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UGC के 'काले कानून' पर क्यों मचा इतना बवाल; क्या वाकई जनरल स्टूडेंट के साथ भेदभाव कर रहे नए नियम?

सरकारी-प्राइवेट कॉलेजों में भेदभाव के खात्मे के लिए गाइड लाइन जारी, पालन न करने पर शिक्षण संस्थानों पर होगी कार्रवाई.

UGC के नए नियमों के विरोध के पीछे की क्या है कहानी.
UGC के नए नियमों के विरोध के पीछे की क्या है कहानी. (Photo Credit; ETV Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : January 29, 2026 at 9:53 AM IST

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हैदराबाद : यूजीसी ने 13 जनवरी को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के मकसद से नई गाइड लाइन जारी की. इसके बाद से इसके विरोध में आवाजें उठ रहीं हैं. हालांकि कुछ सियासी दल इसके पक्ष में भी खड़े हैं. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नोटिफिकेशन के मुताबिक सभी प्राइवेट और सरकारी कॉलेजों को इक्विटी कमेटी (समता समिति) बनानी होगी.

कमेटी में ओबीसी, दिव्यांग, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं का प्रतिनिधित्व होगा. ये कमेटी भेदभाव के शिकार छात्र-छात्राओं के शिकायतों की जांच करेगी. विरोध करने वालों की दलील ये है कि ये कमेटी सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों के खिलाफ बड़ी साजिश है. उन्हें झूठे आरोपों में फंसाया जा सकता है. इसका इफेक्ट उनके करियर पर पड़ेगा.

नए नियम के विरोध में देश के विभिन्न राज्यों के अलग-अलग शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं. केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भी बयान दे चुके हैं कि 'किसी के साथ अन्याय नहीं होने देंगे.'

क्या है University Grants Commission (UGC) का नया नियम?, क्या यह वाकई में सामान्य वर्ग के स्टूडेंट को परेशान करने वाला फैसला है?, कहां से शुरू हुआ विरोध?. ईटीवी भारत के इस Analysis में प्वाइंट वाइज इन सभी सवालों के जवाब जानेंगे.

सबसे पहले 9 प्वाइंट में जानिए क्या है यूजीसी की नई गाइड लाइन?

1-देश के सभी निजी-सरकारी कॉलेज-यूनिवर्सिटी में समान अवसर केंद्र बनाना होगा. इस केंद्र का एक इक्विटी स्क्वाड भी होगा. ये कैंपस में होने वाली गतिविधियों पर नजर रखेगा. केंद्र में भेदभाव के शिकार स्टूडेंट अपनी शिकायत कर सकेंगे. सेल इस पर तुरंत एक्शन लेगा. इस समिति में ओबीसी, दिव्यांग, अनुसूचित जाति, जनजाति और महिलाओं समेत कम से कम 5 सदस्य शामिल किए जाएंगे.

2-अगर किसी संस्थान में समान अवसर केंद्र के लिए सदस्यों की संख्या पूरी नहीं हो पाती है तो ऐसी स्थिति में ये कार्य संबंधित विश्वविद्यालय के समान अवसर केंद्र की ओर से किए जाएंगे.

3-इक्विटी स्क्वाड समाज के लोगों, स्थानीय मीडिया, पुलिस, जिला प्रशासन, गैर सरकारी संगठनों, शिक्षकों, कर्मचारियों और अभिभावकों से तालमेल बैठाएगा.

4-समान अवसर केंद्र शिकायतों के समाधान के लिए जिला और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण से भी समन्वय बनाए रखेगा, जिससे पीड़ितों को कानूनी सहायता मुहैया कराई जा सके.

5-समान अवसर केंद्र का समन्वयक किसी स्थायी प्रोफेसर या किसी सीनियर फैकल्ची मेंबर को बनाया जा सकता है. इसी केंद्र में एक समता समिति भी होगी. इसका गठन संस्थान के प्रमुख करेंगे.

6-समता समिति में एक अध्यक्ष होंगे. संस्थान के 3 प्रोफेसर या सीनियर फैकल्टी मेंबर सदस्य के रूप में शामिल किए जाएंगे. एक कर्मचारी को भी सदस्य बनने का मौका मिलेगा. समाज के अलावा छात्रों के भी 2-2 प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे.

7-समिति में अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाएं शामिल की जाएंगी. इसमें शामिल सदस्यों का कार्यकाल 2 साल का होगा. जबकि आमंत्रित सदस्यों का कार्यकाल एक साल रहेगा.

8-साल में कम से कम 2 बार समता समिति की बैठक होगी. यह 6-6 महीने के अंतराल पर होगी. इसमें शिकायतों पर हुई कार्रवाई की समीक्षा की जाएगी.

9-हर विभाग, हॉस्टल, पुस्तकालय और अन्य इकाइयों में समता दूत या 'इक्विटी एंबेसडर रखे जाएंगे. ये किसी भी तरह से नियम का उल्लंघन होने पर उसकी रिपोर्ट देंगे.

कैंपस में भेदभाव खत्म करने के लिए काम करेगी कमेटी.
कैंपस में भेदभाव खत्म करने के लिए काम करेगी कमेटी. (Graphics Credit; ETV Bharat)

शिकायत मिलने के बाद क्या करेगी समता समिति? : किसी छात्र या कर्मी की ओर से शिकायत मिलने पर समता समिति कार्रवाई के लिए प्रयास शुरू कर देगी. 24 घंटे के अंदर ही समिति की बैठक होगी. समिति 15 दिन के अंदर अपनी रिपोर्ट संस्थान के प्रमुख को देगी. इसकी एक कॉपी पीड़ित को भी दी जाएगी.

इसके बाद संस्थान के प्रमुख 7 दिनों के अंदर अपनी कार्रवाई शुरू कर देंगे. अगर किसी मामले में कानूनी कार्रवाई कराने की नौबत आती है तो वह पुलिस विभाग के अफसरों को इसकी जानकारी देंगे.

कुछ ऐसे केस जिनमें संस्थान के प्रमुख के खिलाफ शिकायत आती है तो ऐसी स्थिति में समता समिति की बैठक की अध्यक्षता समान अवसर केंद्र के समन्वयक करेंगे.

यहां कर सकेंगे अपील : यूजीसी की नई गाइड लाइन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि समिति की जांच से असंतुष्ट लोग रिपोर्ट की कॉपी मिलने के 30 दिनों के अंदर लोकपाल के समक्ष अपील कर सकेंगे. लोकपाल एमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) नियुक्त कर सकते हैं. लोकपाल न्याय मित्र को उच्च शिक्षा संस्थान की ओर से शुल्क मुहैया कराएंगे. लोकपाल 30 दिन के अंदर अपील के निपटारे के लिए प्रयास करेंगे.

शिकायत पर 24 घंटे के अंदर होगी कार्रवाई.
शिकायत पर 24 घंटे के अंदर होगी कार्रवाई. (Graphics Credit; ETV Bharat)

नई गाइड लाइन की क्यों पड़ी जरूरत? : सरकारी और प्राइवेट कॉलेजों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के साथ धर्म, नस्ल, जाति, दिव्यांगता और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव की शिकायतें आती रहीं हैं. ऐसे लोगों को यूजीसी की नई गाइड लाइन से सहूलियत मिलेगी. वे अपने खिलाफ हो रहे अन्याय की शिकायत कर सकेंगे. इसका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में पढ़ने और वहां काम करने वालों को समान अवसर उपलब्ध कराना है. चाहे वे किसी भी जाति-धर्म के हों.

मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल की डॉक्टर पायल तड़वी ने साल 2019 में सुसाइड कर लिया था. मामले में 3 सीनियर डॉक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था. परिजनों ने आरोप लगाया था कि साथी डॉक्टर उसकी रैगिंग करते थे. पायल अनुसूचित जनजाति की थी, उस पर जातिसूचक टिप्पणियां करते थे. यह मामला काफी दिनों तक सुर्खियों में रहा था.

यूजीसी के विरोध में बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने दिया इस्तीफा.
यूजीसी के विरोध में बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने दिया इस्तीफा. (Graphics Credit; ETV Bharat)

क्यों हो रहा नई गाइड लाइन का विरोध? : यूजीसी की नई गाइड लाइन का विरोध करने वालों का मानना है कि जो छात्र SC, ST या OBC की सूची में शामिल नहीं हैं, उनके खिलाफ शिकायत आएगी. ऐसे स्टूडेंट में ब्राह्मण, ठाकुर समेत कई जातियां आती हैं. मान लिया गया है कि ऐसी जातियों के स्टूडेंट ही भेदभाव के दोषी होते हैं. पुरानी गाइड लाइन में गलत शिकायत पर कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था, लेकिन नई में इसे हटा दिया गया है. इसके अलावा समिति में जनरल कैटेगरी का प्रतिनिधित्व अनिवार्य नहीं किया गया है.

ये नेता भी हुए नए कानून के खिलाफ : शिवसेना (उद्धव गुट) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने नई गाइड लाइन का विरोध किया. उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर लिखा है कि 'इस गाइड लाइन में एक जजमेंट है. एक वर्ग को शोषित और दूसरे वर्ग को शोषक बताया जा रहा है. यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है'.उन्होंने नई गाइड लाइन को वापस लेने या इसमें संशोधन की मांग की है.

उन्होंने भेदभाव के परिभाषित करने के विकल्पों पर सवाल उठाए हैं. वहीं उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भी प्रतिक्रिया दी. कहा कि बीजेपी सत्ता में बने रहने के लिए फूट डाल रही है. वहीं बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के बाद इस मामले ने और भी तूल पकड़ लिया. वहीं कवि कुमार विश्वास ने अलग अंदाज में इसका विरोध किया. सबसे पहले नई दिल्ली और यूपी के कई शहरों में रोष देखने को मिला.

कुमार विश्वास ने भी ट्वीट कर जताया विरोध.
कुमार विश्वास ने भी ट्वीट कर जताया विरोध. (Graphics Credit; ETV Bharat)

क्या गाइड लाइन का समर्थन भी हो रहा? : आजाद समाज पार्टी के नेता और सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी. एक्स पर उन्होंने लिखा है कि इस कानून का भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) पूर्ण समर्थन करती है.

वहीं भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लिखा है कि 'संविधान का आर्टिकल 14 इस देश में जाति, वर्ग, वर्ण, धर्म या संप्रदाय के किसी भी भेदभाव के खिलाफ है. UGC का यह नियम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग के साथ-साथ सवर्णों पर भी समान रूप ले लागू होगा'.

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने राजस्थान में मीडिया से बातचीत में इसे लेकर स्थिति साफ की. कहा कि किसी का उत्पीड़न नहीं होने दिया जाएगा. ऐसा मैं आश्वासन देता हूं. नए कानून का दुरुपयोग किसी को भी नहीं करने दिया जाएगा. इसकी जिम्मेदारी यूजीसी, भारत सरकार, राज्य सरकार की है.

शिक्षण संस्थानों को करने होंगे ये काम : नए नियम के मुताबिक कॉलेज में प्रवेश के समय छात्र-शिक्षक और कर्मचारियों को एक घोषणा पत्र देना होगा. इसमें बताना होगा कि वे किसी भी तरह से भेदभाव वाली गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे. संस्थान को कैंपस में जागरूकता अभियान चलाना होगा. समानता को बढ़ावा देने के लिए कार्यशाला भी करानी होगी. छात्रों की मदद के लिए काउंसलर भी उपलब्ध रहेंगे.

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला : मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यूजीसी के नए नियम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. जनहित याचिका के जरिए सामान्य वर्ग के लोगों के साथ भेदभाव न होने देने की बात कही गई है. यह भी लिखा गया है कि नए नियम चुनिंदा वर्गों को ही संरक्षण प्रदान कर रहे हैं. यह भी कहा गया है कि वे दूसरे वर्गों के छात्रों को संरक्षण देने का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि सामान्य वर्ग के हक की बात कर रहे हैं.

गाइड लाइन लागू न करने पर क्या होगा? : यदि कोई शिक्षण संस्थान यूजीसी की इस गाइड लाइन का पालन नहीं करता है तो उसे कई तरह की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. उसे यूजीसी की किसी योजना में शामिल नहीं किया जाएगा. डिग्री कार्यक्रम चलाने पर रोक लगा दी जाएगी. दूरस्थ शिक्षा (distance education) पर बैन रहेगा. उच्च शिक्षा संस्थानों की सूची से भी हटा दिया जाएगा.

क्या है यूजीसी : यूजीसी (UGC) का पूरा नाम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission) है. यह देश के शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक वैधानिक निकाय (Statutory Body) है. इसका मुख्य कार्य देश भर के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में उच्च शिक्षा के स्तर को बनाए रखना और उन्हें नियंत्रित करना है. यह योग्य यूनिवर्सिटीज और कॉलेजों को ग्रांट उपलब्ध कराता है.

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