उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था को कैसे मिलेगी रफ्तार? GDP में पिछड़े 9 पहाड़ी जिले, बैलेंस बनाना बड़ी चुनौती
उत्तराखंड के 4 मैदानी जिलों को छोड़ दिया जाए तो 9 पहाड़ी जिलों की GDP में काफी अंतर है. देहरादून से धीरज सजवाण की रिपोर्ट

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : August 27, 2026 at 7:08 PM IST
देहरादून (उत्तराखंड): उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुई है. राज्य की सकल घरेलू उत्पाद (Gross State Domestic Product) में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखने को मिली है. लेकिन आर्थिक विकास के इस चमकदार आंकड़े के पीछे एक ऐसी तस्वीर भी है, जो नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है. राज्य की कुल आर्थिक गतिविधियों में मैदानी जिलों की हिस्सेदारी कहीं अधिक है, जबकि पहाड़ी जिले अब भी आर्थिक विकास की मुख्यधारा में अपेक्षाकृत पीछे हैं.
जीएसडीपी असंतुलन खड़े करता सवाल: राज्य के 4 मैदानी जिलों की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी तक होने और 9 पर्वतीय जिलों के पीछे रहने का यह अंतर उत्तराखंड के समग्र और संतुलित विकास पर सवाल खड़े करता है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या लगातार बढ़ रही सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) को ही आर्थिक प्रगति का पैमाना माना जाए या फिर यह भी देखा जाए कि इस विकास का लाभ राज्य के अलग-अलग भौगोलिक हिस्सों तक कितना पहुंच रहा है.
आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाना जरूरी: सरकार के स्तर पर इस असंतुलन को कम करने के लिए पहाड़ों की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप आर्थिक मॉडल विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है. केंद्र के नीति आयोग की तर्ज पर प्रदेश में काम करने वाले सेतु आयोग के आर्थिक सलाहकार हनुमंत रावत भी इस आर्थिक असंतुलन को स्वीकार करते हैं. उनका कहना है कि प्रदेश की GDP में मैदानी जिलों का हिस्सा पर्वतीय जिलों की तुलना में काफी अधिक है और इस अंतर को पाटने के लिए पहाड़ों की परिस्थितियों के अनुरूप आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाना जरूरी है.
MSME को बनाया जा सकता है पहाड़ की अर्थव्यवस्था का इंजन: हनुमंत रावत के मुताबिक पहाड़ी जिलों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) बेस को मजबूत करना इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकता है. उनका मानना है कि पहाड़ों में ऐसी माइक्रो और स्मॉल इंडस्ट्री विकसित करनी होंगी, जो स्थानीय संसाधनों, उत्पादों और सेवाओं के इर्द-गिर्द खड़ी हों. MSME में रोजगार पैदा करने की क्षमता अधिक होती है और इनकी संख्या बढ़ने का सीधा असर स्थानीय अर्थव्यवस्था और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर पड़ता है. हालांकि पहाड़ों में उद्योग स्थापित करने का मॉडल मैदानी क्षेत्रों की नकल वाला नहीं हो सकता.

हनुमंत रावत के मुताबिक स्थानीय उत्पाद और संसाधन आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना होगा, लेकिन यह विकास जंगल, जमीन और पर्यावरण की कीमत पर नहीं होना चाहिए. ऐसे में सर्विस सेक्टर और IT आधारित उद्योग भी पर्वतीय जिलों के लिए महत्वपूर्ण विकल्प बन सकते हैं.

क्या फाइव स्टार कल्चर के बजाय होमस्टे बेहतर विकल्प? उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन पहले से ही बड़ा रोल निभाता रहा है. बड़े होटल और रिसॉर्ट सरकार को GST (Goods and Services Tax) के रूप में राजस्व जरूर देते हैं, लेकिन इनके जरिए होने वाला आर्थिक लाभ हमेशा स्थानीय स्तर तक उसी अनुपात में नहीं पहुंचता. हनुमंत रावत के मुताबिक ग्रामीण पर्यटन और होमस्टे मॉडल पहाड़ी अर्थव्यवस्था को अधिक व्यापक आधार दे सकता है. उनका कहना है कि उत्तराखंड की संस्कृति खुद एक बड़ी आर्थिक ताकत है. स्थानीय खान-पान, परंपराएं, हस्तशिल्प, लोक संस्कृति और ग्रामीण जीवन को पर्यटन से जोड़कर एक ऐसी कल्चर इकोनॉमी तैयार की जा सकती है, जिसका लाभ स्थानीय लोगों को सीधे मिले. यानी पर्यटन को केवल होटल और रिसॉर्ट तक सीमित रखने के बजाय स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना होगा.

आर्थिक मामलों के जानकारों का क्या है कहना: आर्थिक मामलों के जानकार अर्थशास्त्री राजेंद्र बिष्ट के मुताबिक उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती पहाड़ी जिलों में ऐसा आर्थिक इकोसिस्टम तैयार करना है, जो पर्यावरण के अनुकूल भी हो और रोजगार भी पैदा करें. उनका कहना है कि MSME और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की बात तो हो रही है, लेकिन पहाड़ों में इसके लिए लगातार संसाधन उपलब्ध कराना भी बड़ी चुनौती है. राजेंद्र बिष्ट के मुताबिक क्लस्टर आधारित ग्रोथ सेंटर इस समस्या का प्रभावी समाधान हो सकते हैं. अलग-अलग जिलों की स्थानीय क्षमता और संसाधनों के आधार पर उद्योगों के क्लस्टर विकसित किए जाएं और उन्हें बाजार, तकनीक, वित्त तथा प्रशिक्षण से जोड़ा जाए. उनका मानना है कि उत्तराखंड को सामान्य औद्योगिक मॉडल के बजाय अपने लिए एक अलग हिल इकोनॉमिक मॉडल तैयार करना होगा.

पहाड़ी जिलों में उद्योग विकसित करने पर जोर: राजेंद्र बिष्ट का एक अहम सुझाव यह भी है कि जब राज्य सरकार कर्ज ले तो उसका इस्तेमाल पहाड़ी जिलों में ऐसी परिसंपत्तियां बनाने में हो, जो भविष्य में आय और रोजगार पैदा करें. यानी कर्ज से केवल खर्च नहीं, बल्कि एसेट क्रिएशन होना चाहिए. उनके मुताबिक पहाड़ी क्षेत्रों को पर्यावरणीय सेवाएं देने के बदले ग्रीन सेस या टूरिज्म फीस जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है और उससे मिलने वाली राशि को स्थानीय संसाधनों के विकास में लगाया जाना चाहिए. उन्होंने जिलावार आर्थिक गतिविधियों के सुझाव भी दिए हैं. चमोली और पिथौरागढ़ में एरोमा और हर्बल आधारित उद्योग, अल्मोड़ा और पौड़ी में स्थानीय उत्पादों से जुड़ी गतिविधियां, जबकि उत्तरकाशी और चंपावत में हैंडलूम और ऊन आधारित उद्योग विकसित किए जा सकते हैं.

अलग से हो पहाड़ी जिलों की GDP मॉनिटरिंग: जानकारों का मानना है कि पहाड़ और मैदान के आर्थिक अंतर को केवल राज्य की कुल GDP बढ़ाकर खत्म नहीं किया जा सकता. इसके लिए यह देखना होगा कि हर जिले की अर्थव्यवस्था कितनी तेजी से बढ़ रही है और उस विकास से स्थानीय लोगों को कितना रोजगार और आय मिल रही है. यही वजह है कि पर्वतीय जिलों के लिए अलग आर्थिक मॉनिटरिंग सिस्टम और जिलावार GDP की नियमित समीक्षा की जरूरत बताई जा रही है. यदि स्थानीय संसाधन, MSME, ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे, IT और सर्विस सेक्टर को एक साथ जोड़कर पहाड़ी अर्थव्यवस्था का नया मॉडल तैयार किया जाता है, तो उत्तराखंड की बढ़ती GSDP का लाभ केवल मैदानी जिलों तक सीमित रहने के बजाय पहाड़ तक भी पहुंच सकता है. आखिरकार उत्तराखंड के सामने चुनौती सिर्फ GDP बढ़ाने की नहीं, बल्कि GDP के भीतर पहाड़ की हिस्सेदारी बढ़ाने की है.
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