Valentine Day Special: ये है असली प्रेम कहानी, वियोग में चीर दिया 360 फीट ऊंचे और 30 फीट चौड़े पहाड़ का सीना
माउंटेन मैन के प्रेम पथ को लोग ताजमहल से भी नायाब मानते हैं. यहां आकर प्रेम की परिभाषा समझते हैं. पढ़ें खबर


Published : February 14, 2026 at 2:36 PM IST
रिपोर्ट: रत्नेश कुमार
गया : बिहार के गया के गहलोर घाटी की वादियो में अद्भुत प्रेम की अमर कथा की गूंज है. यहां आने वाले लोग माउंटेन मैन दशरथ मांझी के प्रेम की कहानी को ताजमहल से भी नायाब मानते हैं. एक शख्सियत ने अकेले दम पर 22 वर्षों तक सिर्फ छेनी-हथौड़े से लगातार पहाड़ का सीना चीरकर अपनी पत्नी की याद में सुगम रास्ता (प्रेम पथ) बना दिया.
माउंटेन मैन बाबा दशरथ का 'प्रेम पथ' : यहां पहुंचने वाले प्रेमी युगल, दंपति बाबा दशरथ के समाधि स्थल पर पहुंचते हैं, तो उन्हें असल प्रेम की परिभाषा समझ में आती है. गहलोर घाटी में आज दशरथ मांझी का प्रेम पथ है, जहां प्रतिदिन और खासकर वैलेंटाइन डे के दिन हजारों की संख्या में प्रेमी युगल पहुंचकर बाबा दशरथ मांझी के समाधि स्थल को नमन करते हैं.

विदेश से भी पहुंचते हैं लोग : आज यहां पहुंचने वाले लोग बिहार के ही नहीं, बल्कि देशभर के होते हैं. विदेशों से भी यहां लोग आते हैं और यहां की प्रेम कहानी जानकर आश्चर्य-विस्मय से भर उठते हैं. सचमुच यह प्रेम कहानी अद्भुत और हैरान करने वाली है, जो आज प्रेम के प्रतीक स्थली के रूप में विख्यात हो चुकी है.
''हमने दशरथ मांझी और फाल्गुनिया जो कि पति-पत्नी थे, उनकी प्रेम कहानी जानी. हम लोग यहां पहुंचे हैं. अपने पति प्रिंस कुमार के साथ यहां पहुंची हूं. बाबा के समाधि स्थल का दर्शन किया. बाबा से मन्नत मांगी कि जिस तरह से उनकी प्रेम कहानी अमर है, हमें भी उससे प्रेरणा मिले और हम पति-पत्नी के बीच मजबूत प्यार बना रहे.''- रेशमी कुमारी, दशरथ मांझी के समाधि स्थल पर पहुंची महिला

भावुक कर देती हैं गहलोर की घाटियां : गहलोर घाटी पहुंचे प्रिंस कुमार कहते हैं कि हम लोग यही मन्नत मांगते हैं कि बाबा दशरथ मांझी की अमर प्रेम कहानी हमारे लिए भी प्रेरणा का स्रोत बने. हम लोग भी अपना जीवन 'प्रेम की वास्तविक परिभाषा' को समझते हुए गुजारें. यहां से प्रेम की परिभाषा की सच्ची सीख मिलती है.
''हम पति-पत्नी यहां आए हैं. हम लोग यह मानते हैं कि यह स्थान सचमुच प्रेम के प्रतीक स्थली के रूप में है. यहां की कहानी अमर कहानी है. यही वजह है कि यहां देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग आते हैं और यहां प्रेम की कहानी से प्रेरणा लेते हैं.''- प्रिंस कुमार, गहलोर पहुंचे पर्यटक

'शाहजहां की प्रेम कहानी को फीकी करती है गहलोर की वादियां' : पंजाब से पहुंचे शेखर कुमार बताते हैं कि वह बचपन में गया में रहते थे. लंबा समय गया में बीता. बाबा के बारे में सुना करते थे. आज उनकी समाधि स्थल को नमन करने आया हूं. यहां आकर हमने जाना, यह तो शाहजहां के ताजमहल को भी फीकी करने वाली स्थली है.
''शाहजहां ने तो अपनी पत्नी मुमताज की याद में ताजमहल बनाया था, लेकिन उसे कारीगरों ने बनाया था. गहलोर में तो बाबा दशरथ मांझी ने अकेले दम पर अपनी पत्नी फाल्गुनिया के प्रेम में पहाड़ का ही सीना सिर्फ छेनी हथौड़ी के सहारे चीर र रख दिया और रास्ता बना दिया.''- शेखर कुमार, पंजाब से पहुंचे पर्यटक

शेखर कुमार आगे बताते हैं कि मैं अपनी पत्नी के साथ यहां आया हूं और बाबा से प्रार्थना किया है, कि हमारे दांपत्य प्रेम को मजबूती का आशीर्वाद दें. बाबा का समाधि स्थल प्यार के मंदिर के रूप में है. सचमुच यह ताजमहल की अद्भूत चमक को भी फीकी करने वाली गहलोर घाटी है, जहां की वादियो में बाबा की अमर प्रेम कहानी की गूंज है.
दशरथ मांझी और फाल्गुनिया की प्रेम कहानी : गहलोर की वादियां दशरथ मांझी और फाल्गुनिया के अमर प्रेम की अमर गाथा के रूप में प्रसिद्ध हो गई है. यहां बड़ी-बड़ी हस्तियां आईं. सिने कलाकार आमिर खान से लेकर कई बड़े अभिनेता-नेता यहां आ चुके हैं. बाबा दशरथ मांझी के इस स्थान को विश्व स्तरीय पहचान हासिल है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत कई बड़ी शख्सियत यहां पहुंच चुके है.
'मांझी द लव स्टोरी' की पूरी कहानी आपको बताते हैं. इसके लिए आपको 1950 के बाद के समय में जाना पड़ेगा. तब दशरथ मांझी एक मजदूर थे. दशरथ मांझी हमेशा की तरह मजदूरी करने पहाड़ की ओर जाते थे और उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी रोज उनके लिए उबड़-खाबड़ पहाड़ के रास्ते से खाना और पानी लेकर पहुंचा करती थी.
वर्ष 1959 में एक दिन ऐसा हुआ कि दशरथ मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी खाना और पानी लेकर पहाड़ के रास्ते से जा रही थी. इसी क्रम में फाल्गुनी का पैर फिसला. पैर फिसलने से वह गिरी, पानी का घड़ा फूटा और गंभीर रूप से घायल हो गई.
नजदीक में अस्पताल नहीं था. अस्पताल ले जाने के लिए करीब 55 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती थी. उस समय सड़कें भी बेहद जर्जर हालत में थे. यूं कहें कि सड़क का अभाव था. सड़क के अभाव में दशरथ की पत्नी फाल्गुनिया को समय पर इलाज नहीं मिला और फाल्गुनी दुनिया से चल बसी.
पत्नी फाल्गुनिया की मौत से बाबा दशरथ मांझी काफी आहत हुए. इसके बाद दशरथ मांझी ने दृढ़ निश्चय किया. उनका दृढ निश्चय था, रास्ता नहीं होने के कारण उनकी पत्नी गिरी और फिर इलाज के अभाव में मौत हो गई. अब वे इस पहाड़ को काटेंगे और सुगम रास्ता बनाएंगे.
बस पत्नी फाल्गुनी के प्रेम में और लाखों लोगों को इस तरह की समस्या से मुक्ति दिलाने की मंशा से दशरथ मांझी ने छेनी हथौड़ी हाथों में ले ली. छेनी हथौड़ी के सहारे पहाड़ को काटने का निश्चय कर लिया. शुरू में जब उन्होंने छेनी हथौड़ी से पहाड़ काटना शुरू किया, तो लोगों ने कई तरह की बातें कही. लोग उन्हें पागल भी कहने लगे थे. किंतु उन्होंने इन सब बातों से खुद को टूटने नहीं दिया और पहाड़ को तोड़ने में लगे रहे. उनका एक ही मकसद था, पहाड़ को काटना है.
बाबा दशरथ मांझी ने अपनी पत्नी की विरह और अद्भुत प्रेम में वर्ष 1960 से जो छेनी हथौड़ी चलाना शुरू किया, वह अनवरत 1982 तक चलता रहा. एक-एक दिन, एक-एक सप्ताह, महीने, साल बीतते गए और इस तरह से 22 सालों तक बाबा दशरथ मांझी ने महज छेनी और हथौड़ी के सहारे पहाड़ का आखिरकार सीना चीर दिया. 360 फीट ऊंचा और 30 फीट चौड़ा गहलोर घाटी के पहाड़ को काट दिया. इस तरह मांझी ने अपने हौसलों से पहाड़ का गुरुर भी तोड़ा था और एक सुगम रास्ता भी तैयार कर दिया, जो दूरी 55 किलोमीटर की होती थी, वह महज चंद किलोमीटर की रह गई थी.

अमर प्रेम की कहानी लिख दी : इस तरह विरले शख्सियत दशरथ मांझी ने अमर प्रेम की एक कहानी लिख दी थी. माउंटेन मैन के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे. उनके इस अद्भुत कार्य को जानने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनको बड़ा सम्मान दिया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दशरथ मांझी के नाम पर अस्पताल, पुलिस स्टेशन बनाया. वहीं डाक टिकट भी जारी किया.
दशरथ मांझी के नाम पर कुछ योजनाएं भी चली. इस तरह माउंटेन मैन दशरथ मांझी की अद्भुत प्रेम कहानी ने उन्हें दुनिया भर में प्रसिद्ध कर दिया था. वर्ष 2015 में द माउंटेन मैन फिल्म भी बनी. दशरथ मांझी और फाल्गुनिया की प्रेम कहानी और माउंटेन मैन के मजबूती इरादों को सिनेमा और किताबों में भी उतारा गया.

'बकरी बेचकर खरीदी थी छेनी हथौड़ी' : दशरथ मांझी के पुत्र भागीरथ मांझी बताते हैं कि पिताजी ने 22 सालों में पहाड़ काटकर 55 किलोमीटर की दूरी को 15 किलोमीटर में बदल दिया. मां की जब मौत हुई थी तो पिताजी ने तीन बकरियों को बेचा था. बकरी को बेचकर छेनी हथौड़ी खरीदी थी.
''आज लाखों लोगों के लिए पहाड़ काटकर बनाई गई सड़क एक बड़ा सहारा बन गई है. अब कोई फाल्गुनी इलाज के अभाव में नहीं मरेगी. यह कहानी प्रेम की बड़ी अमर कहानी के साथ-साथ समाज के लाखों लोगों की मदद करने की भावना से भी जुड़ी कहानी है. आज बाबा दशरथ मांझी के द्वारा तैयार किए गया प्रेम पथ लाखों लोगों के लिए बड़ा खेवनहार बन गया है.''- भागीरथ मांझी, दशरथ मांझी के पुत्र

'माउंटेन मैन' रहेंगे अमर : 17 अगस्त 2007 को 73 साल की उम्र में बाबा दशरथ ने दुनिया को अलविदा कहा. किंतु गहलोर की घाटियो में अमर प्रेम की वह कहानी लिखी गई, जो सदा के लिए अमर हो गई. यह स्थान आज एक पवित्र प्रेमस्थली के रूप में पूजा जाता है. बाबा दशरथ की समाधि स्थल पर पहुंचने वाले अपने प्रेम को निस्वार्थ और मजबूत होने का आशीर्वाद मांगते हैं.
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