वनाग्नि पर गलत आंकड़ों ने कराई उत्तराखंड की फजीहत, विभाग ने FSI को भेजा शिकायती पत्र
उत्तराखंड में हर साल फायर सीजन में जंगलों में आग लगती है. जिससे वन संपदा को काफी नुकसान होता है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : January 2, 2026 at 12:05 PM IST
|Updated : January 2, 2026 at 12:17 PM IST
नवीन उनियाल
देहरादून: जंगलों में आग की घटनाओं को लेकर उत्तराखंड राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहा है. इस दौरान वन विभाग को जमकर फजीहत भी झेलनी पड़ी है. इस बीच फायर सीजन से पहले महकमे ने फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (FSI) को पत्र लिखकर कुछ ऐसा खुलासा किया है, जिसने जंगलों में आग की घटनाओं से जुड़े FSI के आंकड़ों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है. जानिए क्या है पूरा मामला.
हर साल प्रदेश में धधकते हैं जंगल: फॉरेस्ट फायर सीजन आते ही राष्ट्रीय स्तर पर उत्तराखंड के जंगलों में भारी संख्या में आग की घटनाएं सामने आने की बात कही जाती हैं. लेकिन दावा ये है कि इसमें से अधिकतर घटनाएं झूठी होती हैं, या फिर वन क्षेत्र के बाहर के आंकड़ों को इसमें शामिल किया जाता है. ये दावा किसी और ने नहीं बल्कि उत्तराखंड वन विभाग के मुखिया ने किया है और इससे जुड़ा एक पत्र भारत सरकार के फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया को भी भेज दिया गया है.
फायर अलर्ट पर सवाल खड़े: दरअसल, देश भर में जंगलों में लगने वाली आग की घटनाओं के आंकड़े फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की तरफ से जारी किए जाते हैं और फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ही तमाम राज्यों को फायर अलर्ट जारी करता है, जिसके बाद वन विभाग जंगलों में आग की सूचना पर इसकी रोकथाम के लिए प्रयास शुरू करता है. लेकिन उत्तराखंड वन विभाग के दावे ने अब तक के Fire alerts पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.

आंकड़ों पर वन विभाग का बड़ा खुलासा: उत्तराखंड में सर्दी के मौसम के दौरान वनाग्नि को लेकर सामने आए आंकड़ों पर वन विभाग ने बड़ा खुलासा किया है. प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (हॉफ) कार्यालय की ओर से 31 दिसंबर 2025 को भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के महानिदेशक को भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि सर्दियों में जिन करीब 1900 वनाग्नि की घटनाओं के होने की बात कही जा रही है, वह वास्तविक वनाग्नि नहीं बल्कि सैटेलाइट आधारित हीट, फायर अलर्ट हैं, जिनमें बड़ी संख्या में झूठे या गैर-वन क्षेत्र से जुड़े अलर्ट शामिल हैं.
जंगलों में आग लगने की घटनाओं को लेकर वन विभाग लगातार प्रयास करता है. इस बार भी यह कोशिश की जा रही है कि आम लोगों के साथ मिलकर ऐसी घटनाओं पर काबू पाने की कोशिश की जाए.
- रंजन कुमार मिश्रा, प्रमुख वन संरक्षक हॉफ, उत्तराखंड वन विभाग -
मैदानी स्तर पर सत्यापन नहीं हो पाता: वन विभाग के अनुसार एफएसआई (भारतीय वन सर्वेक्षण) द्वारा जारी किए गए अलर्ट प्रारंभिक संकेतक होते हैं. इनमें वन क्षेत्रों के अलावा गैर-वन क्षेत्रों में कृषि अवशेष जलाना, कचरा डंपिंग स्थलों में आग, कंट्रोल फायर (फायर ड्रिल) और अन्य गतिविधियों से उत्पन्न गर्मी के संकेत भी शामिल रहते हैं. जब तक इन अलर्ट का मैदानी स्तर पर सत्यापन नहीं हो जाता, तब तक इन्हें वास्तविक वनाग्नि की घटना नहीं माना जा सकता.

वास्तविक वनाग्नि से जुड़े मामले: पत्र में 1 नवंबर 2025 से 28 दिसंबर 2025 तक प्राप्त अलर्ट का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है. इस अवधि में कुल 1050 अलर्ट प्राप्त हुए, जिनका वन विभाग के मैदानी अमले द्वारा ग्राउंड ट्रूथिंग के जरिए सत्यापन किया गया. सत्यापन के बाद सामने आया कि इनमें से 377 अलर्ट पूरी तरह झूठे थे, 130 नियंत्रित आग जलाने या फायर ड्रिल से जुड़े थे, जबकि 479 अलर्ट कृषि अवशेष या गैर-वन क्षेत्रों में आग से संबंधित पाए गए. कुल मिलाकर केवल 64 अलर्ट ही वास्तविक वनाग्नि से जुड़े पाए गए, जो कुल अलर्ट का लगभग 6 प्रतिशत है.

एक ही घटना से जुड़े हुए आते हैं कई अलर्ट: क्षेत्रवार आंकड़ों के अनुसार, गढ़वाल मंडल में 721 अलर्ट में से 55 वास्तविक वनाग्नि से जुड़े पाए गए, कुमाऊं मंडल में 230 अलर्ट में से सिर्फ 2, जबकि वन्यजीव क्षेत्रों में 99 अलर्ट में से 7 ही वास्तविक आग की घटनाएं थीं. विभाग ने यह भी स्पष्ट किया कि कई बार एक ही घटना से जुड़े कई अलर्ट आ जाते हैं, जिससे संख्या बढ़ी हुई दिखाई देती है.

साल 2024 में भी इसी तरह के रिकॉर्ड सामने आए थे. पिछली बार जंगलों में आग लगने का जो आंकड़ा सामने आया था उसमें से केवल 9% घटनाएं ही सही पाई गई थी, जबकि 52% आग लगने की घटनाओं की सूचना झूठी निकली. इसी तरह फायर अलर्ट में 5% घटनाएं फायर ड्रिल से जुड़ी थी, और 4% अलर्ट तो ऐसे थे जो कंट्रोल फायर से जुड़े थे यानी आज की घटनाओं को रोकने के लिए खुद वन विभाग द्वारा लगाई गई कंट्रोल फायर को भी आग लगने के आंकड़ों में जोड़ा गया था.
- सुबोध उनियाल, वन मंत्री उत्तराखंड -
अनावश्यक भ्रम से बचाव: वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि वन विभाग ने एफएसआई से आग्रह किया है कि अपनी वेबसाइट पर Forest Fire Alerts के स्थान पर Heat Alerts शब्दावली का उपयोग किया जाए, ताकि डेटा की गलत व्याख्या और अनावश्यक भ्रम से बचा जा सके. साथ ही सुझाव दिया गया है कि मैदानी सत्यापन के बाद के आंकड़ों को मासिक आधार पर सार्वजनिक किया जाए, जिससे आधिकारिक संचार और जनसूचना में पारदर्शिता बनी रहे.
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