लाइलाज पर्किंसन का इलाज होगा संभव ! BHU और TIGS ने ढूंढ़ा Induced Pluripotent Stem Cell 'iPSC'
बीएचयू और टीआईजीएस बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने स्टेम सेल खोजा है. इससे किसी गंभीर बीमारी को ठीक करने और बीमारी तक जल्द पहुंचने में मदद.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : July 9, 2026 at 2:00 PM IST
वाराणसी: पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) जैसी बीमारी अब लाइलाज नहीं रहेगी. बीएचयू और टीआईजीएस बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने इसकी काट निकाल ली है.
बीएचयू और टीआईजीएस बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक CRISPR/Cas9 जीनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग कर स्टेम सेल खोज लिया है. इस स्टेम सेल के ज़रिए किसी गंभीर बीमारी को ठीक करने और बीमारी के जड़ तक जल्द पहुंचने में बड़ी मदद मिलेगी.
बीएचयू के विज्ञान संस्थान के सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के शोधकर्ताओं ने टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (टीआईजीएस), बेंगलुरु के सहयोग से सफलतापूर्वक दो स्वस्थ प्रेरित बहु शक्तिशाली स्टेम सेल (Induced Pluripotent Stem Cell iPSC) लाइनों का विकास किया है और अत्याधुनिक CRISPR/Cas9 जीनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग करके जटिल न्यूरोडीजेनेरेटिव (तंत्रिका अपक्षयी) रोगों - पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) का मॉडल भी तैयार किया है.

यह रिसर्च दो पीएचडी शोधार्थियों सूरजित मालाकार और शैलेयी रॉयचौधरी ने उनके थीसिस कार्य के अंतर्गत किया गया. यह उपलब्धि भारत की उन क्षमताओं को महत्वपूर्ण रूप से आगे बढ़ाती है, जिनके माध्यम से चिकित्सा विज्ञान के सबसे गंभीर तंत्रिका संबंधी रोगों का अध्ययन, मॉडलिंग और संभावित उपचार विकसित किया जा सकता है.
यह वैज्ञानिक उपलब्धि देश के दो प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के बीच हस्ताक्षरित एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU) के माध्यम से संभव हुई, जिसने दोनों संस्थानों की बौद्धिक और तकनीकी क्षमताओं को एक साथ जोड़ा.
इस संयुक्त अध्ययन का नेतृत्व काशी हिंदू विश्वविद्यालय से प्रो परिमल दास (प्रधान अन्वेषक - PI) और प्रो डॉ. दीपिका जोशी (सह-प्रधान अन्वेषक - Co-PI) तथा टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (टीआईजीएस) से डॉ. वसंत थामोदरन ने किया.
दोनों केंद्रों के विशेष संसाधनों को एक करते हुए रिसर्च टीम ने अत्यंत गंभीर रोगों, विशेषकर पार्किंसन रोग और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS), के जैविक रहस्यों को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित किया.

इस उपलब्धि की नींव अत्याधुनिक कोशिकीय पुनःप्रोग्रामिंग (Cellular Reprogramming) तकनीक पर आधारित है. यह विधि परिपक्व मानव कोशिकाओं की जैविक घड़ी को प्रभावी ढंग से पीछे ले जाकर उन्हें उनके प्रारंभिक विकासात्मक चरण में वापस पहुँचा देती है.
इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए रिसर्च टीम ने विशिष्ट ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स के अत्यंत सटीक संयोजन का उपयोग किया, जिन्हें वैज्ञानिक समुदाय में सामूहिक रूप से यामानाका फैक्टर्स के नाम से जाना जाता है.
इन कारकों को स्वस्थ सोमैटिक (दैहिक) कोशिकाओं, जैसे वयस्क रक्त नमूनों से प्राप्त कोशिकाओं, में प्रविष्ट कराकर वैज्ञानिकों ने उनकी पूर्व विशेषीकृत पहचान को सफलतापूर्वक मिटा दिया.
इस प्रक्रिया ने परिपक्व कोशिकाओं को भ्रूण-सदृश, बहु-शक्तिशाली (Pluripotent) अवस्था में परिवर्तित कर दिया. इस मूल अवस्था में नव-विकसित iPSC लाइनों में अमर बने रहने की अद्भुत क्षमता होती है. वे अनिश्चितकाल तक विभाजित होती रह सकती हैं और साथ ही मानव शरीर में पाए जाने वाले किसी भी प्रकार के ऊतक में परिवर्तित होने की क्षमता बनाए रखती हैं.
इस पहल की सबसे विशिष्ट विशेषता यह है कि उन्नत CRISPR/Cas9 तकनीक को सीधे इन नई iPSC लाइनों में एकीकृत किया गया. केवल स्वस्थ कोशिकाओं का विकास करने के बजाय, बीएचयू और टीआईजीएस की संयुक्त टीम ने इस आणविक "कैंची" प्रणाली का उपयोग करके पार्किंसन रोग और ALS से जुड़ी सटीक आनुवंशिक विविधताओं को इनमें सम्मिलित किया.

नियंत्रित प्रयोगशाला वातावरण में इन आनुवंशिक म्यूटेशन की हूबहू नकल करके शोधकर्ताओं ने न्यूरोडीजेनेरेशन के अत्यंत समान और सटीक मॉडल तैयार कि. स्टेम सेल जीव विज्ञान और जीनोम संपादन का यह लक्षित संयोजन वैज्ञानिकों को कोशिकीय क्षरण के शुरुआती चरणों का अध्ययन करने में सक्षम बनाता है, जो किसी मानव रोगी में शारीरिक लक्षण प्रकट होने से बहुत पहले शुरू हो जाते हैं.
दो स्वस्थ iPSC लाइनों के विकास को व्यापक शोध समुदाय के साथ bioRxiv पर एक प्रीप्रिंट के माध्यम से साझा किया गया है तथा इसे सहकर्मी-समीक्षित (Peer-reviewed) जर्नल में भी प्रकाशन हेतु भेजा गया है. CRISPR/Cas9 आधारित रोग मॉडलिंग संबंधी यह कार्य भी शीघ्र ही किसी सहकर्मी-समीक्षित जर्नल में प्रकाशित होने की संभावना है.
प्रो. परिमल दास ने कहा, “एक स्थिर और स्वस्थ iPSC लाइन का उपलब्ध होना शोधकर्ताओं के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली आधारभूत या ‘कंट्रोल’ संसाधन है. इन कोशिकाओं में असीमित रूप से विभाजित होने तथा मानव शरीर की लगभग किसी भी अंतिम कोशिका प्रकार धड़कने वाली हृदय मांसपेशी कोशिकाओं से लेकर अत्यंत संवेदनशील न्यूरॉन्स तक में विकसित होने की क्षमता होती है.
अब वैज्ञानिक और मेडिसिन मेकर्स अत्यंत सटीक, रोगी-विशिष्ट “डिश में रोग” (Disease-in-a-dish) मॉडल स्थापित कर सकेंगे, जिनकी सहायता से वे जटिल और कठिन-उपचार योग्य रोगों की मूलभूत कार्यप्रणाली का अध्ययन कर सकेंगे, मानव परीक्षणों से पहले नई दवाओं की विषाक्तता और प्रभावशीलता का परीक्षण कर सकेंगे तथा ऐसे प्रत्यारोपण योग्य ऊतकों का विकास कर सकेंगे जो नैतिक चिंताओं और प्रतिरक्षा-आधारित अस्वीकृति (Immune Rejection) जैसी समस्याओं को कम कर सकें.
भविष्य की योजना के तहत शोध दल इन स्टेम कोशिकाओं का उपयोग करके त्रि-आयामी सूक्ष्म अंग मॉडल (ऑर्गेनॉइड्स) विकसित करेगा, जो रोगग्रस्त ऊतकों की जीवंत प्रतिकृतियों के रूप में कार्य करेंगे. ये मॉडल वैज्ञानिकों को वास्तविक समय में रोग की प्रगति जानने, न्यूरोडीजेनेरेशन के लिए जिम्मेदार सटीक आणविक कारणों की पहचान करने में सक्षम बनाएंगे.
इससे वैज्ञानिक उन रोगों के लिए परिवर्तनकारी उपचार विकसित करने की दिशा में और अधिक निकट पहुँच सकेगा, जिनका वर्तमान में कोई प्रभावी इलाज उपलब्ध नहीं है.

