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SC ने अदालतों को 'डिजिटल अरेस्ट' धोखाधड़ी के आरोपियों को रिहा करने से रोका, बुजुर्ग महिला वकील से ठगी का मामला

सुप्रीम कोर्ट ने 72 वर्षीय महिला वकील से 'डिजिटल अरेस्ट' के जरिए 3.29 करोड़ रुपये की ठगी के मामले को गंभीरता से लिया.

SC DIGITAL ARREST FRAUD
सुप्रीम कोर्ट (ANI)
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By Sumit Saxena

Published : November 18, 2025 at 7:17 AM IST

5 Min Read
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अदालतों को उस आरोपी को जेल से रिहा करने से रोक दिया जिसने शीर्ष अदालत की 72 वर्षीय महिला वकील से 'डिजिटल गिरफ्तारी' धोखाधड़ी के जरिए 3.29 करोड़ रुपये की ठगी की थी.

यह मामला न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष आया. पीठ ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) द्वारा दायर हस्तक्षेप आवेदन को रिकॉर्ड में लिया. वकीलों के संघ ने महिला वकील का मामला उठाया और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की.

एससीएओआरए के अध्यक्ष विपिन नायर ने दलील दी कि बुजुर्ग महिला वकील ने अपनी जमा-पूंजी गँवा दी. उन्होंने जोर देकर कहा कि इस साल मई में एफआईआर दर्ज होने के बाद गिरफ़्तार किए गए आरोपी जल्द ही जमानत पर रिहा होने वाले हैं. पीठ ने कहा कि उसे इन मामलों से सख्ती से निपटना होगा ताकि सही संदेश जाए और कहा, 'एक असामान्य घटना के लिए असामान्य हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है.'

पीठ ने कहा, 'इस बीच संदिग्ध विजय खन्ना और अन्य सह-आरोपियों को किसी भी अदालत द्वारा रिहा नहीं किया जाएगा. वे किसी भी राहत के लिए इस अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं.' पीठ ने नायर से कहा कि वह किसी के जीवन और स्वतंत्रता के विरुद्ध नहीं है. और कहा, 'लेकिन यह मामला असामान्य आदेशों का हकदार है.'

नायर ने दलील दी कि पुलिस आरोपियों से 42 लाख रुपये से अधिक की वसूली करने में सक्षम थी, लेकिन यह मामला ऐसे अपराधों से जुड़ी प्रक्रियागत शून्यता और जाँच में निष्क्रियता को दर्शाता है. पीठ के समक्ष यह तर्क दिया गया कि मजिस्ट्रेट द्वारा पीड़िता के बैंक खाते में धनराशि जमा करने के निर्देश के बावजूद बैंक ने धनराशि स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

पीठ ने कहा कि जल्द ही पैन-दिशानिर्देश जारी किए जाएँगे और एजेंसियों के लिए यह आँखें खोलने वाला होगा. पीठ को बताया गया कि धोखेबाज इतने भरोसेमंद थे कि महिला ने अपनी सावधि जमा राशि तोड़कर राशि का भुगतान कर दिया. नायर ने कहा कि साइबर अपराधी युवाओं को नहीं बल्कि भोले-भाले बुजुर्गों को निशाना बना रहे हैं और उनकी जीवन भर की बचत लूट रहे हैं.

एक वकील ने बताया कि भारत ने साइबर अपराध पर संयुक्त राष्ट्र संधि की पुष्टि नहीं की है जो उसे सीमा पार इन अपराधियों का पता लगाने में मदद करेगी. पीठ ने मेहता से इस मुद्दे पर विचार करने को कहा और मामले की अगली सुनवाई 24 नवंबर के लिए निर्धारित कर दी. पीठ ने इस मामले में न्यायमित्र नियुक्त की गईं अधिवक्ता एन.एस. नप्पिनाई से कहा कि जल्द ही उनसे पूरे भारत में विज्ञापन देने को कहा जाएगा, जिसमें लोगों से ऐसे साइबर अपराधों के बारे में उनसे संपर्क करने को कहा जाएगा, ताकि अपराध की वास्तविक गंभीरता का पता चल सके.

डिजिटल गिरफ्तारी साइबर अपराध का एक बढ़ता हुआ रूप है जिसमें धोखेबाज कानून प्रवर्तन अधिकारी, अदालती अधिकारी या सरकारी एजेंसियों के कर्मचारी बनकर ऑडियो और वीडियो कॉल के जरिए पीड़ितों को धमकाते हैं. वे पीड़ितों को फंसाकर उन पर पैसे देने का दबाव बनाते हैं. 3 नवंबर को शीर्ष अदालत ने कहा था कि देश में बड़ी संख्या में पीड़ितों, खासकर बुजुर्गों, को डिजिटल गिरफ्तारियों के जरिए धोखेबाजों द्वारा 3,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का चूना लगाया गया.

अदालत ने आश्चर्य जताया था कि वैश्विक स्तर पर क्या स्थिति होगी? पीठ ने कहा, 'हमें न्यायिक आदेशों के जरिए अपनी एजेंसियों के हाथ मजबूत करने होंगे. हम इन अपराधों से सख्ती से निपटने के लिए प्रतिबद्ध हैं.' 17 अक्टूबर को शीर्ष अदालत ने एक वरिष्ठ नागरिक दंपति की डिजिटल गिरफ्तारी को गंभीरता से लिया, जिसमें धोखेबाजों ने शीर्ष अदालत और जाँच एजेंसियों के जाली आदेशों के आधार पर 1.05 करोड़ रुपये की उगाही की थी.

अदालत ने डिजिटल गिरफ्तारी घोटाले से संबंधित स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र, सीबीआई और अन्य को नोटिस जारी किया. मामले में वरिष्ठ नागरिकों की जीवन भर की बचत ठगी गई. शीर्ष अदालत ने 73 वर्षीय महिला द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई को पत्र लिखने के बाद स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज मामले में केंद्र और सीबीआई से जवाब माँगा.

अदालत ने कहा कि यह स्वत: संज्ञान रिट याचिका अंबाला के एक वरिष्ठ नागरिक दम्पति द्वारा दायर शिकायत के कारण ली गई है, जिनके साथ 3 सितम्बर, 2025 से 16 सितम्बर, 2025 के बीच डिजिटल गिरफ्तारी घोटाले के माध्यम से उनकी जीवन भर की बचत ठगी गई.

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