नोएडा श्रमिक हिंसा के बाद उत्तराखंड का बड़ा कदम, तैयार किया 'EXIT' प्लान, जानिये क्या है रणनीति
उत्तराखंड सरकार ने गैर इंजीनियरिंग उद्योगों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के साथ ही VDA देने का भी आदेश जारी किया है. रिपोर्ट- नवीन उनियाल.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : May 6, 2026 at 7:52 PM IST
देहरादून: औद्योगिक क्षेत्रों में बढ़ते श्रमिक असंतोष के बीच उत्तराखंड सरकार ने समय रहते बड़ा फैसला लेकर संभावित आंदोलन को टालने की कोशिश की है. खास बात यह है कि इस दौरान इंजीनियरिंग क्षेत्र के उद्योगों में पहली बार न्यूनतम मजदूरी पर उत्तराखंड सरकार ने फैसला लिया है. यही नहीं, गैर इंजीनियरिंग उद्योगों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के साथ ही वेरिएबल डियरनेस अलाउंस VDA का भी लाभ देने पर भी आदेश जारी किया गया है.
नोएडा श्रमिक हिंसा ने किया अलर्ट: दरअसल उत्तर प्रदेश, के नोएडा में न्यूनतम मजदूरी को लेकर हुए श्रमिक आंदोलन और उसके बाद पैदा हुई हिंसक स्थिति ने पड़ोसी राज्यों को भी सतर्क कर दिया. नोएडा में हालात इस कदर बिगड़े कि आंदोलन ने हिंसा का रूप ले लिया. आगजनी की घटनाओं ने कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी. इसी पृष्ठभूमि में उत्तराखंड सरकार ने हालात की गंभीरता को समझते हुए पहले ही कदम उठा लिया, ताकि राज्य के औद्योगिक क्षेत्रों में ऐसी स्थिति पैदा न हो.
उत्तराखंड के हरिद्वार और उधम सिंह नगर जैसे प्रमुख औद्योगिक जिलों में सिडकुल (SIDCUL) क्षेत्रों के भीतर श्रमिक असंतोष की सुगबुगाहट महसूस की जा रही थी. श्रमिक लंबे समय से न्यूनतम मजदूरी में संशोधन और महंगाई के अनुरूप वेतन बढ़ाने की मांग कर रहे थे. खास बात यह थी कि इंजीनियरिंग उद्योग में राज्य गठन के बाद से अब तक न्यूनतम मजदूरी तय ही नहीं की गई थी. जिससे इस क्षेत्र के श्रमिकों में असंतोष लगातार बढ़ रहा था.
राज्य गठन के करीब 25 वर्षों बाद भी इंजीनियरिंग क्षेत्र के श्रमिकों के लिए कोई स्पष्ट न्यूनतम मजदूरी नीति नहीं होना अपने आप में एक बड़ी खामी मानी जा रही थी. नोएडा की घटना के बाद उत्तराखंड के श्रम विभाग ने तेजी दिखाते हुए इस दिशा में निर्णायक कदम उठाया. जिसके बाद बेहद कम समय में सभी औपचारिकताएं पूरी कर नई मजदूरी दरें लागू कर दीं.

ये रही नई दरें: नए प्रावधानों के तहत इंजीनियरिंग क्षेत्र में अकुशल श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी को 13,800 रुपये निर्धारित की गई है. ये पहले 12,356 रुपये थी. वहीं अर्ध-कुशल श्रमिकों की मजदूरी को 13,590 रुपये से बढ़ाकर 15,100 रुपये कर दी गई है. इसी तरह कुशल श्रमिकों की मजदूरी 15,224 रुपये से बढ़ाकर 16,900 रुपये तय की गई है. इन बढ़ोतरी से स्पष्ट संकेत मिलता है कि सरकार ने श्रमिकों की मांगों और महंगाई के दबाव को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया है.
VDA लागू करने का बड़ा निर्णय: सरकार ने केवल न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि श्रमिकों को महंगाई से राहत देने के लिए VDA यानी वेरिएबल डियरनेस अलाउंस लागू करने का भी निर्णय लिया है. यह अलाउंस महंगाई के आधार पर समय-समय पर बढ़ता है, जिससे श्रमिकों की आय में स्थिरता बनी रहती है. इसके अलावा श्रम विभाग ने वर्ष 2024 से अब तक का VDA एरियर के रूप में देने के आदेश भी जारी किए हैं, जो श्रमिकों के लिए अतिरिक्त आर्थिक राहत लेकर आएगा.
श्रम विभाग ने दिया सकारात्मक संदेश: इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उत्तराखंड ने न्यूनतम मजदूरी के मामले में अपने पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और बिहार की तुलना में बेहतर दरें तय कर श्रमिकों को सकारात्मक संदेश दिया है. इससे न केवल श्रमिकों का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि राज्य में औद्योगिक शांति बनाए रखने में भी मदद मिलेगी. श्रम विभाग को यह भी निर्देश दिए गए हैं कि वे हर महीने श्रमिकों और उद्योग प्रबंधन के बीच संवाद सुनिश्चित करें. इसके तहत नियमित बैठकें आयोजित की जाएंगी. जिससे किसी भी प्रकार की समस्या या असंतोष को समय रहते दूर किया जा सके. यह पहल औद्योगिक संबंधों को मजबूत बनाने और विवादों को बढ़ने से पहले ही सुलझाने में मददगार साबित हो सकती है.

यह फैसला केवल तत्काल स्थिति को संभालने के लिए ही नहीं, बल्कि दीर्घकालिक औद्योगिक स्थिरता के लिहाज से भी बेहद अहम है. अक्सर देखा गया है कि मजदूरी और कामकाजी परिस्थितियों को लेकर उपजे असंतोष को नजरअंदाज करने पर वह बड़े आंदोलन का रूप ले लेता है. जिससे उद्योगों और अर्थव्यवस्था दोनों को नुकसान होता है.
फैसले से असंतुलन दूर करने की कोशिश: दिलचस्प बात यह है कि जहां सामान्य तौर पर न्यूनतम मजदूरी को लेकर हर पांच साल में पुनर्विचार का प्रावधान है. वहीं उत्तराखंड में अब तक केवल गैर-इंजीनियरिंग क्षेत्रों में ही इस प्रक्रिया को लागू किया जाता रहा. इंजीनियरिंग क्षेत्र लंबे समय तक इस दायरे से बाहर रहा, जिससे वहां के श्रमिकों में असमानता की भावना बढ़ी. अब सरकार के इस फैसले से इस असंतुलन को दूर करने की कोशिश की है.
इस पूरी प्रक्रिया को तेज गति से पूरा करना भी सरकार की सक्रियता को दर्शाता है. महज चार से पांच दिनों के भीतर कमेटी गठन, समीक्षा और अनुमोदन जैसी प्रक्रियाओं को पूरा कर नई मजदूरी दरों को लागू कर दिया गया है. अप्रैल के अंत में मुख्यमंत्री की मंजूरी मिलने के बाद इसे औपचारिक रूप दिया गया. उत्तराखंड सरकार का यह कदम एक प्री-एम्प्टिव स्ट्राइक के तौर पर देखा जा रहा है. जिसमें संभावित संकट को भांपते हुए पहले ही समाधान निकाल लिया गया.
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