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कैसे बनता है 'अल नीनो'? जानिए मानसून पर असर की प्रक्रिया? 19वीं शताब्दी में पेरू के मछुआरों ने पहली बार देखा था 'अल नीनो'

'अल नीनो' भारत में सूखा नहीं लाता है. देश के मानसून को दूसरे कारक भी प्रभावित करते हैं. रांची से उपेंद्र कुमार की रिपोर्ट

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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : July 4, 2026 at 6:35 AM IST

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रांची: इन दिनों पूरी दुनिया में 'अल नीनो' की खूब चर्चा है. हर कोई इस बार मानसून के कमजोर रहने के पीछे की वजह 'अल नीनो' इफेक्ट को बता रहा है. ऐसे में ईटीवी भारत के संवाददाता ने रांची स्थित मौसम केंद्र के वरिष्ठ मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक अभिषेक आनंद ने विस्तार से 'अल नीनो' और उसके दक्षिणी पश्चिमी मानसून पर प्रभाव पर विस्तार से बात की. अभिषेक आनंद ने बताया कि सामान्य भाषा में कहा जाए तो प्रशांत महासागर के पूर्वी-पश्चिमी भाग में सतही समुद्री तापमान में बदलाव से, जो स्थिति निर्मित होती है, वही 'अल नीनो' कहलाता है.

पेरू देश के तट से बहती है ठंडी व्यापारिक हवाएं

वरिष्ठ मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक बताते हैं कि सामान्यतः साउेथ अमेरिका के पेरू के पास समुद्र में कोल्ड यानी ठंडा करेंट होता है और उसके पश्चिम में ऑस्ट्रेलिया के पास डार्विन के पास समुद्री जलधाराएं काफी गर्म होती है, ऐसे में पेरू तट से ठंडी व्यापारिक हवाएं (trade wind) पश्चिम में ऑस्ट्रेलिया (डार्विन) की ओर बहती हैं. डार्विन के पास प्रशांत महासागर की गर्म और उफान लेते पानी के संपर्क में आने से बादल का निर्माण होता है और इस इलाके में अच्छी वर्षा कराते हुए ये सिस्टम भू-मध्य रेखा (इक्वेटर) को पार करके भारतीय महाद्वीप में प्रवेश करते हुए इंडिया में अच्छी मानसूनी बारिश कराने में सहायक बनता है.

पेरू के पास होती है ज्यादा बारिश, साइक्लोन, बाढ़ जैसी स्थिति

रांची स्थित मौसम केंद्र के वरिष्ठ मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक सामान्य भाषा में 'अल नीनो' के बनने और उसके प्रभाव को समझाने के क्रम में आगे बताते हैं कि कई बार ऐसा होता है कि दक्षिण लैटिन अमेरिका के पास प्रशांत महासागर में जिस सतही समुद्री पानी को ठंडा रहना चाहिए था, वह उसी जगह पर काफी गर्म हो जाता है, ऐसे में जो व्यापारिक हवा पेरू से ऑस्ट्रेलिया की ओर बहनी चाहिए थी, वह सिस्टम बनता ही नहीं है. नतीजा यह होता है कि पेरू के पास ही अत्यधिक बारिश, साइक्लोन, बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है और ऑस्ट्रेलिया के पास जिसे डार्विन कहते हैं, वहां तक सिस्टम नहीं पहुंच पाता है.

प्रशांत महासागर से उठने वाले बदलाव से भारत में होती है मानसूनी बारिश

अभिषेक आनंद ने कहा कि ऑस्ट्रेलिया के पास बनने वाला सिस्टम ही इक्वेटर को क्रॉस करके भारतीय उपमहाद्वीप में प्रवेश करता है, ऐसे में जब डार्विन के पास बना सिस्टम कमजोर हो, तो उसका प्रभाव मानसून पर पड़ना स्वभाविक है. पेरू-ऑस्ट्रेलिया के बीच प्रशांत महासागर में समुद्री सतह के तापमान में बदलाव से निर्मित स्थिति को 'अल नीनो' नाम दिया गया है. भारत के संदर्भ में कह सकते हैं कि प्रशांत महासागर से उठने वाला वह बदलाव, जो भारत की मानसूनी बारिश, खेती और यहां तक कि देश की अर्थव्यवस्था तक को प्रभावित कर देता है, इसलिए यह भारत के लिए बहुत मायने रखता है.

'अल नीनो' के बारे में जानकारी देते हुए वरिष्ठ मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक अभिषेक आनंद (Etv Bharat)

हर 2 से 7 साल में होने वाली समुद्री जलवायु घटना है 'अल नीनो'

वरिष्ठ मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक अभिषेक आनंद कहते हैं कि 'अल नीनो', हर 2 से 7 साल में बनने वाली समुद्री-जलवायु घटना है लेकिन साल 2026 में यह चर्चा में अधिक और इस वजह से आया है क्योंकि इस बार इसका असर पूरे 'मानसून' तक रहेगा. पहले या तो यह मानसून से पहले बन जाता था या फिर मानसून के बीच या अंत के समय में. ऐसे में इसका असर मानसूनी बारिश पर बहुत ज्यादा नहीं होता था लेकिन इस बार मानसून के शुरुआत से लेकर आखिरी तक 'अल नीनो' का प्रभाव रहेगा. उन्होंने बताया कि 'अल नीनो' बन गया है और इसकी तीव्रता और बढ़ेगी, ऐसे में इस बार मानसून के अनियमित और कमजोर रहने के साथ-साथ गर्मी में भी बढ़ोतरी होगी.

क्या होता है 'अल नीनो' का शाब्दिक अर्थ

दुनिया भर के मौसम में छोटे-बड़े बदलाव होते रहते हैं, उनमें से कुछ बदलाव इतने शक्तिशाली होते हैं कि उनका असर हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों पर भी दिखाई देता है. इसी तरह का एक बदलाव है 'अल नीनो' का बनना, भारत में कभी अचानक मानसून कमजोर पड़ जाए, कहीं सूखे जैसी स्थिति बनने लगे, भीषण गर्मी बढ़ जाए या खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो जाए, तो इसके पीछे कई बार एक वैश्विक जलवायु घटना भी जिम्मेदार हो सकती है और वह है 'अल नीनो'.

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'अल नीनो' का अर्थ है 'लिटल बॉय'

इन दिनों अधिकतर लोग 'अल नीनो' का नाम खबरों में सुन रहे हैं लेकिन यह वास्तव में क्या है, यह कैसे बनता है और भारत पर इसका असर इतना अधिक क्यों पड़ता है, इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को होती है. सरल शब्दों में कहे तो 'अल नीनो' समुद्र और वातावरण के बीच होने वाला ऐसा बदलाव है, जो पृथ्वी के मौसम के बड़े हिस्से को प्रभावित करने की ताकत रखता है. वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिक 'अल नीनो' को परिभाषित करते हुए बताते हैं कि यह एक स्पेनिश शब्द है, जिसका अर्थ लिटल बॉय या छोटा लड़का होता है.

आखिर क्या होता है 'अल नीनो'?

'अल नीनो' प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी भाग में समुद्र की सतह के पानी का सामान्य से बहुत अधिक गर्म हो जाना है. यह केवल समुद्र के पानी का गर्म होना नहीं होता है बल्कि समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाले एक बड़े परिवर्तन का भाग होता है. मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक के अनुसार, वैज्ञानिक भाषा में यह ENSO (El Nino Southern Oscillation) नामक प्रणाली का बेहद गर्म चरण माना जाता है, यहां यह बताना भी बेहद जरूरी है कि ENSO पृथ्वी की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु प्रणालियों में से एक है.

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'अल नीनो' में व्यापारिक हवा का महत्व

वरिष्ठ मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक अभिषेक आनंद कहते हैं कि सामान्य परिस्थिति में प्रशांत महासागर के ऊपर पूर्व से पश्चिम दिशा में चलने वाली व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) गर्म पानी को एशिया-ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती रहती हैं, इसके कारण दक्षिण अमेरिका के तटों के पास नीचे से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आता है. यही वजह है कि पेरू और आसपास के समुद्र में मत्स्य पालन खूब होता है लेकिन जब ये व्यापारिक हवाएं कमजोर होने लगती हैं या दिशा बदलने लगती हैं, तब गर्म पानी वापस पूर्वी प्रशांत क्षेत्र की ओर फैलने लगता है, इससे समुद्र के बड़े हिस्से का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है और यही स्थिति 'अल नीनो' कहलाती है.

19वीं सदी में इजाद हुआ था 'अल नीनो' शब्द

'अल नीनो' नामाकरण के पीछे के रोचक इतिहास का जिक्र करते हुए अभिषेक आनंद बताते हैं कि 19वीं सदी में पेरू के मछुआरों ने देखा कि क्रिसमस के आसपास समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता था चूंकि यह घटना ईसा मसीह के जन्मोत्सव के समय दिखाई देती थीं, इसलिए उन्होंने इसे 'El Nino' नाम दिया. बाद में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह केवल स्थानीय घटना नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करती है.

यह कितने वर्षों के अंतराल पर बनता है?

मौसम वैज्ञानिक के मुताबिक, 'अल नीनो' किसी निश्चित कैलेंडर के अनुसार नहीं बनता, न ही इसका कोई तय समय होता है. वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, यह पाया गया है कि यह सामान्यतः हर 2 से 7 सालों के अंतराल पर विकसित हो सकता है, कभी यह कमजोर रहता है तो कभी बहुत शक्तिशाली रूप ले सकता है. अगर इतिहास में देखें तो 1982-83 और 1997-98 के 'अल नीनो' को सबसे शक्तिशाली घटनाओं में गिना जाता है.

भारत पर क्यों पड़ता है अल नीनो का प्रभाव?

सबसे अहम सवाल यह है कि प्रशांत महासागर तो भारत से हजारों किलोमीटर दूर है, फिर इसका असर भारत पर क्यों दिखाई देता है? इस सवाल के जवाब में ऑस्ट्रेलिया के पास व्यापारिक हवाओं का इक्वेटर को पार करके भारतीय उपमहाद्वीप की ओर बढ़ने की जानकारी पूर्व में दे चुके मौसम वैज्ञानिक अभिषेक आनंद बताते हैं कि असल में पृथ्वी का मौसम आपस में जुड़ा हुआ है, एक महासागर में होने वाला बड़ा परिवर्तन वायुमंडल के दबाव, हवाओं और नमी के प्रवाह को प्रभावित करता है. भारत का मानसून भी इन्हीं वैश्विक प्रणालियों से जुड़ा हुआ है. जब 'अल नीनो' बनता है, तब वातावरणीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) में बदलाव आता है और भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाओं की ताकत कम हो जाती है, परिणाम स्वरूप मानसून कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है.

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भारत में 'अल नीनो' के दुष्प्रभाव

1. मानसून कमजोर

भारत में लगभग 70% वार्षिक वर्षा दक्षिण-पश्चिम यानी समर मानसून से ही होती है. यदि मानसून कमजोर हुआ तो वर्षा कम हो सकती है.

2. कृषि उत्पादन प्रभावित होगा

भारत की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है. यदि बारिश कम हुई तो धान, दाल, मक्का और अन्य फसलों की खेती प्रभावित हो सकती है. कम वर्षा के कारण बोआई प्रभावित होने, पैदावार घटने और अन्नदाता किसानों की आय कम होने की संभावना बढ़ जाती है, ऐसे में खाद्यान्न कीमतें बढ़ने और महंगाई से आमजन का जनजीवन प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है.

3. गर्मी और हीटवेव में बढ़ोतरी

अभिषेक आनंद ने बताया कि 'अल नीनो' साल में और उसके अगले साल में कई क्षेत्रों में सामान्य से अधिक तापमान दर्ज किया जाता है. इससे लू की घटनाएं बढ़ सकती हैं. बिजली की मांग बढ़ सकती है. स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ सकती हैं.

4. जल संकट

कम मानसूनी बारिश होने पर, जलाशयों का स्तर घट सकता है. भूजल पर दबाव बढ़ सकता है. पीने के पानी की समस्या बढ़ सकती है.

5. महंगाई पर असर

कम उत्पादन का सीधा असर बाजार पर पड़ सकता है यदि सब्जियां, अनाज और खाद्यान्न कम पैदा होंगे तो कीमतें बढ़ सकती हैं और आम लोगों के घरेलू बजट पर असर पड़ सकता है.

क्या 'अल नीनो' का मतलब भारत के लिए सुखाड़ होता है

रांची स्थित मौसम केंद्र के मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक कहते हैं कि भारत के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि हर 'अल नीनो' वर्ष सूखा नहीं लाता. भारत के मानसून को अन्य कारक भी प्रभावित करते हैं. जैसे हिंद महासागर द्विध्रुव (Indian Ocean Dipole-IOD) स्थानीय मौसम प्रणाली, समुद्री तापमान, वायुमंडलीय बदलाव आदि. उन्होंने कहा कि कुछ सालों में 'अल नीनो' के बावजूद भारत और झारखंड में सामान्य बारिश भी हुई है. उन्होंने बताया कि अगर इंडियन ओसियन डाइपोल अगस्त-सितंबर में पॉजिटिव हुआ तो यह 'अल नीनो' के दुष्प्रभाव की काट हो सकता है.

'अल नीनो' के ठीक उलट होता है ला नीना: अभिषेक आनंद

मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक बताते हैं कि 'अल नीनो' के ठीक उलट प्रभाव वाला सिस्टम 'ला नीना' कहलाता है, लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि 'ला नीना' केवल 'अल नीनो' का उल्टा नाम भर नहीं है बल्कि यह प्रशांत महासागर में होने वाली एक अलग जलवायु स्थिति है, जो भारत समेत पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करती है. अगर आसान भाषा में समझें तो जहां 'अल नीनो' में समुद्र का पानी सामान्य से अधिक गर्म होता है तो 'ला नीना' में समुद्र का पानी सामान्य से अधिक ठंडा हो जाता है. इन दोनों को मिलाकर ही एक बड़े जलवायु चक्र का हिस्सा बनता है, जिसे El Nino–Southern Oscillation कहा जाता है.

कैसे बनता है 'ला नीना'?

मौसम वैज्ञानिक अभिषेक आनंद एक चार्ट की मदद से बताते हैं कि प्रशांत महासागर में सामान्यतः पूर्व से पश्चिम दिशा में चलने वाली व्यापारिक हवाएं (Trade Winds) गर्म पानी को एशिया और ऑस्ट्रेलिया की ओर धकेलती हैं लेकिन 'ला नीना' के दौरान ये हवाएं सामान्य से ज्यादा मजबूत हो जाती हैं, गर्म पानी और अधिक पश्चिम की ओर चला जाता है. दक्षिण अमेरिका के तट के पास समुद्र की गहराई से ठंडा पानी ऊपर आने लगता है, इससे मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है. यहीं से 'ला नीना' की शुरुआत होती है.

भारतीय उपमहाद्वीप पर 'ला नीना' का प्रभाव

1. भारत पर ला नीना का असर

अक्सर 'अल नीनो' के उलट देखा जाता है. इस दौरान मानसून सामान्य से बेहतर हो सकता है. भारत में 'ला नीना' के दौरान अक्सर दक्षिण-पश्चिम मानसून मजबूत हो जाता है और सामान्य से अधिक बारिश हो सकती है. कृषि को फायदा मिल सकता है लेकिन 'अत्यधिक बारिश' से होने वाले नुकसान का खतरा भी बना रहता है.

2. बाढ़ की आशंका

भारत के कई भागों जैसे असम, उत्तर प्रदेश, पूर्वोत्तर राज्य और बिहार में अत्यधिक बारिश से नदियों में उफान, बाढ़ की संभावना बढ़ जाती है. फसल और जनजीवन प्रभावित हो सकते हैं.

3. सर्दियां, ज्यादा ठंड

'अल नीनो' के दौरान उत्तर भारत में तापमान सामान्य से कम हो सकता है. ठंड की अवधि भी बढ़ सकती है और कोहरे की घटनाओं में इजाफा हो सकता है.

4. चक्रवातों पर असर

हिंद महासागर और अरब सागर में चक्रवातों के पैटर्न पर भी 'ला नीना' का असर पड़ सकता है.

5. कृषि पर प्रभाव

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'ला नीना' के फायदे

धान, मक्का जैसी बारिश आधारित फसल बेहतर हो सकती है, जबकि नुकसान के रूप में कहा जाये तो बहुत अधिक बारिश से फसल खराब भी हो सकती है. जलभराव और रोग बढ़ सकते हैं. अगले साल भी असर होगा, गर्मी बढ़ेगी. 'अल नीनो' के प्रभाव से अगले साल भी तापमान में बढ़ोतरी की आशंका जताते हुए मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक अभिषेक आनंद ने बताया कि प्रशांत महासागर में सेंसर आधारित Automatic Buoys से Sea Surface के टेम्परेचर पर लगातार नजर रखी जा रही है.

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बदलते वैश्विक तापमान पर वैज्ञानिक की नजर

वरिष्ठ मौसम पूर्वानुमान वैज्ञानिक अभिषेक आनंद ने बताया कि आज जलवायु परिवर्तन के दौर में वैज्ञानिक इस पर लगातार नजर रख रहे हैं, क्योंकि बदलते वैश्विक तापमान के साथ इसके प्रभाव और अधिक जटिल तथा तीव्र हो सकते हैं. इसलिए 'अल नीनो' को समझना केवल वैज्ञानिकों की जरूरत नहीं है बल्कि आम लोगों के लिए भी जरूरी होता जा रहा है क्योंकि कभी-कभी हजारों किलोमीटर दूर समुद्र में उठी हलचल हमारे खेतों, थाली और हमारे भविष्य तक को प्रभावित कर सकती है.

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