वनों में आग लगाने वालों को होगी जेल, ये है विभाग का चौतरफा शिकंजे का नया प्लान
वनों में आग लगाने वालों पर अब फॉरेस्ट एक्ट, वाइल्डलाइफ एक्ट और भारतीय न्याय संहिता, तीनों कानूनों का संयुक्त इस्तेमाल होगा

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 20, 2026 at 3:09 PM IST
नवीन उनियाल
देहरादून (उत्तराखंड): राज्य का 71 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र का है. इस कारण यहां के वन आग के प्रति संवेदनशील हैं. हर साल राज्य के वनों में आग लगती रहती है. इस वनाग्नि से उत्तराखंड को लाखों-करोड़ों की वन संपदा का नुकसान होता है. कई बार ये आग प्राकृतिक कारणों से लगती है तो कई बार शरारती लोग भी जंगल को जला देते हैं. वन विभाग समय-समय पर वनाग्नि रोकने के लिए कदम उठाता है तो जंगलों में आग लगाने वालों की धरपकड़ भी करता है. इसके बावजूद वनाग्नि की घटनाएं रुकती नहीं हैं. अब उत्तराखंड वन विभाग ने जंगलों में आग लगाने वालों के लिए बहुत ही सख्त कदम उठाया है. पेश है हमारी खास रिपोर्ट...
कानून की लाठी कहर बरपाएगी: उत्तराखंड के जंगलों को चिंगारी देने वालों पर अब कानून की लाठी कहर बरपाएगी. दरअसल उत्तराखंड वन विभाग फॉरेस्ट फायर को लेकर शरारती तत्वों पर शिकंजा कसने जा रहा है. इसके तहत ना केवल फॉरेस्ट एक्ट, बल्कि वाइल्डलाइफ एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत भी ऐसे लोगों पर कानूनी कार्रवाई करने की योजना बनाई जा रही है.
आग लगाने वालों पर लगेंगी कानूनी धाराएं: उत्तराखंड में फॉरेस्ट फायर सीजन की शुरुआत के साथ ही वन महकमे ने इस बार सख्त तेवर अपनाने का संकेत दे दिया है. जंगलों को चिंगारी देने वालों के खिलाफ अब केवल परंपरागत कार्रवाई नहीं, बल्कि कानून की कई धाराओं का संयुक्त इस्तेमाल किया जाएगा. वन विभाग ने साफ कर दिया है कि यदि किसी ने जानबूझकर या लापरवाही से जंगलों में आग लगाई, तो उसके खिलाफ न सिर्फ फॉरेस्ट एक्ट बल्कि वाइल्डलाइफ एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत भी मुकदमा दर्ज कराया जा सकता है.

उत्तराखंड में चार महीने रहता है फायर सीजन: करीब चार महीने तक चलने वाले फायर सीजन को देखते हुए विभाग ने फील्ड स्तर पर तैयारियां पहले ही पूरी कर ली हैं. कंट्रोल रूम, फायर वॉचर्स, संवेदनशील इलाकों की मैपिंग, उपकरणों की उपलब्धता और स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र को सक्रिय कर दिया गया है. लेकिन इस बार रणनीति का सबसे अहम हिस्सा है, आग लगाने वालों पर कड़ा कानूनी शिकंजा कसना.
90 फीसदी मामलों में मानव कारण: वन विभाग के आकलन के अनुसार जंगलों में लगने वाली करीब 90 फीसदी आग के पीछे मानवीय कारण होते हैं. कई बार स्थानीय लोग सूखी घास जलाने, रास्ता साफ करने या नई घास उगाने की सोच से आग लगा देते हैं. वहीं पर्यटकों द्वारा जलती सिगरेट फेंक देना, कैम्प फायर को बिना बुझाए छोड़ देना या प्लास्टिक-कचरे में आग लगाना भी बड़े हादसों की वजह बनता है. इन लापरवाहियों का खामियाजा पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भुगतना पड़ता है. हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो जाता है. जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है. जड़ी-बूटियां और वन्यजीव प्रभावित होते हैं. साथ ही ग्रामीण आबादी और पेयजल स्रोतों पर भी असर पड़ता है.
प्रमुख वन संरक्षक का स्पष्ट संदेश: प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ) रंजन कुमार मिश्रा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि-

राज्य के जंगलों को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी. अब केवल औपचारिक केस दर्ज कर देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि ऐसे तत्वों को कानूनी रूप से ऐसा सबक सिखाया जाएगा, जिससे भविष्य में कोई भी व्यक्ति जंगलों से खिलवाड़ करने की हिम्मत न करे.
-रंजन कुमार मिश्रा, प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ), उत्तराखंड वन विभाग-
उन्होंने बताया कि वन विभाग ने पुलिस विभाग के साथ इस मुद्दे पर चर्चा की है. भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों के तहत भी ऐसे मामलों में मुकदमा दर्ज किया जा सकता है. इससे कार्रवाई का दायरा व्यापक होगा और सजा भी ज्यादा प्रभावी हो सकेगी.
मौजूदा प्रावधान और उनकी सीमाएं: फिलहाल उत्तराखंड में भारतीय वन (उत्तरांचल संशोधन) अधिनियम 2001 के तहत जंगलों में आग लगाने वाले लोगों के खिलाफ H2 केस दर्ज किया जाता है. यह कार्रवाई धारा 26 के अंतर्गत होती है. इसमें अधिकतम दो साल की सजा या पांच हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान हैं. यदि कोई व्यक्ति दोबारा ऐसा अपराध करता है, तो दो साल की सजा के साथ पांच हजार से लेकर बीस हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

वन विभाग का मानना है कि इन प्रावधानों की सख्ती पर्याप्त नहीं है. कई मामलों में आरोपी जमानत पर छूट जाते हैं या मामूली जुर्माना भरकर बच निकलते हैं. यही वजह है कि विभाग अब अन्य सख्त कानूनों के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है.
वाइल्डलाइफ एक्ट का सहारा: जंगलों में आग से यदि वन्यजीवों को नुकसान होता है, तो ऐसे मामलों में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धाराएं लागू की जा सकती हैं. सेक्शन 9 के तहत वन्यजीव को मारना, घायल करना, पकड़ना, पीछा करना या परेशान करना दंडनीय अपराध है.

वाइल्डलाइफ एक्ट के सेक्शन 51 के अनुसार यदि शेड्यूल-1 के अंतर्गत आने वाले वन्यजीव को नुकसान पहुंचता है, तो आरोपी को कम से कम तीन साल और अधिकतम सात साल तक की सजा हो सकती है. इसके साथ न्यूनतम दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया जा सकता है, जो दोबारा ऐसा अपराध करने के मामलों में और अधिक हो जाता है.
उत्तराखंड के जंगलों में कई संरक्षित प्रजातियां पाई जाती हैं. ऐसे में यदि आग के कारण इन प्रजातियों को क्षति पहुंचती है, तो आरोपी के खिलाफ कठोरतम कार्रवाई संभव है.
भारतीय न्याय संहिता (BNS) की एंट्री: वन विभाग अब भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों का भी सहारा लेने की तैयारी में है. जंगलों में आग लगाना सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, पर्यावरणीय अपराध और जनसुरक्षा से जुड़े अपराध की श्रेणी में आ सकता है.

मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि सुशांत पटनायक ने बताया कि-
वन विभाग H2 केस तो दर्ज करता ही है, लेकिन पुलिस विभाग भी समानांतर रूप से कार्रवाई कर सकता है. यदि भारतीय न्याय संहिता के तहत मुकदमा दर्ज होता है, तो आरोपी को कठोर धाराओं का सामना करना पड़ सकता है. प्रमुख सचिव वन की ओर से जिलाधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि जहां भी आगजनी के मामले में मुकदमा दर्ज हो, उसकी समीक्षा अन्य गंभीर अपराधों की तरह ही की जाए. इससे प्रशासनिक स्तर पर भी निगरानी बढ़ेगी.
-सुशांत पटनायक, मुख्य वन संरक्षक, वनाग्नि-
जिला प्रशासन और पुलिस की भूमिका: वन विभाग और पुलिस विभाग के बीच समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. संवेदनशील क्षेत्रों में संयुक्त गश्त, ड्रोन निगरानी, संदिग्ध गतिविधियों पर नजर और सूचना तंत्र को मजबूत किया जा रहा है. जिलाधिकारियों को यह भी कहा गया है कि आगजनी के मामलों में अभियोजन की प्रगति की नियमित समीक्षा करें. इससे केस लंबित नहीं रहेंगे और आरोपियों को समय पर सजा मिल सकेगी.
निवारक रणनीति भी साथ-साथ: सिर्फ दंडात्मक कार्रवाई ही नहीं, बल्कि निवारक उपायों पर भी जोर दिया जा रहा है. गांव स्तर पर जागरूकता अभियान, स्कूलों और स्थानीय समितियों के माध्यम से संदेश और पर्यटकों के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे हैं. वन विभाग ने अपील की है कि कोई भी व्यक्ति जंगलों में आग जलाने से पहले नियमों को समझे और लापरवाही से बचे. यदि कहीं आग लगती दिखे, तो तत्काल विभाग को सूचना दे.

क्यों जरूरी है सख्ती? उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि जल स्रोतों, जलवायु संतुलन और आजीविका का आधार हैं. आग से मिट्टी की उर्वरता घटती है. भू-स्खलन का खतरा बढ़ता है और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि होती है. हर साल फॉरेस्ट फायर से करोड़ों रुपये का नुकसान होता है. विभागीय संसाधन, मानवशक्ति और समय आग बुझाने में खर्च हो जाता है. यदि आग लगाने वालों पर सख्ती नहीं की गई, तो यह सिलसिला थमने वाला नहीं है.

जंगल जलाओगे तो जेल जाओगे: वन विभाग का इस बार संदेश बिल्कुल साफ है. आग लगाओगे तो जेल जाओगे. अब जंगलों को नुकसान पहुंचाना आसान नहीं होगा. फॉरेस्ट एक्ट, वाइल्डलाइफ एक्ट और भारतीय न्याय संहिता, तीनों कानूनों का संयुक्त इस्तेमाल कर शरारती तत्वों पर चौतरफा शिकंजा कसा जाएगा. फायर सीजन की शुरुआत के साथ ही यह रणनीति लागू करने की तैयारी है. यदि यह सख्ती जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू हुई, तो संभव है कि इस बार जंगलों को कम नुकसान झेलना पड़े और प्रदेश की हरियाली सुरक्षित रह सके.
वन विभाग की इस नई रणनीति से साफ है कि अब आगजनी को हल्के में नहीं लिया जाएगा. कानून का डंडा अब जंगलों को जलाने वालों पर ही भारी पड़ेगी.
ये भी पढ़ें:
- उत्तराखंड में जंगलों को बचाने की कसरत, मॉक ड्रिल से भांपी तैयारियां, जानिए कैसा रहा अभ्यास
- फायर सीजन से पहले वन क्षेत्रों के पुनर्गठन पर घमासान, सरकार के लिए बढ़ सकती हैं मुश्किलें
- केदार घाटी के जंगलों में भीषण आग, लाखों की वन संपदा स्वाहा, वन्य जीवों पर भी संकट
- सीएम धामी के संबोधन के समय पास के जंगल में लगी आग, अफसरों में मचा हड़कंप
- उत्तरकाशी हुआ धुआं-धुआं, आग से धधक रहे जंगल, बहुमूल्य वन संपदा हो रही खाक

