झारखंड में 'लाल' अध्याय के 25 साल, अब हटने को है आतंक का काला साया!
वक्त के थपेड़ों और 'लाल' आतंक के झंझावतों से लड़कर बड़ा हुआ और खड़ा हुआ 25 साल का युवा झारखंड.

Published : November 8, 2025 at 4:56 AM IST
प्रशांत कुमार सिंह की रिपोर्ट
रांचीः साल 2000, 15 नवंबर को भारत के मानचित्र पर एक नये राज्य का उदय हुआ. बिहार से अलग होकर अपना अलग राज्य पाने की खुशी तो काफी रही. इसके साथ-साथ पुराने घाव भी झारखंड के हिस्से में आ गये. इस विरासत में सबसे बड़ा और गहरा जख्म नक्सलवाद का था.
लेकिन 25 साल की मेहनत और अथक प्रयास का ही नतीजा है कि 16 नक्सल प्रभावित राज्य झारखंड आज लगभग हर जिले से नक्सलवाद का खात्मा हो चला है. गृह मंत्रालय के अनुसार, मात्र चाईबासा अति नक्सल प्रभावित है. इसके अलावा कम या सेमी नक्सल इलाकों में लातेहार, गुमला और लोहरदगा जिला है.
झारखंड में नक्सलवाद की लौ आहिस्ता-आहिस्ता मध्यम होते जा रही है. पश्चिमी सिंहभूम जिला का सारंडा ही एक मात्र ऐसी जगह है जहां बड़ी संख्या में नक्सली मौजूद हैं. झारखंड पुलिस की आक्रमक रणनीति की वजह से पिछले चार साल के दौरान झारखंड पुलिस ने माओवादियों को हर मोर्चे पर शिकस्त दी है.

खासकर साल 2025 झारखंड पुलिस के लिए नक्सल फ्रंट पर बेहद कामयाब रहा है. इस वर्ष अब तक 34 नक्सलियों को एनकाउंटर में मार गिराया गया है. वहीं पिछले चार साल में बूढ़ा पहाड़, लुगु पहाड़ी, पारसनाथ और बुलबुल जैसे घोर नक्सल प्रभावित इलाके से नक्सलियों को खदेड़ दिया गया. वहीं साल 2025 में झारखंड पुलिस के जवानों ने अदम्य साहस दिखाते हुए अब तक 370 नक्सलियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया है. जबकि 34 को इनकाउंटर में मार गिराया, वहीं पुलिस के अभियान से घबराकर 30 नक्सलियों ने हथियार डाल दिए.

हर वर्ष नई सफलता
आज से 25 साल पहले जब झारखंड का निर्माण हुआ था उस समय परिस्थिति बिल्कुल उलट थी. साल 2000 से लेकर 2017 तक नक्सलियों ने झारखंड के सीने पर कई गहरे जख्म दिए. लेकिन 2018 के बाद साल 2025 तक झारखंड पुलिस ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. हर साल नए कीर्तिमान स्थापित करते हुए झारखंड पुलिस ने नक्सलियों के सभी बड़े ठिकानों को ध्वस्त करते हुए या तो नक्सलियों को मार गिराया या फिर वहां से उन्हें खदेड़ दिया. झारखंड ऐसा राज्य है जहां 25 साल में 10 हजार से ज्यादा नक्सलियों को सलाखों के पीछे पहुंचाया. यहां एक करोड़ का इनामी नक्सलियों का एनकाउंटर भी हुआ और गिरफ्तार भी हुए.
झारखंड पुलिस ने चुकायी नक्सलवाद की बड़ी कीमत
झारखंड में नक्सलवाद की जड़ें खोखली हो चली हैं लेकिन नक्सलवाद की जड़ें खोखली करने के दौरान झारखंड पुलिस को इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी है. अपनी जान देकर झारखंड और केंद्रीय बलों के अधिकारियों और जवानों ने झारखंड को नक्सल मुक्त करने की राह पर खड़ा कर दिया है.

दरअसल झारखंड को अपने गठन के साथ विरासत में नक्सलवाद मिला. जिस समय राज्य बना यानी साल 2000 में, इसके आठ जिले नक्सल प्रभावित थे लेकिन जल्द ही ये आंकड़ा दोगुना से भी अधिक हो गया. इसका नतीजा ये रहा कि नये राज्य में नक्सली वारदातें बढ़ीं और इसका सीधा नुकसान झारखंड पुलिस को उठाना पड़ा. झारखंड गठन के इन 25 साल में 562 (सेंट्रल और राज्य मिलाकर) से अधिक जवानों और अधिकारियों ने अपने प्राणों की आहूति दी है. वहीं नक्सलवाद की सबसे बड़ी कीमत झारखंड के आम नागरिकों को जान देकर चुकानी पड़ी है. 25 साल में 1 हजार 925 आम नागरिक नक्सल हिंसा में अपनी जान गवां चुके हैं.
565 पुलिसकर्मी और 1925 आमलोग हुए नक्सल हिंसा के शिकार
झारखंड गठन के बाद नक्सली वारदातों में 565 से ज्यादा पुलिसकर्मी वहीं 1925 आमलोग मारे गए हैं. वहीं, झारखंड पुलिस ने साल 2000-25 के बीच 235 नक्सलियों को भी मुठभेड़ों में मार गिराया है. भाकपा माओवादियों के हुए बड़े हमलों में पाकुड़ के एसपी अमरजीत बलिहार, डीएसपी स्तर के अधिकारी डीएसपी प्रमोद कुमार रांची के बुंडू में, पलामू में देवेंद्र राय, चतरा में विनय भारती तक को नक्सलियों ने अपना निशाना बनाया. झारखंड गठन के ठीक एक वर्ष पहले लोहरदगा एसपी रहे अजय कुमार सिंह भी नक्सली हमले में शहीद हो गए थे.

2002 में सबसे ज्यादा 69 पुलिस वाले हुए शहीद
नक्सलियों ने झारखंड पुलिस को बड़े गहरे जख्म दिए हैं. नक्सलियों के खिलाफ अभियान में शामिल पुलिस और सुरक्षा बलों के जवानों के अलावा आम नागरिक भी नक्सली हिंसा के शिकार हुए हैं. इन 25 वर्षों में साल 2002 में सबसे ज्यादा 69 पुलिस के जवान विभिन्न नक्सली घटनाओं में शहीद हुए. इसके बाद पुलिस की सख्ती के कारण इन आंकड़ों में लगातार कमी आई.
नक्सल हिंसा में मारे गए 1925 आम नागरिक
नक्सलवाद का दंश सबसे ज्यादा झारखंड के आम लोगों को भुगतना पड़ा है. 2001 से लेकर 2025 के अक्टूबर महीने तक नक्सली हिंसा में कुल 1925 आम लोग अपनी जान गवां चुके हैं. साल 2007 में सबसे ज्यादा 175 लोग नक्सली हिंसा के शिकार हुए थे.

999 नक्सली भी मारे गए, 235 पुलिस मुठभेड़ में ढेर
साल 2001 से लेकर नवंबर 2025 तक झारखंड में 999 नक्सली भी मारे गए हैं. इनमें से 235 नक्सली पुलिस के साथ हुए एनकाउंटर में मारे गए बाकी नक्सली आपसी वर्चस्व और ग्रामीणों के द्वारा मार गिराए गए. साल 2008 में झारखंड में सबसे ज्यादा 46 नक्सली मारे गए थे.
झारखंड राज्य निर्माण के पहले तीन वर्ष में 2001, 02 और 03 में नक्सलियों को कोई क्षति नहीं हुई थी. लेकिन साल 2001 से 2003 तक नक्सलियों ने अपनी हिंसक घटनाओं में 144 पुलिसवालों को मौत के घाट उतार दिया था. लेकिन साल 2004 से झारखंड पुलिस ने अपने अभियान को धार दिया और 2004 में 18 नक्सलियों को एनकाउंटर में मार गिराया. साल 2004 से लेकर 2022 तक हर वर्ष पुलिस ने अपने एनकाउंटर में औसतन 07 नक्सली इनकाउंटर में मारे गए.

6300 नक्सली घटनाएं हुईं रिपोर्ट
झारखंड राज्य गठन के बाद 2001 से लेकर 2025 तक कुल 6300 नक्सली घटनाएं अलग-अलग थानों में रिपोर्ट की गई हैं. सबसे ज्यादा नक्सली 512 वारदात साल 2009 में रिपोर्ट की गई हैं.
102 बार पुलिस पर हमला
नक्सलियों ने 2001 से लेकर 2025 तक पुलिस को निशाना बनाते हुए 102 बार हमले किए हैं. पुलिस को निशाना बनाकर सीधा हमला सबसे ज्यादा 2001, 2003 और 2006 में किया गया. इन वर्षों में एक ही साल में दस बार पुलिस पर सीधे हमला किया गया.
1343 बार हुआ मुठभेड़
साल 2001 से लेकर 2025 के अक्टूबर महीने तक पुलिस और नक्सलियों के बीच 1343 बार इनकाउंटर हुआ. पुलिस और नक्सलियों के बीच सबसे ज्यादा 119 बार साल 2009 में एनकाउंटर हुआ था.

314 नक्सली का आत्मसमर्पण, 10 हजार से ज्यादा गिरफ्तार
झारखंड के 25 साल के नक्सली इतिहास में 314 नक्सलियों ने पुलिस के सामने हथियार डाले. जिसमें 25 लाख तक के इनामी नक्सली शामिल थे. 25 साल में झारखंड पुलिस में 10 हजार 592 नक्सलियों को गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे पहुंचाया है. झारखंड पुलिस ने एक करोड़ के इनामी नक्सली तक को गिरफ्तार कर जेल भेजा है.

रेलवे और सरकारी भवनों को भी नुकसान
साल 2001 से लेकर 2025 तक नक्सलियों ने रेलवे और झारखंड के सरकारी संपत्ति को भी जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है. हालांकि 2012 से इन घटनाओं पर लगाम लगी है. नक्सलियों ने साल 2001-05 के बीच 180 बार रेलवे के किसी न किसी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है. वहीं साल 2001-23 के बीच 190 सरकारी भवनों और 300 से ज्यादा मोबाइल टावर को भी नक्सलियों के द्वारा नुकसान पहुंचाया गया.

नक्सलियों की वर्तमान स्थिति
दरअसल, झारखंड में जो नक्सली बचे हुए हैं उन्होंने लेवी वसूलकर अकूत धन संपत्ति कमाई है. नक्सलियों को यह लगा था कि वह सारंडा में बेहद सुरक्षित हैं. लेकिन झारखंड सहित नक्सल प्रभावित राज्यों में जिस तरह से पुलिस का अभियान चल रहा है उसकी वजह से झारखंड के नक्सली भी दहशत में हैं. वह किसी भी तरह जंगल से अपनी धन-संपदा को लेकर निकलना चाहते हैं.
अगर झारखंड में वर्तमान नक्सलवाद परिदृश्य की बात करें तो स्थिति नक्सलियों के लिए जरा भी अनुकूल नहीं है. झारखंड में अब मात्र तीन ऐसे नक्सली बच गए हैं जिनके सिर पर एक-एक करोड़ रुपए का इनाम घोषित है. पूर्व में छह नक्सलियों के ऊपर एक-एक करोड रुपए का इनाम घोषित था लेकिन एक के गिरफ्तार होने और दो के एनकाउंटर में मारे जाने के बाद अब मात्र 3 नक्सली ही झारखंड में बचे हैं, जिनपर 1 करोड़ का इनाम घोषित है.

इन नक्सलियों में पहला नाम भाकपा माओवादियों के ईआरबी सचिव मिसिर बेसरा का है. दूसरा सेंट्रल कमेटी मेंबर पतिराम मांझी और तीसरा आकाश मंडल उर्फ अनमोल है. तीनों के सिर पर एक-एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित है और सबसे खास बात यह है की के तीनों ही कोल्हान के सारंडा में एक्टिव हैं लेकिन तीनों सुरक्षा बलों के निशाने पर हैं.
कुशल रणनीति और बड़े ऑपरेशन
झारखंड में नक्सलवाद को जड़ से मिटाने के लिए कई रणनीतियों पर काम किया गया. केंद्र और राज्य सरकार के तालमेल और पुलिस की कुशल रणनीति के तहत काम करते हुए समम-समय पर घातक ऑपरेशन नक्सलियों के खिलाफ चलाए गये. जो समय के साथ कारगर साबित हुए और नक्सलियों को घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा.
इनमें से से सबसे बड़ा और व्यापक ऑपरेशन ग्रीन हंट रहा. साल 2009 में झारखंड के साथ-साथ, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में एक साथ शुरू हुआ. रेड कॉरिडोर को टारगेट करते हए इस ऑपरेशन का एकमात्र उद्देश्य था कि माओवादी ग्रुप्स (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी) को समाप्त करना. यह भारत के अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस द्वारा किया गया एक बड़ा, समन्वित कार्रवाई था.

इसके अलावा केंद्रीय जांच एजेंसियों के साथ मिलकर झारखंड सरकार की ओर से भी स्टेट पुलिस ने अपने दम पर कई ऑपरेशन चलाए. इनमें सबसे सफल ऑपरेशन बुलबुल रहा. लोहरदगा और लातेहार की सीमा के घने जंगल वाले इलाके में करीब 18 दिन तक ये ऑपरेशन चला. इस अभियान का मुख्य उद्देश्य माओवादियों की फंडिंग को रोकना और जंगल युद्ध में उनकी पकड़ को कमजोर करना था. जिसमें झारखंड पुलिस ने सफलता भी प्राप्त की. इस ऑपरेशन में 14 एनकाउंटर हुए, 16 आईईडी बरामद किए गये और 14 दुर्दांत नक्सलियों की गिरफ्तारी हो पाई. इसके कुछ वक्त बाद ऑपरेशन डबल बुल भी लोहरदगा-लातेहार सीमा पर बुलबुल जंगल में चलाया गया था.
ऑपरेशन ऑक्टोपस- बूढ़ापहाड़
झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा पर मौजूद बूढ़ा पहाड़ के इलाके में अगस्त 2022 में ऑपरेशन ऑक्टोपस शुरू किया गया. यह अभियान फरवरी 2023 तक लगातार जारी रहा. इस अभियान का ही नतीजा था कि माओवादियों के अपने सबसे सुरक्षित ठिकाना बूढ़ा पहाड़ को छोड़कर भागना पड़ा.

ऑपरेशन क्लीन
ऑपरेशन क्लीन एक तरह से नक्सलियों के खिलाफ अंतिम और निर्णायक लड़ाई मानी जा रही है. क्योंकि ये अभियान पश्चिमी सिंहभूम के साथ-साथ कुछेक नक्सल प्रभावित जिला में चलाया जा रहा है. आज भी पश्चिमी सिंहभूम जिला का सारंडा वन क्षेत्र में नक्सली छिपे बैठे हैं. उनको मिटाने, भगाने और पकड़ने के लिए प्रदेश के सुरक्षा बल और पुलिस की टीम ने भी कमर कस ली है. ये ऑपरेशन अब भी जारी है और अंतिम फैसला होने तक जारी रहेगा.
साइ ऑप्स
झारखंड में नक्सलियों को पुलिस लगातार उन्हीं की भाषा में जवाब दे रही है. सूबे में नक्सलवाद के खात्मे को लेकर झारखंड पुलिस 'साइ ऑप्स' को हथियार बनाया है. इसके जरिए प्रदेश में बोली जाने वाली लोकल भाषाओं का प्रयोग कर आम लोगों को नक्सलियों के दोहरे चरित्र को सामने लाने का काम किया जा रहा है. इसके जरिए झारखंड पुलिस ने नक्सल प्रभावित इलाकों में बोली जाने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हुए पोस्टर और पम्पलेट बनवाए हैं और उसे गांव-गांव में बांटा जा रहा है.
मंकी रिजर्व फॉरेस्ट तक पहुंचे सुरक्षा बल
सारंडा की लड़ाई इसलिए भी निर्णायक कही जा रही है क्योंकि सुरक्षा बल मंकी रिजर्व फॉरेस्ट तक पहुंचने में कामयाब हो गए हैं. बता दे कि मंकी रिजर्व फॉरेस्ट में सैकड़ों की तादाद में बंदरों का बसेरा है. इसी इलाके में नक्सलियों ने एक तरह से अपना मुख्यालय बना रखा है. अपने आपको सुरक्षित रखने के लिए मंकी रिजर्व फॉरेस्ट के दक्षिणी क्षेत्र तक नक्सलियों ने दर्जनों बंकर बना रखे हैं और उन्हें आईईडी से घेर दिया गया है. मंकी रिजर्व फॉरेस्ट के आसपास ही नक्सलियों के होने की सूचना है उसी के आधार पर कार्रवाई भी की जा रही है.
बेहतर है झारखंड की आत्मसमपर्ण नीति
झारखंड के आईजी अभियान डॉक्टर माइकल राज ने बताया कि झारखड पुलिस की आत्मसमपर्ण नीति बेहद आकर्षक है. सरेंडर करने वाले नक्सलियों को सामान्य जेल के बजाय ओपन जेल में रखा जाता है. वहीं जो नक्सली आत्मसमर्पण करते हैं उन्हीं को इनाम की राशि भी मिलती है.
इस सरेंडर पॉलिसी का अगर इनामी नक्सली फायदा उठाते हैं तो वह एक बेहतर जीवन गुजार सकते हैं अन्यथा अगर उनकी जानकारी किसी आम नागरिक या सुरक्षा बलों को मिलती है और वह पुलिस तक उसकी सूचना पहुंचाते हैं या पकड़े जाते है तो नक्सली के गिरफ्तारी के बाद रिवार्ड मनी आम पब्लिक या फिर सुरक्षाबलों के पास जाएगा. कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि नक्सलियों के पास अब दूसरा कोई रास्ता नहीं है.

लेवी वसूलना ही एकमात्र उद्देश्य
नक्सल मामले के जानकर बताते हैं कि हथियार के बल पर और हिंसा के रास्ते पर चलकर समाज में एकरूपता लाने का दावा करने वाले और अपने आपको गरीबों का रखवाला कहने वाले नक्सली संगठन अब सिर्फ और सिर्फ पैसे के वसूली के लिए काम कर रहे हैं. वसूली के पैसे से बड़े नक्सली कमांडर अपने बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बना रहे हैं, अपने परिवार को आराम की जिंदगी की दे रहे हैं. वहीं दूसरे तरफ संगठन के छोटे कैडर हथियार ढोते हुए पुलिस की गोलियां खा रहे हैं.
ग्रामीण हुए जागरूक
झारखंड में नक्सलवाद का दीया बुझने के कगार पर है, उसके पीछे कई सारी वजहें है. एक तो राज्य पुलिस और केंद्रीय बल नक्सलियों के पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हैं. लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान नक्सलियों को ग्रामीणों का साथ छोड़ने की वजह से भी हुआ है. ग्रामीणों का सपोर्ट सिस्टम नक्सलियों के लिए लगभग खत्म हो चला है, नतीजा ये है कि अब न उन्हें नए कैडर मिल रहे हैं और न ही ग्रामीण इलाकों में पनाह दी जा रही है.
ग्रामीणों के मोह भंग के पीछे नक्सली खुद जिम्मेदार
अपने आपको गरीबो का मसीहा बताकर ग्रामीणों के सहयोग से लाल आतंक का झंडा फहराने वाले नक्सली झारखंड में हर मोर्चे पर हार का सामना कर रहे हैं. इसके पीछे की वजह खुद नक्सली ही हैं. झारखंड गठन के बाद अब तक नक्सली वारदातों में जहां 550 से ज्यादा पुलिसकर्मी शहीद हुए. वहीं कहीं ज्यादा आमलोग मारे गए.
आंकड़े बताते हैं कि झारखंड गठन से लेकर अब तक 1900 से ज्यादा ग्रामीण नक्सली हिंसा में मारे गए हैं. मारे गए आमलोगों में सांसद, विधायक से लेकर कई मुखिया और आम नागरिक भी शामिल थे. वहीं पुलिस के भी कई अफसर और जवान शहीदों में शामिल रहे.

नक्सली हिंसा में सांसद सुनील महतो और विधायक रमेश सिंह मुंडा की दर्दनाक हत्या हुई. वहीं भाकपा माओवादियों के हुए बड़े हमलों में पाकुड़ के एसपी अमरजीत बलिहार, डीएसपी स्तर के अधिकारी डीएसपी प्रमोद कुमार रांची के बुंडू में, पलामू में देवेंद्र राय, चतरा में विनय भारती तक को नक्सलियों ने अपना निशाना बनाया. झारखंड गठन के ठीक एक वर्ष पहले लोहरदगा एसपी रहे अजय कुमार सिंह भी नक्सली हमले में शहीद हो गए.
नक्सलियों के इस आतंक की वजह से पुलिस का अभियान आक्रामक तो हुआ ही साथ ही साथ ग्रामीणों के मन से भी नक्सलियों के लिए मोह भंग हो चला. खासकर सारंडा में एक दर्जन से ज्यादा ग्रामीणों की आईईडी विस्फोट में मौत ने नक्सलियों के प्रति जो थोड़ा बहुत सम्मान था उसे भी खत्म कर दिया. नतीजा कोल्हान से लेकर पारसनाथ तक नक्सलियों का ग्रामीण सपोर्ट सिस्टम तबाह हो गया.
आज झारखंड राज्य 25 साल का युवा हो चुका है. लेकिन इस युवा काल के दौरान झारखंड राज्य ने काफी कटू अनुभव प्राप्त किए हैं. आज इस अनुभव की बदौलत प्रदेश एक साफ और खुली हवा में सांस लेने के काबिल बना है.
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