बिहार का ऐसा गांव.. जहां लाखों चमगादड़ों का बसेरा, कभी नहीं छोड़ते अपना घर, जानें रहस्य
बिहार में एक ऐसा गांव है, जहां चमगादड़ों की तादाद देखकर दंग रह जाएंगे. इनकी पूजा होती है और ये कभी भी गांव नहीं छोड़ते.

Published : December 3, 2025 at 5:51 PM IST
रिपोर्ट: विवेक कुमार
वैशाली: बिहार की राजधानी पटना से करीब 40 किलोमीटर दूर वैशाली जिले में एक ऐसा गांव है जहां चमगादड़ों की अद्भुत दुनिया बसती है. यहां के पेड़ों में लाखों चमगादड़ों का बसेरा है और ग्रामीण इनकी पूजा और रक्षा करते हैं. क्या है इसके पीछे की पौराणिक मान्यता विस्तार से जानें.
सरसई गांव में चमगादड़ों का बसेरा: जिला मुख्यालय हाजीपुर से लगभग 15 किलोमीटर दूर राजापाकर प्रखंड का सरसई गांव आज चमगादड़ों की संख्या को लेकर पूरे प्रदेश में ही नहीं बल्कि देशभर में जाना जाता है. इतना ही नहीं विदेशों से भी अगर कोई बिहार घूमने आता है तो सरसई गांव जरूर जाता है.
गांव में यहां रहते हैं चमगादड़: सरसई गांव के केंद्र में स्थित 52 बीघा का विशाल तालाब यहां की पहचान है. तालाब के चारों ओर बड़े-बड़े पुराने वृक्ष खड़े हैं, जिन पर यह चमगादड़ वर्षों से बसे हुए हैं. ग्रामीण बताते हैं कि पेड़ों पर लगे फलों में से नीचे गिरे फलों को लोग उठा लेते हैं, लेकिन ऊपर लगे फलों को चमगादड़ों के लिए छोड़ दिया जाता है.

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि चमगादड़ गांव की रक्षा करते हैं और किसी भी अनहोनी या प्राकृतिक आपदा से पहले अपने असामान्य व्यवहार से लोगों को सचेत कर देते हैं. जिसके बाद लोग हथियारों के साथ परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार हो जाते हैं.

सरोवर के किनारे लगे पीपल, बरगद, सिमल, कदम और जामुन के पेड़ों पर इन लाखों चमगादड़ों का निवास है. ग्रामीणों का कहना है कि चमगादड़ों के कारण बरसों से उनके गांव में कोई चोरी-डकैती की घटना नहीं हुई.गांव के अंदर अगर कोई गलत इरादे से रात को प्रवेश करने की कोशिश करता है तो ये चमगादड़ अपनी आवाज से पूरे गांव को सचेत कर देते हैं.
पूजे जाते हैं बादुर: गांव में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ या मांगलिक अवसर पर चमगादड़ों (बादुर) की पूजा की जाती है. ग्रामीण मानते हैं कि इनका आशीर्वाद घर-आंगन में सुख-समृद्धि बनाए रखता है. 25 वर्षों से चमगादड़ों के इस बसेरे को देख रहे बलिंद्र ठाकुर बताते हैं कि एक जगह पांच हजार से अधिक चमगादड़ रहते हैं. पहले ये तालाब के पास होते थे, लेकिन अब पूरे गांव में फैल चुके हैं.

"इनको कोई मार नहीं सकता है. गांव में यह शुभ माने जाते हैं. यदि कोई नुकसान पहुंचाए तो ग्रामीण खुद उस पर जुर्माना लगाते हैं. ग्रामीणों में यह भी मान्यता है कि चमगादड़ को खाने से दमा जैसी बीमारियां ठीक होती हैं, हालांकि गांव में कोई इनका शिकार नहीं करता है."- बलिंद्र ठाकुर, ग्रामीण, सरसई गांव, वैशाली

क्या है पौराणिक मान्यता?: इतना ही नहीं प्रहरी मानकर ग्रामीण चमगादड़ों की पूजा करते हैं. उनके लिए पेड़ों पर फलों को छोड़ दिया जाता है, ताकि उनका पेट भर सके. साथ ही सरोवर का पानी सूखने पर छतों पर पानी की वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है. 60 वर्षीय रामकरण शाह गांव की पौराणिक कथा बताते हैं. उनके अनुसार लगभग 500 साल पहले एक दानव ने एक ही रात में इस तालाब की खुदाई की थी. तभी से तालाब किनारे लगे पेड़ों पर चमगादड़ों का बसेरा है.

"चमगादड़ गांव को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते हैं. 2019 में तालाब के पास विशाल शिव मंदिर का निर्माण हुआ, जिसके बाद यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ गई है. विदेशों से भी लोग चमगादड़ और मंदिर के दर्शन करने आते हैं."- रामकरण शाह, ग्रामीण सरसई गांव, वैशाली

वहीं कुछ ग्रामीणों का ये भी कहना है कि सरसई गांव में जिस तालाब के किनारे पेड़ों पर इन चमगादड़ों का बसेरा है, उस तालाब का निर्माण 1402 में राजा शिव सिंह ने करवाया था. अब यहां शिव मंदिर है. मंदिर, तालाब और चमगादड़ों को देखकर मन खुश हो जाता है. हमारे लिए ये अशुभ संकेत नहीं बल्कि शुभ का परिचायक बन चुके हैं.

फलाहार करते हैं चमगादड़: ग्रामीण शंभू चौरसिया बताते हैं कि चमगादड़ यहां कब से हैं, इसका सटीक इतिहास किसी को मालूम नहीं है, लेकिन लोग इसे शुभ मानते हैं. किसी को बीमारी हो जाए तो पेड़ के पास जाकर पूजा करते हैं. ये मांसाहारी नहीं, पूरी तरह फलाहारी हैं.

"शाम को भोजन के लिए उड़ जाते हैं और सुबह लौट आते हैं. कोविड काल में गांव के आसपास किसी भी व्यक्ति पर इसका असर नहीं देखा गया, इससे ग्रामीणों की आस्था और मजबूत हुई है."- शंभू चौरसिया, ग्रामीण सरसई गांव, वैशाली
पुजारी ने बतायी पुराना इतिहास: रामनाथ महादेव प्राचीन शिव मंदिर के महंत शंभू नाथ शर्मा बताते हैं कि तालाब के पास कभी औषधीय पौधों की खेती होती थी. उसी समय से चमगादड़ों की उपस्थिति बनी हुई है. गांव के लोग न सिर्फ इन्हें सम्मान देते हैं, बल्कि इनकी सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी भी मानते हैं.

"सरसई गांव आज इस बात का जीवंत उदाहरण है कि प्रकृति और आस्था जब मिलती हैं, तो पर्यावरण संरक्षण अपने आप परंपरा बन जाती है. यहां के चमगादड़ सिर्फ जीव नहीं, बल्कि ग्रामीणों के विश्वास, संस्कृति और आस्था की विरासत हैं."- शंभू नाथ शर्मा, रामनाथ महादेव प्राचीन शिव मंदिर के महंत

क्या है रेबीज और कैसे होता है संक्रमण? : रेबीज एक ऐसी बीमारी है, जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करती है. यह संक्रमित जानवर की लार से, या फिर खरोंचने व काटने से फैलती है. यह मृत्यु का कारण भी बन सकता है. लेकिन आप अगर रेबीज के संक्रमित होते है तो तुरंत इलाज से बचा सकता है.
"सावधानी से ही रेबीज से बचाव किया जा सकता है. रेबीज एक ऐसा वायरस होता है जो आमतौर पर जानवरों के काटने से फैलता है. यह एक जानलेवा बीमारी है. इसका लक्षण दिखने में काफी समय लग जाता है. इस कारण यह ज्यादा खतरनाक होता है. समय रहते अगर लोग इसके प्रति सतर्क हो जाएं तो काफी हद तक इससे बचा जा सकता है." - डॉक्टर राज कुमार, एपिडेमियोलॉजिस्ट

मौतों में कमी कैसे मुमकिन हुई? : केन्द्र सरकार ने राज्यों के सहयोग से 'वन हेल्थ' मुहिम के तहत 2030 तक देश को रेबीज से मुक्त करने का लक्ष्य तय किया है. रेबीज से होने वाली मौतों के लिए कई कारण हैं, जिनमें जागरूकता अभियान, समय पर टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षण शामिल है. सरकार ने भले ही इसे 2030 तक जड़ से खत्म करने का दावा किया है. लेकिन बिहार के ग्रामीण इलाकों में जहां मेडिकल सुविधाएं सीमित हैं, वहां तत्काल उपचार अब भी एक चुनौती है.
रेबीज से बिहार में कितनी मौतें?: आईडीएसपी/आईएचआईपी के मुताबिक 2022 (जनवरी-दिसंबर) में रेबीज से 1 मौत हुई थी. वहीं 2023 (जनवरी-दिसंबर) में 3 मौत, 2024 (जनवरी-दिसंबर) में 2 मौत और 2025 (जनवरी) तक एक भी मौत नहीं हुई है.

केन्द्र सरकार की वन हेल्थ मुहिम क्या है? : भारत सरकार की 'वन हेल्थ' मुहिम, जिसमें मनुष्य, जानवर और पर्यावरण तीनों के बीच संतुलन बनाकर काम किया जा रहा है. क्योंकि सरकार का मानना है कि ये तीनों एक दूसरे पर निर्भर हैं.
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