राष्ट्रकवि दिनकर की नजरों में 'बिहार का वृंदावन', भिरहा गांव के पोखर में घोली जाती है रंग
समस्तीपुर के एक गांव में ब्रज शैली की होली मनाई जाती है. रंग पोखर में घोले जाते हैं और होती है गीत-संगीत की प्रतियोगिता. पढ़ें-

Published : March 3, 2026 at 7:03 AM IST
समस्तीपुर: बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा प्रखंड के अंतर्गत स्थित भिरहा गांव होली के अनोखे उत्सव के लिए पूरे बिहार में प्रसिद्ध है. यहां की होली को “बिहार का वृंदावन” कहा जाता है, जहां रंगों का त्योहार ब्रज की परंपरा की तरह मनाया जाता है. राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने इस गांव की होली देखकर इसे बिहार का वृंदावन करार दिया था. यहां रंग बाल्टी या लोटों में नहीं, बल्कि गांव के मध्य स्थित होली पोखर में घोला जाता है, जो इस उत्सव को खास बनाता है.
ब्रज शैली की परंपरा से जुड़ा ऐतिहासिक उत्सव: भिरहा की होली की शुरुआत कई दशकों पहले हुई, कुछ स्रोतों के अनुसार 1932 से या इससे भी पहले 1836 से ब्रज की तर्ज पर यह परंपरा चली आ रही है. ग्रैमीण गंगानंद ठाकुर ने बताया कि ब्रज की होली देखकर यहां के लोगों ने इसी तरह का आयोजन शुरू किया. तीन दिनों तक चलने वाले इस महोत्सव में पश्चिम, उत्तर और पूर्व टोलों के बीच गीत-संगीत और रंगों का मुकाबला होता है. दूर-दराज से लोग, यहां तक कि राजस्थान, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों से बैंड पार्टियां और कलाकार बुलाए जाते हैं.
"इस अनोखी होली में यंहा के तीनों, पश्चिम, उत्तर एव पूरब टोलों के बीच बेहतर प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा चलती है. होली के मौके पर तीन दिनों तक इन सभी टोलों में अलग-अलग आयोजन होते हैं. इसमें राजस्थान, दिल्ली और मुंबई जैसे स्थानों से बैंड पार्टियां और नर्तकी बुलाई जाती हैं. वहीं होली के दिन गांव के मध्य वाले होली पोखर के किनारे गीत और संगीत के साथ ही रंग और गुलाल का बड़ा मुकाबला होता है."-गंगानंद ठाकुर, ग्रामीण
होली पोखर: उत्सव का मुख्य केंद्र: गांव के बीचों-बीच स्थित होली पोखर इस उत्सव का दिल है. होली के दिन यहां रंग और गुलाल के साथ गीत-संगीत के टोलों के बीच जोरदार प्रतियोगिता होती है. लोग पोखर में रंग घोलकर एक-दूसरे पर छिड़कते हैं, जिससे पूरा इलाका रंगों से सराबोर हो जाता है. यह नजारा देखने के लिए बिहार के विभिन्न जिलों के अलावा अन्य राज्यों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं. आयोजनकर्ता इसे बदलते समय में भी पुरानी संस्कृति को जीवित रखने का माध्यम बताते हैं.

टोलों के बीच साल भर की तैयारी और प्रतिस्पर्धा: भिरहा के विभिन्न टोलों पुरवरिया, पश्चिम, उत्तर और पूरब के लोग साल भर इस उत्सव की तैयारी में जुटे रहते हैं. होली से कई दिन पहले पोखर के आसपास सफाई, सजावट और पंडाल बनाने का काम शुरू हो जाता है. बड़े-बड़े पंडालों में खूबसूरत लाइटिंग से पूरा गांव जगमगा उठता है. टोलों के बीच बेहतर प्रदर्शन की होड़ लगी रहती है, जिसमें लोकगीत, नृत्य और संगीत का प्रदर्शन प्रमुख होता है.

दूर-दराज से आते हैं रिश्तेदार और पर्यटक: यह उत्सव इतना लोकप्रिय है कि भिरहा और आसपास के गांवों के लोग चाहे दुनिया में कहीं भी रहें, होली पर घर लौट आते हैं. रिश्तेदार दूर-दराज के शहरों से पहुंचते हैं. गांव में जाति-धर्म की दीवारें टूट जाती हैं और सभी मिल-जुलकर उत्सव मनाते हैं. यह आयोजन सामाजिक एकता का प्रतीक भी बन चुका है.
आयोजकों का प्रयास, संस्कृति को बनाए रखना: आयोजन समिति के सदस्य राजीव कुमार चौधरी बताते हैं कि बदलते दौर में भी वे भिरहा की पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. बुजुर्गों की देखरेख में नई पीढ़ी इस उत्सव को संभाल रही है. बैंड और नर्तकियों के अलावा स्थानीय कलाकारों का प्रदर्शन इसे और आकर्षक बनाता है.

"आज से कई दशक पहले ब्रज की होली देख गांव के कई लोगों ने भिरहा में कुछ उसी अनुरूप होली की शुरुआत की. यंहा के बुजुर्गो ने बताया उसके अनुसार, साल 1932 से यंहा कुछ इसी तरह 3 दिनों तक ब्रज जैसी परंपरा के साथ होली की शुरुआत हुई थी."-राजीव कुमार चौधरी, ग्रामीण
एक अनोखा रंगोत्सव जो बिहार की शान है: भिरहा की होली न केवल मिथिलांचल बल्कि पूरे बिहार और देश की सांस्कृतिक धरोहर है. जहां रंग पोखर में घुलते हैं, वहां भावनाएं भी उमड़ती हैं. यह उत्सव बताता है कि परंपराएं कितनी जीवंत हो सकती हैं. होली पर भिरहा आकर आप खुद को ब्रज की छटा में महसूस करेंगे, जहां रंग सिर्फ रंग नहीं, बल्कि खुशियों का प्रतीक बन जाते हैं.
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