुत खुश हैं."- तेजमनी देवी, राजू पटवा की मां
बारात में जमकर नाची फैमिली: वहीं, राजू पटवा के चाचा जनता प्रसाद बताते हैं कि उनके पिता और उनकी भी शादी बिना ढोल-बाजे के साथ हुई. लड़की वाले उनके घर पर आए और एक जगह पर बैठकर हिंदू रीति रिवाज के अनुसार शादी की पूरी रस्म अदा की गई. ऐसे में जब भतीजे की शादी में बारात निकली तो हमलोगों ने खूब मजे किए. गानों पर जमकर नाचे और एंजॉय किया.

"जिस तरह से लोगों की बारात निकलती है. दूल्हा सज-संवरकर सेहरा पहनकर लड़की के घर जाता है. उस तरह से हम लोगों में पिछले 85 सालों से शादी नहीं हुई थी. अब जब उनके भतीजे राजू की शादी हुई है तो पूरा परिवार खुश है. खुशी में मैंने तो बहुत डांस किया और गाना भी गया. अब परिवार में सब कुछ ठीक है और हमारे बच्चों की शादी आम लोगों की तरह ही बारात निकालकर होगी."- जनता प्रसाद, राजू पटवा के चाचा
पहले कैसे होती थी शादी?: पहले परिवार में रिश्ता तय हो जाता था. लग्न के अवसर पर लड़की के परिवार शादी वाले दिन लड़की को लेकर लड़के घर आ जाते थे. मंडप नहीं बनाया जाता था. घर या मंदिर में शादी बेहद सादगी के साथ हो जाती थी लेकिन अब आम शादियों की तरह ही शादी होगी. नई नवेली दुल्हन लक्ष्मी भी खुश है कि उसके घर में आते ही 85 साल पुरानी की बंदिश टूट गई है.
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