दिल्ली में सबसे कम पैदा हो रहे बच्चे; यूपी-बिहार समेत 6 राज्यों में फर्टिलिटी रेट बेहतर, 2036 तक सबसे बूढ़ा राज्य होगा केरलम
महारजिस्ट्रार कार्यालय की SRS सांख्यिकीय रिपोर्ट, तमिलनाडु-केरलम-पश्चिम बंगाल में प्रजनन दर 1.3, उत्तराखंड में लड़का-लड़की अनुपात सबसे कम.

Published : May 31, 2026 at 1:21 PM IST
|Updated : May 31, 2026 at 3:40 PM IST
हैदराबाद : देश में प्रजनन दर में गिरावट आई है. इससे बच्चों की आबादी घट रही है. यूपी-बिहार समेत 6 राज्यों में फर्टिलिटी रेट बेहतर है. जबकि दिल्ली समेत अन्य राज्यों में खराब है. सभी स्टेट में 60 साल से अधिक उम्र वाले लोगों की आबादी बढ़ रही है. भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत महारजिस्ट्रार कार्यालय (ORGI) की ओर से हाल ही में जारी SRS सांख्यिकीय रिपोर्ट में ऐसी ही कई जानकारियां सामने आईं हैं.
SAMPLE REGISTRATION SYSTEM STATISTICAL REPORT 2024 के नाम से जारी रिपोर्ट के अनुसार देश की जनसंख्या अब प्राकृतिक रूप से बढ़ने की बजाय स्थिर होने की दिशा में बढ़ रही है. भविष्य में इसके घटने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. देश में कुल प्रजनन दर यानी एक महिला के औसतन कितने बच्चे होंगे, यह दर 2.1 से घटकर 1.9 हो गई है. जनसंख्या विज्ञान में 2.1 को Replacement Level Fertility (प्रतिस्थापन स्तर प्रजनन क्षमता ) कहा जाता है. अब माता-पिता 2 बच्चों के बजाय 2 से कम बच्चों को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं.
साल 2024 की SRS रिपोर्ट में ग्रामीण और शहरी इलाकों की अलग-अलग प्रजनन दर के बारे में बताया गया है. इसके अनुसार गांवों में प्रजनन दर शहरी के मुकाबले ज्यादा देखने को मिला. केवल तमिलनाडु ऐसा राज्य रहा, जहां दोनों इलाकों में प्रजनन दर एक समान है. पिछले 5 दशकों से लगातार अपने देश में प्रजनन दर में भारी गिरावट आ रही है. रिपोर्ट में बाल विवाह की दर समेत अन्य भी कई अहम बातों का जिक्र है. केरलम में कम उम्र में शादी की दर सबसे कम है.
सबसे कम प्रजनन दर वाले राज्य कौन से? : रिपोर्ट के अनुसार सबसे कम प्रजनन दर वाले राज्यों में शामिल दिल्ली के शहरी इलाके में प्रजनन दर 1.2 जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 1.3 है. कुल प्रजनन दर 1.2 है. इसी तरह पश्चिम बंगाल के शहरी इलाकों में प्रजनन दर 1.1 जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 1.4 है. कुल प्रजनन दर 1.3 है. इसी तरह तमिलनाडु के शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में प्रजनन दर 1.3 है. जबकि कुल प्रजनन दर 1.3 ही है. यानी इस राज्य में जितने बच्चे शहर में पैदा हो रहे, उतने की बच्चे गांव में भी.

बिहार नंबर वन, यूपी दूसरे स्थान पर : रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में प्रजनन दर के मामले में बिहार नंबर वन है. जबकि उत्तर प्रदेश दूसरे स्थान पर है. मध्य प्रदेश तीसरे जबकि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड क्रमश: चौथे, पांचवें और छठवें स्थान पर हैं. यानी इन राज्यों में रहने वाले माता-पिता बच्चे पैदा करने में आगे हैं. इन 6 राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों में प्रजनन दर कम है. लोग कई कारणों से ज्यादा बच्चे नहीं पैदा कर रहे हैं.
अन्य राज्यों का हाल भी जानिए : रिपोर्ट के अनुसार साल 2024 में आंध्र प्रदेश, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र और पंजाब में प्रजनन दर 1.4 रही. इसी तरह हिमाचल, कर्नाटक और तेलंगाना में प्रजनन दर 1.5 रही. असम में प्रजनन दर 1.9, गुजरात में 1.7, हरियाणा में 1.9, केरलम में 1.3, ओडिशा में 1.6 और उत्तराखंड में प्रजनन दर 1.7 रही. इन राज्यों में भी ग्रामीण इलाकों में प्रजनन दर ज्यादा देखी गई, जबकि शहरी इलाकों में यह दर कम रही.
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सामान्य प्रजनन दर में भी आई गिरावट : रिपोर्ट के अनुसार देश के सामान्य प्रजनन दर (General Fertility Rate) में भी गिरावट आई है. स्टडी के दौरान जीएफआर के डेटा का विश्लेषण किया गया. यह डेटा 15-49 आयु वर्ग की प्रति एक हजार महिलाओं पर होने वाले जन्मों की संख्या पर आधारित होता है. रिपोर्ट के अनुसार पूरे देश में जीएफआर में भी गिरावट आई है. साल 2012-14 में यह 78.8% था. जबकि वर्ष 2022-24 में यह घटकर 64.6% हो गया.
केरलम में बुजुर्गों की संख्या ज्यादा, बिहार सबसे युवा : रिपोर्ट के अनुसार सभी राज्यों में 60 साल या इससे ऊपर की उम्र वाले बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है. केरलम में 15.1% आबादी इसी उम्र वाली है. यानी यहां बुजुर्गों की संख्या ज्यादा है. तमिलनाडु में बुजुर्गों की संख्या 14.2% है. वहीं सबसे युवा राज्यों की बात करें तो बिहार में इसमें सबसे आगे है. यहां की करीब एक तिहाई आबादी 14 वर्ष से कम उम्र वाली है, रिपोर्ट में शिशु मृत्यु दर पर भी प्रकाश डाला गया है. मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों में प्रति एक हजार जीवित लोगों पर 41 बच्चों की मृत्यु हुई. जबकि केरलम में यह मात्र 9 थी. ग्रामीण इलाकों में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 32 थी, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 19 थी.

साल 2036 तक 152 करोड़ तक पहुंच सकती है आबादी : नीति आयोग और mospi.gov.in के डेटा के अनुसार साल 2011 में देश की जनसंख्या करीब 121.1 करोड़ थी. साल 2036 तक इसके 152.2 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है. इनमें महिलाओं की संख्या ज्यादा होगी. 0-14 आयु वर्ग में लड़कों की आबादी लड़कियों से करीब 1.2% ज्यादा है. जबकि 15-59, 60+ वाले आयु वर्ग में महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा है. 15-59 आयु वर्ग के ज्यादातर कामकाजी पुरुष और महिलाएं गांवों की तुलना में शहरी इलाकों में ज्यादा रहते हैं.
ज्यादातर प्रसव अस्पतालों में हो रहे : ORGI की Sample Registration System (SRS) रिपोर्ट के अनुसार अब घरों में प्रसव काफी सीमित मात्रा हो रहे हैं. ज्यादातर प्रसव सरकारी या निजी अस्पतालों में हो रहे है. साल 2024 में कुल 95.4% प्रसव अस्पतालों में हुए. शहरी और ग्रामीण इलाकों की बात करें तो शहर में यह प्रतिशत 97.9 रहा जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह प्रतिशत 94.6 रहा. यानी अब डिलीवरी को लेकर लोगों में जागरूकता ज्यादा आ गई है. लोग घरों में प्रसव का रिस्क नहीं लेना चाहते हैं.
केवल 40.2% लोगों ने अस्पताल में तोड़ा दम : SRS रिपोर्ट में चिकित्सा देखभाल उपलब्धता में असमानता का भी जिक्र है. इसके अनुसार साल 2024 में करीब 45.5% मौतें बिनी किसी मेडिकल स्टाफ की मौजूदगी में हुई. यानी इतने प्रतिशत लोगों को अंतिम समय में स्वास्थ्य सेवा नहीं मिल पाई. ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर ज्यादा रही. वहां 48.9% लोगों की मौत के समय हेल्थ केयर नहीं मिल पाया. निजी और सरकारी अस्पतालों में हुई मौतों की बात करें तो 24.7% मौतें सरकारी अस्पतालों में जबकि 15.5% मौतें निजी अस्पतालों में हुईं.
शहरी क्षेत्र में विवाह की उम्र ज्यादा, गांवों में कम : रिपोर्ट में विवाह के पैटर्न में आए बदलावों के बारे में भी जानकारी दी गई है. साल 2024 में देश की 73.5% लड़कियों ने 21 साल या इससे ज्यादा उम्र का होने पर ही शादी की. इसी क्रम में 24.5% लड़कियों ने 18 से लेकर 20 साल की उम्र में शादी की. 18 साल से पहले शादी रचाने वाली लड़कियों की संख्या केवल 2.1% रही. शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो शहर की 82.2% लड़कियों ने 21 साल की उम्र के बाद शादी की. ग्रामीण इलाकों में यह प्रतिशत कम यानी 70.2% रहा. दिल्ली में 18 साल कम उम्र में किसी भी लड़की ने शादी नहीं की.

इन देशों में क्यों ज्यादा है जन्म दर? : विश्व बैंक के डेटा के अनुसार सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, चाड, सोमालिया, नाइजर, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो जैसे देशों में जन्म दर ज्यादा रहने के कई कारण हैं. यहां के लोगों तक गर्भनिरोधक उपायों की उतनी पहुंच नहीं है जितनी कि अन्य देशों में. रिप्रोडक्टिव हेल्थ रिसोर्स की बड़े पैमाने पर कमी सीधे तौर पर अनचाहे गर्भधारण को बढ़ावा देती है. सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में 70 प्रतिशत महिलाएं फेमिली प्लानिंग के उपाय नहीं अपना पा रहीं हैं. इन देशों की महिलाएं कम शिक्षित हैं. रोजगार भी नहीं है. दोनों मामलों में ये देश निचले पायदान पर हैं.
सेंट्रल अफ्रीकन गणराज्य में महिलाएं जल्द ही शादी भी कर लेती हैं. वे बड़े परिवारों को प्राथमिकता देती हैं. कांगो में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर सबसे ज्यादा है. पहले के परिवार ज्यादा बच्चे पैदा करके शिशुओं की ज्यादा मृत्यु दर की भरपाई करते थे, जिससे परिवार का गुजारा करने के लिए काफी बच्चे बड़े होने तक जिंदा रहे. इन देशों में ज्यादातर आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है. ये खेती करते हैं. ऐसे देशों में बच्चों को अक्सर इकोनॉमिक एसेट के तौर पर देखा जाता है. यानी उनसे उम्मीद की जाती है कि वे खेती में मदद करेंगे. मां-बाप का सहारा बनेंगे.
केरलम में बाल विवाह की दर सबके कम, पश्चिम बंगाल में ज्यादा : SRS रिपोर्ट के अनुसार केरलम में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या ज्यादा होने पर वहां बाल विवाह की दर केवल 0.04% है. यहां की 80% लड़कियां 21 साल की उम्र के बाद ही शादी करती हैं.तमिलनाडु और तेलंगाना के खासकर शहरी इलाकों में भी यही पैटर्न देखने को मिलता है. हालंकि पश्चिम बंगाल में 18 साल के उम उम्र वाली लड़कियों की शादी का प्रतिशत सबसे अधिक 6.3 है. 2022 से 2024 के बीच देश में प्रति एक हजार लड़कों पर 918 लड़कियां थीं. हालांकि उत्तराखंड में यह अनुपात सबसे कम 872 का रहा. वहीं छत्तीसगढ़ और केरलम इस मामले में बाजी मारते दिखे. छत्तीसगढ़ में प्रति एक हजार लड़कों पर 978 जबकि केरलम में प्रति एक हजार लड़कों पर 974 लड़कियां थीं.
पिछले 5 दशकों में जन्म दर में ज्यादा गिरावट : SRS रिपोर्ट के अनुसार यह पहला मौका है जब पिछले 5 दशकों में पूरे देश में बच्चों के जन्म दर में ज्यादा गिरावट देखने को मिली है. साल 1971 में यह 36.9 थी. इसके बाद साल 2024 में यह 18.3 हो गई. यानी प्रति एक हजार लोगों पर इतने बच्चों ने जन्म लिया. इन वर्षों के दौरान गांवों में जन्म दर शहरों के मुकाबला ज्यादा रहा. पिछले दशक में बर्थ रेट में लगभग 13% की गिरावट आई है. हालांकि पिछले 50 साल में शहरी और ग्रामीण जन्म दर का अंतर काफी कम भी हुआ है. इसके बावजूद अभी भी एक समान नहीं हुआ है.

इन देशों में क्यों कम है जन्म दर? : विश्व बैंक के डेटा के अनुसार इन देशों में जन्म दर कम होने के पीछे आर्थिक संकट समेत कई फैक्टर जिम्मेदार हैं. सैन मैरिनो, दक्षिण कोरिया, यूक्रेन आदि देशों में लड़का-लड़की अनुपात में अंतर है. यहां की युद्ध जैसी परिस्थितियां भी लोगों की सोच पर असर डालती हैं. इन देशों में बच्चों को पालने पर काफी खर्च आता है. उनकी पढ़ाई पर भी काफी रुपये खर्च होते हैं. दूसरी ओर यूक्रेन युद्ध संकट की वजह से इस मामले में निचले स्तर पर पहुंच गया है. सैन मैरिनो में बच्चों की तुलना में बुजुर्गों का अनुपात ज्यादा है. साउथ कोरिया में लगातार दुनिया में सबसे कम फर्टिलिटी रेट दर्ज होता है.
भारत में बढ़ रही बुजुर्गों की संख्या : प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो के मुताबिक भारत तेजी से डेमोग्राफिक बदलाव (जनसांख्यिकीय परिवर्तन) से गुजर रहा है. साल 2011 में 60 साल या इससे अधिक उम्र वाली बुजुर्ग आबादी 10 करोड़ से बढ़कर साल 2036 में करीब 23 करोड़ होने का अनुमान है. यानी साल 2036 तक लगभग सात में से एक भारतीय 60 साल या उससे ज्यादा उम्र वाला होगा. जुलाई 2020 में टेक्निकल ग्रुप ऑन पॉपुलेशन प्रोजेक्शन्स (TGPP) ने भारत और राज्यों के लिए एक पॉपुलेशन प्रोजेक्शन रिपोर्ट बनाई थी. रिपोर्ट में इन्हीं बातों का जिक्र है.
पुरुषों की तुलना में बुजुर्ग महिलाओं की संख्या ज्यादा : प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो के अनुसार केरलम, तमिलनाडु, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में पहले से ही बुजुर्गों की संख्या ज्यादा है. अनुमान है कि केरलम में 2011 में बुजुर्गों की आबादी 13% से बढ़कर 2036 तक 23% हो जाएगी. इस दौरान केरलम सबसे ज्यादा बुजुर्गों की संख्या वाला राज्य होगा. कई उत्तरी और पूर्वी राज्यों में अभी बुजुर्ग कम हैं. उत्तर प्रदेश में भी तुलनात्मक रूप से युवा आबादी है. यहां बुजुर्ग आबादी साल 2011 के 7% से बढ़कर 2036 तक 12% होने की आशंका है. अपने देश में बुजुर्ग आबादी सालाना करीब 3% की दर से बढ़ रही है. देश में प्रति एक हजार बुजुर्ग पुरुषों पर 1065 महिलाएं हैं. बुजुर्ग आबादी में 58% महिलाएं जबकि 54% विधवाएं हैं.
अपने देश में जन्मदर में क्यों आ रही गिरावट? : पीआईबी के अनुसार अपने देश में भी जन्म दर में कमी आने की कई वजहें हैं. शिक्षित महिलाएं देरी से शादी करती हैं. इससे ज्यादा बच्चे पैदा करने की संभावना वैसे ही कम हो जाती है. गर्भनिरोधक दवाएं और फेमिली प्लानिंग का बढ़ता इस्तेमाल भी जन्मदर पर लगाम लगाता है. बड़े परिवार अब लगातार कम होते जा रहे हैं. ज्यादातर लोग छोटे परिवारों को ही महत्व दे रहे हैं. शहरी इलाकों में रहने वाले परिवारों को घर, पढ़ाई, हेल्थकेयर और बच्चों की देखभाल पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है. इसके कारण भी लोगों की सोच में बदलाव आया है. अब महिलाएं भी कामकाजी हैं. नौकरी को महत्व दे रही हैं. इसलिए वे ज्यादा बच्चे नहीं चाहती हैं.
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