'सहमति से बने रिश्ते के बाद शादी का वादा टूटा तो रेप नहीं', उत्तराखंड हाईकोर्ट ने रद्द किया मुकदमा
नैनीताल हाईकोर्ट ने कहा कि अगर लंबे समय तक सहमति से बने रिश्ते के बाद शादी का वादा तोड़ा जाता है तो यह रेप नहीं है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 25, 2026 at 8:59 PM IST
|Updated : February 25, 2026 at 9:17 PM IST
नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फौज में कार्यरत एक जवान के खिलाफ दर्ज अपहरण और दुष्कर्म के मुकदमे को रद्द कर दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्कों (एडल्ट) के बीच संबंध आपसी सहमति से बने हों, तो बाद में शादी से इनकार करना स्वतः ही दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता. न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि आपराधिक कानून का उपयोग व्यक्तिगत प्रतिशोध लेने या असफल रिश्तों के निपटारे के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
मामला पिथौरागढ़ जिले के बेरीनाग थाने का है. जहां साल 2022 में एक युवती ने एक युवक के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी. आरोप था कि युवक ने शादी का झांसा देकर युवती को उसके घर से बाहर बुलाया और एक होटल में ले जाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए. बाद में जब आरोपी ने शादी करने से इनकार कर दिया, तो युवती ने उसके खिलाफ धारा 366 (अपहरण) और 376 (दुष्कर्म) के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया था.
अदालत ने मामले के दस्तावेजों और पीड़िता के बयानों का गहन अध्ययन करने के बाद पाया कि दोनों पक्ष 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और सोशल मीडिया के माध्यम से संपर्क में थे. न्यायालय ने टिप्पणी की कि पीड़िता अपनी मर्जी से अपना घर छोड़कर आरोपी के साथ गई थी. ऐसे में अपहरण (धारा 366) का कोई भी आवश्यक तत्व यहां मौजूद नहीं था. क्योंकि युवती एक वयस्क थी और उसने अपनी मर्जी से साथ जाने का फैसला किया था.
न्यायमूर्ति आशीष नैथानी ने अपने फैसले में कहा कि शादी के वादे पर बने यौन संबंध तभी दुष्कर्म माने जा सकते हैं, जब यह साबित हो कि आरोपी की नीयत शुरू से ही धोखा देने की थी. वर्तमान मामले में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह लगे कि आरोपी ने शुरू से ही शादी न करने के इरादे से सहमति प्राप्त की थी. अदालत ने माना कि एक असफल रिश्ते और धोखाधड़ी के बीच स्पष्ट अंतर होता है.
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि 23 फरवरी 2022 की पूरक मेडिकल रिपोर्ट (सप्लीमेंट्री मेडिकल रिपोर्ट) में भी जबरन यौन शोषण या बल प्रयोग की पुष्टि नहीं हुई थी. कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के पास ऐसा कोई ठोस आधार नहीं था जो धारा 376 के तहत अपराध को प्रथम दृष्टया साबित कर सके. बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि यह दो वयस्कों के बीच एक सहमतिजन्य रिश्ता था, जिसे गलत तरीके से पेश किया गया.
उच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जहां आरोप पूरी तरह से निराधार हों, वहां आरोपी को मुकदमे की लंबी और कठिन प्रक्रिया से गुजरने के लिए मजबूर करना कानून का दुरुपयोग होगा. न्यायालय ने कहा कि धारा 482 के तहत प्राप्त अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग न्याय सुनिश्चित करने और अनावश्यक उत्पीड़न को रोकने के लिए किया जाना आवश्यक है.
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