UPSC CSE 2025: ओबीसी क्रीमी लेयर नियमों पर केंद्र की याचिका पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने सभी पक्षों से 17 सितंबर तक अपने-अपने जवाब दाखिल करने को कहा है. जानिए क्या है पूरा विवाद.


By Sumit Saxena
Published : September 1, 2026 at 9:20 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार की उस याचिका पर विचार करने के लिए सहमति दे दी है, जिसमें सिविल सेवा परीक्षा 2025 के उम्मीदवारों पर ओबीसी क्रीमी-लेयर नियमों से जुड़े 11 मार्च के फैसले को लागू करने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा गया है. इस मामले की सुनवाई जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने की.
कोर्ट ने सभी पक्षों से 17 सितंबर तक अपने-अपने जवाब दाखिल करने को कहा है. अदालत में केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा. वहीं, इस मामले के मूल याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े और पी विल्सन ने कहा कि उन्हें केंद्र की इस याचिका के कानूनी रूप से टिकने पर शुरुआती आपत्ति है.
तुषार मेहता ने दलील दी कि 11 मार्च के फैसले को इसी साल लागू करने में कई व्यावहारिक मुश्किलें आ रही हैं. उम्मीदवार अपनी पोस्टिंग का इंतजार कर रहे हैं और इस फैसले से वे प्रभावित होंगे. दूसरी तरफ, संजय हेगड़े ने तर्क दिया कि केंद्र ने फैसले को साफ करने के लिए एक 'विविध आवेदन' दायर किया है, न कि कोई समीक्षा याचिका.
तुषार मेहता ने दलील दी कि उनके पक्ष में कई अदालती फैसले हैं और अगर विपक्षी दल इस याचिका के टिकने (maintainability) पर सवाल उठाते हैं, तो वे इसका जवाब दे सकते हैं.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, बेंच ने कहा कि वह इस मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को करेगी. बेंच ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता उस दिन इस याचिका के कानूनी रूप से टिकने के मुद्दे को उठा सकते हैं. पिछले महीने, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह 11 मार्च के फैसले को लागू करने के बारे में केंद्र की स्पष्टीकरण याचिका पर सुनवाई के लिए एक विशेष बेंच का गठन करेगा.
कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने अदालत से निर्देश मांगा है कि सरकार को सिविल सेवा परीक्षा-2025 के लिए संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा चुने गए 958 उम्मीदवारों को पद आवंटित करने की अनुमति दी जाए. विभाग चाहता है कि यह आवंटन 11 मार्च के फैसले से पहले लागू ओबीसी क्रीमी-लेयर नियमों के आधार पर ही किया जाए.
DoPT की यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन' मामले में दिए गए फैसले से जुड़ी है. इस मामले में कोर्ट ने 11 मार्च को कहा था कि 14 अक्टूबर 2004 का स्पष्टीकरण पत्र, ओबीसी क्रीमी लेयर की पहचान करने वाले 8 सितंबर 1993 के मुख्य सरकारी आदेश को बदल या खारिज नहीं कर सकता.
मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत आरक्षण के लिए 'क्रीमी लेयर' का दर्जा तय करना केवल माता-पिता की कमाई पर निर्भर नहीं हो सकता. इसके लिए माता-पिता अपने संगठनों में किस पद और स्थिति पर काम कर रहे हैं, इसे भी ध्यान में रखना होगा.
ऐतिहासिक इंद्रा साहनी फैसले के बाद जारी किए गए 1993 के इस सरकारी आदेश में यह व्यवस्था दी गई थी कि ओबीसी श्रेणी के भीतर कुछ सामाजिक रूप से संपन्न वर्गों को आरक्षण के लाभ से बाहर रखा जाएगा. इसका मुख्य आधार यह था कि उनके माता-पिता किस पद पर काम कर रहे हैं.
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा- "1993 के सरकारी आदेश में बताए गए पदों और ओहदों को ध्यान में रखे बिना, केवल कमाई के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानूनी रूप से पूरी तरह से गलत है."
यह पूरा विवाद केंद्र सरकार के 8 सितंबर 1993 के आदेश- जिसमें ओबीसी के बीच "क्रीमी लेयर" की पहचान करने के नियम तय किए गए थे- और उसके बाद 14 अक्टूबर 2004 को जारी किए गए एक स्पष्टीकरण पत्र के बीच था. बेंच ने कहा कि ऐसी व्याख्या को अपनाना जो बिना किसी तार्किक कारण के एक ही पिछड़े वर्ग के किसी एक हिस्से को नुकसान पहुंचाती हो, बराबर लोगों के साथ असमान व्यवहार करने जैसा होगा. यह हमारे गणतंत्र की नींव यानी 'समानता के अधिकार' के बिल्कुल खिलाफ होगा.
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