बिहार के मूर्तिकार का गजब का है टैलेंट, 1 इंच से छोटी और 20 फीट तक ऊंची बनाते हैं प्रतिमा
बिहार के विजय कुमार एक इंच से भी कम से लेकर 20 फीट ऊंची मूर्तियां बनाते हैं. विदेशी पर्यटक भी उनकी कला के कायल हैं.

Published : December 30, 2025 at 5:05 PM IST
रिपोर्ट: सरताज अहमद
गया: मूर्तिकार विजय कुमार के पिता बिरजू बताते हैं कि "महज 5 साल की उम्र से मेरा बेटा गिट्टी को तराशता था और 10 साल की उम्र में लकड़ी पर मेरा चेहरा उकेर दिया था. उसकी कला देखकर मेरे साथ ही दूसरे मूर्तिकार भी दंग रह गए थे."
पिता को बेटे की कला पर गर्व: बोधगया के मूर्तिकार विजय कुमार की कला की विदेशों में भी खूब डिमांड है. उनके इस कारोबार में आर्थिक आमदनी भी ज्यादा नहीं थी, लेकिन फिर भी विजय ने अपने पिता से मूर्ति बनाने का काम सीखा. तब पिता को भी मालूम नहीं था कि एक दिन विजय की कारीगरी के सामने उनकी महारत भी फीकी पड़ जाएगी. आज पिता को अपने बेटे की कला पर गर्व है.
"विजय को बचपन से ही मूर्ति बनाने का शौक था. वह 5 साल की उम्र से ही पत्थर की गिट्टी लेकर तराशता रहता था. 10 साल की उम्र में उसने लकड़ी से मेरा चेहरा बना दिया था. छोटी मूर्ति बनाने में वो इस कदर माहिर है कि उससे दूसरे कारीगरों ने मूर्ति बनाने की बारीकी सीखी है. आज भी उसके पास हर दिन कोई ना कोई सीखने आता है. वो कम उम्र में ही मूर्तिकारों का गुरु बन गया था."- बिरजू, विजय के पिता
खास है विजय की मूर्तियां: बिहार के विश्वप्रसिद्ध शहर बोधगया में 38 वर्ष के विजय कुमार मूर्ति कला के लिए प्रसिद्ध हैं. विजय छोटे से छोटे पत्थर को भी तराश कर खूबसूरत मूर्ति बनाने में महारत रखते हैं. उनके हाथों से बनी भगवान बुद्ध , विष्णु पद मंदिर और देवी देवताओं समेत अन्य मंदिरों के अलावा महापुरुषों की बड़ी और छोटी प्रतिमाएं बन कर देश विदेशों तक जाती हैं.

"हमने ठेले से भगवान बुद्ध की एक छोटी मूर्ति खरीदी है. मैं अपने माता-पिता के साथ बोधगया मंदिर के दर्शन के लिए गयाजी के रानीगंज से आई हूं. मुझे छोटी मूर्ति भगवान बुद्ध की पसंद आई. मैंने इसे 100 रुपए में खरीदा है. मुझे मूर्ति घर में रखने में अच्छा लगता है."- प्रीति कुमारी, पर्यटक
1 इंच से भी छोटी मूर्ति बनाने में माहिर: विजय कुमार मूलरूप से गयाजी के खिजरसराय प्रखंड के खुखरी गांव के रहने वाले हैं. वह बोधगया में महाबोधि मंदिर से कुछ दूरी पर मुख्य सड़क के किनारे मूर्ति तराशते हैं. हर दिन सड़क किनारे ही जमीन पर बैठ कर अपने हाथों से पत्थर और लकड़ी तराशते नजर आएंगे, क्योंकि उनकी बड़ी दुकान नहीं है, बल्कि जहां पर वो पत्थरों को तराशते हैं वहीं पर वो एक ठेला भी लगाते हैं.

मूर्ति बनाने में लगता है कितना समय: विजय बताते हैं कि मूर्तियों के साइज पर टाइम निर्भर करता है. 8 इंच की मूर्ति बनाने में एक दिन का समय लगता है. वहीं 1 इंच से छोटी मूर्ति जल्दी बन जाती है. 1 दिन में 10 मूर्ति बन जाती है.
मार्बल और लकड़ी पर नक्काशी: ठेले पर ही उनके द्वारा बनाई गई एक से बढ़कर एक मूर्तियां रखी होती हैं. उन मूर्तियों के कलेक्शन में उनके पास 1 इंच से भी छोटी साइज से लेकर 5 फीट तक की भगवान बुद्ध और अन्य भगवान की मूर्ति है. चूंकि वो पत्थरों और लकड़ी को तराश कर बड़ी से लेकर छोटी मूर्तियां बनाते हैं इसलिए उनको बोधगया में ' घोटे मूर्तिकार' के रूप में भी पहचान मिली है.

गरीबी के कारण पढ़ाई रह गई अधूरी: विजय कुमार ने इंटर तक की पढ़ाई की है. वो कहते हैं कि गरीबी के कारण आगे की पढ़ाई नहीं की, क्योंकि उस समय उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. पिता बिरजू लाल चौधरी भी मूर्ति बनाने का ही कार्य करते थे, लेकिन तब उनके काम के प्रशंसक नहीं थे.
देश-विदेशों में गई है मूर्ति: विजय कुमार बताते हैं कि उनके द्वारा हर तरह की प्रतिमाएं और मूर्तियां बनाई जाती हैं. साइज डिमांड के अनुसार भी वे बनाते हैं. अब तक उन्होंने एक इंच से भी छोटी से लेकर 20 फीट तक की पत्थर की मूर्ति बनाई है, जबकि लकड़ी से 7 फीट तक की प्रतिमाएं और मूर्ति बना चुके हैं.

"ठेले पर मूर्ति बेचते हैं. हम जैसी चाहें वैसी मूर्ति बनाकर यह कुछ घंटे में दे देते हैं. पहले भी मैंने इनसे एक बड़ी साइज की भगवान बुद्ध की मूर्ति ली थी. आज मैंने 1 इंच की छोटी मूर्ति खरीदी है. इन्हें मैं काफी दिनों से जानता हूं. मैं भी बोधगया आता रहता हूं, मैं लद्दाख का रहने वाला हूं और अभी एक महीने से बोधगया में हूं."- बौद्ध मोंक
"पर्यटन विभाग की ओर से भी मूर्ति बनवाई गई है. 100 रुपए से लेकर 5 लाख रुपए तक की प्रतिमा बना चुके हैं. मूर्तियां तिब्बत, थाईलैंड, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान, अमेरिका जैसे देशों में गई हैं. मूर्ति या प्रतिमा बेचने के लिए कहीं प्रचार प्रसार करने नहीं गए बल्कि ज्यादातर मूर्तियां बोधगया या फिर घर से ही खरीद कर पर्यटक अपने देश ले जाते हैं. एक महीने पहले ही इंग्लैंड के एक व्यक्ति ने एक लाख की मूर्ति अपने पिता की बनवाई थी."- विजय कुमार, मूर्तिकार

छोटी मूर्ति बनाने में कठिनाई: विजय कुमार बताते हैं कि वैसे तो मूर्ति कला आसान नहीं है. बारीकी से पत्थरों को तराशा जाता है, बड़ी प्रतिमाएं बनाने में तो कुछ हद तक आंखों पर कम जोर पड़ता है, लेकिन छोटी मूर्ति जो एक इंच से कम होती हैं, उनको तराशने में आंखों पर जोर ज्यादा पड़ता है. मैं सभी काम हाथों से करता हूं. पुरानी तकनीक से ही लोहे के औजार से ही पत्थरों को तराशते हैं.
"अभी बोधगया में भगवान बुद्ध की एक इंच की मूर्ति की डिमांड ज्यादा है, क्योंकि लोग इसे माला में डाल कर रखते हैं. वैसे लोग भी मेरे पास आते हैं जो धागे में डालकर मूर्ति गले में पहनते हैं. बौद्ध भिक्षु से लेकर पर्यटक कम से कम छोटी मूर्ति जरूर खरीदते हैं."-विजय कुमार, मूर्तिकार
दूसरे राज्यों से मंगवाते हैं पत्थर: विजय कुमार कहते हैं कि छोटी मूर्तियां बनाने के लिए उन्हें बाहर से पत्थर नहीं मंगवाने पड़ते हैं. वो कट्टी गांव या गया के दूसरे स्थानों से ब्लैक पत्थर ले लेते हैं, लेकिन बड़ी मूर्तियां और प्रतिमाएं बनाने के लिए वो हजारीबाग, चुनार , जयपुर, राजस्थान के राजनगर आदि जगहों से पत्थर मंगवाते हैं.

लकड़ी से भी बनाते हैं मूर्ति: विजय कुमार बताते हैं की लकड़ी की भी वह मूर्ति बनाते हैं. लकड़ी की मूर्ति लोग अपने घरों के लिए लेते हैं और पूजा घर में उसे रखते हैं.बड़े अधिकारी उनको मूर्ति तराशते देख कर रुकते हैं और फिर उनसे मूर्ति लेते हैं. ज्यादातर अधिकारी भी छोटी मूर्ति ही लेते हैं.
बोधगया में भगवान बुद्ध की मूर्ति की डिमांड: विजय का कहना है कि भगवान बुद्ध की मूर्ति की खूब डिमांड होती है. यहां आने वाले राजनयिकों को भी भगवान बुद्ध की मूर्ति भेंट की जाती है. उनकी बनाई हुई मूर्ति इंग्लैंड भी गई है. हालांकि विजय को इस महारत के लिए बिहार सरकार से कोई सहयोग या प्रशंसा अवार्ड के रूप में नहीं मिला है.

मूर्तियों की कीमत : वो कहते हैं कि हम पत्थर में मूर्ति बनाते हैं. जब 5 साल के थे तभी से मूर्ति बना रहे हैं. बोधगया में पिछले 10 -12 सालों से वह इस कार्य को कर रहे हैं. सीजन में हर महीन 2 लाख से अधिक की मूर्ति बेच देते हैं, जबकि पर्यटकों के ऑफ सीजन में 60 से 70 हजार महीने में कमाई कर लेते हैं. उनके ठेले पर 100 रुपए से लेकर 20000 रुपए कीमत तक की मूर्तियां मिलती हैं.

आगे की शिक्षा नहीं पूरी होने का दुख: विजय को इस उपलब्धि से खुशी तो है कि वह दूसरे कारीगरों को भी प्रशिक्षण देते हैं और अच्छी खासी आमदनी भी हो जाती है, लेकिन मायूसी इस बात की है कि उसने इंटर से आगे की पढ़ाई पूरी नहीं की. वह कहते हैं कि अगर वह और कुछ पढ़े-लिखे होते तो उन्हें यहां इस कला में भी फायदा मिलता, वह अभी कुछ दिनों बाद इंग्लिश बोलना भी सीखेंगे ताकि बोधगया में विदेशी पर्यटकों से बात करने में उन्हें आसानी हो.
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