नेपाल जैसा खतरा कहां-कहां, GLOF को लेकर उत्तराखंड अलर्ट, एक्सपर्ट्स ग्राउंड जीरो से करेंगे ग्लेशियर झीलों की स्टडी
उत्तराखंड में संवेदनशील ग्लेशियरों झीलों की स्टडी के लिए 8 सितंबर को वैज्ञानिकों की एक टीम ग्राउंड जीरो के लिए रवाना होगी. रिपोर्ट- धीरज सजवाण-

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 31, 2026 at 5:35 PM IST
देहरादून: नेपाल में हुई त्रासदी के बाद उत्तराखंड के शासन-प्रशासन ने भी ग्लेशियरों झीलों की मॉनिटरिंग पर जोर दिया है. उत्तराखंड में भी करीब 450 ग्लेशियर झील है, जिसमें से 13 झीलों को संवेदनशील माना गाया है. इन्हीं संवेदनशील झीलों की वास्विक स्थिति को जानने के लिए 8 सितंबर से विशेषज्ञों की एक टीम ग्राउंड जीरो पर जाएगी. फिलहाल टीम का सबसे ज्यादा फोकस पांच अति संवेदनशील झीलों पर रहेगा.
उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से संभावित खतरे को देखते हुए अब इनका विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन ग्राउंड जीरो पर किया जाएगा. 8 सितंबर से देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञों की टीमें संवेदनशील ग्लेशियर झीलों वाले जिलों में पहुंचकर वहां के मौजूदा हालात, संभावित खतरे और जोखिम को कम करने के उपायों का अध्ययन करेंगी.
उत्तराखंड में संवेदनशील ग्लेशियरों झीलों की स्टडी के लिए 8 सितंबर को वैज्ञानिकों की एक टीम ग्राउंड जीरो के लिए रवाना होगी. #uttarakhand #dehradun #GLOF #glacierlakes
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एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड में करीब 450 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं. इनमें से 13 झीलों को उनकी संवेदनशीलता के आधार पर A, B और C कैटेगरी में चिह्नित किया गया है. इनमें A कैटेगरी की झीलों को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया है. इन झीलों के अचानक टूटने या इनमें पानी का दबाव बढ़ने की स्थिति में निचले इलाकों में बड़े पैमाने पर नुकसान की आशंका रहती है.
नेपाल की आपदा के बाद बढ़ी चिंता: हाल ही में नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा के बाद ग्लेशियर झीलों को लेकर उत्तराखंड में भी चिंता बढ़ी है. इस तरह की आपदा में GLOF यानी Glacial Lake Outburst Flood बड़ा कारण हो सकता है. ग्लेशियर झील के प्राकृतिक बांध यानी मोरेन के टूटने या झील के अचानक फटने से बड़ी मात्रा में पानी, मलबा और बोल्डर बेहद तेज गति से नीचे की ओर आते हैं.

पर्वतीय क्षेत्रों की संकरी घाटियों में इस तरह का अचानक आने वाला पानी और मलबा कुछ ही समय में बड़ी तबाही का कारण बन सकता है. यही वजह है कि उत्तराखंड में संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

8 सितंबर से ग्राउंड जीरो पर उतरेंगी विशेषज्ञ टीमें: उत्तराखंड स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी के CEO और सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन के मुताबिक
8 सितंबर से 13 चिन्हित संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में से दो जिलों में विशेषज्ञ टीमों को भेजकर अध्ययन शुरू किया जाएगा. इस अध्ययन में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट, केंद्रीय जल आयोग (CWC), सी-डैक समेत देश के कई संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल होंगे. टीमें ग्राउंड जीरो पर जाकर झीलों की स्थिति, उनके आसपास के क्षेत्र, प्राकृतिक बांध और भविष्य में पैदा होने वाले संभावित जोखिम का अध्ययन करेंगी.
-विनोद कुमार सुमन, सचिव, आपदा-
पांच ग्लेशियर झीलें बेहद संवेदनशील: वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान देहरादून के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत के मुताबिक उत्तराखंड में चिन्हित 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों में से 5 झीलें बेहद संवेदनशील हैं. इनमें चमोली और पिथौरागढ़ जिले की झीलें प्रमुख रूप से शामिल हैं.
- A कैटेगरी में शामिल प्रमुख झीलों में वसुधारा झील, चमोली, मांबाग झील, धारचूला, स्यूंतियानकित्त झील, धारचूला, प्यूंगरू झील, धारचूला और जोशीमठ क्षेत्र की एक अनाम झील शामिल है.
- B कैटेगरी में सरस्वती ताल, चमोली और केदारताल, उत्तरकाशी को रखा गया है.
- C कैटेगरी में टिहरी, पिथौरागढ़ और बागेश्वर की कुछ ग्लेशियर झीलें शामिल हैं, जिन्हें तुलनात्मक रूप से कम संवेदनशील माना गया है.
अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी: सरकार संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करने की दिशा में भी काम कर रही है. सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन के मुताबिक NDMA की ओर से अर्ली वार्निंग सिस्टम के लिए विशेष पैकेज दिया गया है. इसके तहत ग्लेशियर झीलों की मॉनिटरिंग के लिए अत्याधुनिक संसाधन और तकनीकी सिस्टम स्थापित किए जाने पर काम चल रहा है. हालांकि, ग्लेशियर झीलों की बेहद अधिक ऊंचाई और वहां का कम तापमान अत्याधुनिक उपकरणों की स्थापना और उनके लगातार संचालन के लिहाज से बड़ी चुनौती है. ऐसे में विशेषज्ञों के अध्ययन के आधार पर यह तय किया जाएगा कि किन स्थानों पर किस तरह की तकनीक प्रभावी तरीके से इस्तेमाल की जा सकती है.
भविष्य के खतरे का आकलन भी होगा: सरकार का फोकस सिर्फ मौजूदा स्थिति का अध्ययन करने तक सीमित नहीं है. विशेषज्ञ टीमें यह भी आकलन करेंगी कि आने वाले समय में ग्लेशियर झीलों के आकार, पानी के स्तर, प्राकृतिक बांधों और आसपास के भौगोलिक बदलावों के कारण किस तरह का खतरा पैदा हो सकता है.
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्य में करीब 450 ग्लेशियर झीलों की मौजूदगी को देखते हुए सभी झीलों की लगातार निगरानी चुनौतीपूर्ण है. ऐसे में सबसे संवेदनशील 13 झीलों की प्राथमिकता के आधार पर निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन और अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने की तैयारी की जा रही है. सरकार का उद्देश्य यही है कि संभावित GLOF जैसी आपदा के खतरे को पहले ही पहचाना जा सके और निचले इलाकों में समय रहते चेतावनी पहुंचाई जा सके.
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