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हिमाचल के इस गांव में बेटी के जन्म पर मनाते हैं ऐसा उत्सव, तीन दिन तक पूरा गांव मनाता है जश्न

बेटियों के नाम पर गोची उत्सव मनाया जाता है. ये उत्सव तीन दिन तक चलता है.

लाहौल स्पीति में गोची उत्सव शुरू
लाहौल स्पीति में गोची उत्सव शुरू (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : February 15, 2026 at 7:40 PM IST

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कुल्लू: बालिका संरक्षण के लिए बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ, बेटी है अनमोल जैसी मुहिम सरकारों की ओर से चलाई गई हैं. बेटों से परिवार और वंश को आगे बढ़ाने की रूढ़िवादी सोच आज भी लोगों के साथ चिपकी है. हाल ही में हरियाणा के रोहतक में एक महिला ने बेटी की चाह में 12वीं बार बेटी को जन्म दिया, क्योंकि परिवार को बेटा चाहिए था बेटी नहीं. आज भी आधुनिक समाज में बेटियों को सम्मान मिलना काफी मुश्किल है. कई घरों में बेटियों को बेटों से अधिक अधिकार मिलते हैं. बेटी के पैदा होने पर सन्नाटा और बेटे के जन्म पर जश्न होता है.

इसके विपरित हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल स्पीति में बेटियों के नाम पर एक उत्सव मनाया जाता है. ये उत्सव तीन दिन तक चलता है. इसे गोची उत्सव के नाम से जाना जाता है. लाहौल स्पीति जिले की गाहर घाटी में प्यूकर गांव के ग्रामीण बेटी पैदा होने पर गोची उत्सव का आयोजन करते हैं. बेटी वाले घर में खुशियां मनाई जाती हैं. इतना ही नहीं अपने देवी देवताओं की पूजा अर्चना करने के बाद बेटियों के अभिभावक पूरे गांव को घर आने का न्योता देते हैं और पारम्परिक खान पान से उनका भव्य स्वागत भी करते हैं. शनिवार शाम से लाहौल के प्यूकर गांव में गोची उत्सव की शुरुआत हुई.

उत्सव में पूरा गांव होता है शामिल
उत्सव में पूरा गांव होता है शामिल (ETV Bharat)

पहले दिन होती है देवता की पूजा

गोची उत्सव के पहले दिन कई फीट बर्फ के बीच ग्रामीणों ने अपने इष्ट देवता की पूजा अर्चना की. गोची के पहले दिन लाहौल घाटी के आराध्य देवता राजा घेपन के भाई तंगजर की पूजा ग्रामीण करते हैं. इस दौरान जिन परिवारों में बेटियों का जन्म हुआ हो वो पूरे गांव, रिश्तेदारों को घर आने का निमंत्रण भेजते हैं. अगले दिन गांव में तीर कमान का खेल खेला जाता है. इस दौरान स्थानीय ग्रामीण लाहौल का पारंपरिक नृत्य कर जश्न मनाते हैं.

नाच गाकर खुशी मनाते हैं लोग
नाच गाकर खुशी मनाते हैं लोग (ETV Bharat)

दो बेटियों का हुआ गांव में जन्म

प्यूकर गांव में इस साल दो बेटियां तंजीन सुपुत्री सुशील एवं वर्षा और समस्तन वंगमो ने सुपुत्री अभिषेक एवं किरण के घर में जन्म लिया है. गांव में इस साल ये दोनों परिवार गोची कार्यक्रम का आयोजन करेंगे. दोनों ही परिवारों के साथ मिलकर पूरा गांव मिलकर गोची उत्सव मना रहा है. बेटियों के पिता सुशील और अभिषेक ने बताया कि इस साल गांव में दो घरों में बेटियों का जन्म हुआ है. ऐसे में दोनों परिवार अपने घर में गोची उत्सव का आयोजन कर रहे हैं.धूमधाम के साथ ग्रामीण इस उत्सव में भाग ले रहे हैं. गोची बेटियों को सम्मान और बेटों के बराबर समानता दर्शाने के लिए मनाया जाता है. गांव में कभी बेटियों के साथ भेदभाव नहीं किया जाा है. स्थानीय देवी देवताओं का आशीर्वाद भी गोची उत्सव के दौरान लिया जाता है.

गांव में इस बार हुआ दो बेटियों का जन्म
गांव में इस बार हुआ दो बेटियों का जन्म (ETV Bharat)

लाहौल स्पीति में महिलाओं की भागीदारी अधिक

रि इमेजिन संस्था के अध्यक्ष क्रिस ठाकुर ने बताया कि 'लाहौल स्पीति के जनजीवन में महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक है. घाटी में चाहे कृषि कार्य हो या सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेना हो. महिलाएं सबसे आगे रहती हैं और घाटी के हर कार्यक्रम को सफल बनाने में अपनी भूमिका निभाती हैं. लाहौल स्पीति में कभी भी बेटियों या महिलाओं का अपमान नहीं किया जाता है. बेटों के साथ साथ यहां बेटियां को भी बराबर सम्मान दिया जाता है.'

बेटियों का परिवार गांव का देता है खाने की दावत
बेटियों का परिवार गांव का देता है खाने की दावत (ETV Bharat)

पूरे लाहौल स्पीति में मनाया जाता है गोची

गोची सिर्फ प्यूकर गांव में ही नहीं मनाया जाता है. इसे पूरी लाहौल स्पीति घाटी और कुल्लू के कुछ इलाकों में मनाया जाता है, लेकिन यहां बेटा पैदा होने पर गोची उत्सव मनाया जाता है, लेकिन प्यूकर गांव में बेटियों के पैदा होने पर गोची मनाया जाता है. इस जश्न में पूरे गांव वालों को आमंत्रित किया जाता है और इस आयोजन में पारंपरिक व्यंजनों के साथ स्थानीय लोग नाचते गाते हुए देवता तंगजर की आराधना करते हैं. प्यूकर गांव में बेटियों के लिए गोची मनाने की कहानी दिलचस्प है.

तीन दिन तक चलता है उत्सव
तीन दिन तक चलता है उत्सव (ETV Bharat)

देवता तंगजार ने दिया था आशीर्वाद

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार बेटियों के सम्मान के पीछे मान्यता है कि कई दशकों पहले प्यूकर गांव में दंपतियों को संतान पैदा नहीं हो रही थी. ग्रामीणों ने देवता तंगजर की विशेष पूजा अर्चना की. इस दौरान निर्णय लिया गया कि अगर गांव में बेटा या बेटी कोई भी पैदा होती है तो उसके सम्मान में विशेष रूप से उत्सव का आयोजन किया जाएगा. देवता तंगजर के आशीर्वाद से यहां पर निसंतान दंपतियों को संतान की प्राप्ति हुई, जिसके बाद से पिछले कई सौ सालों से इस परंपरा का निर्वहन आज भी किया जाता है. इस परंपरा को ग्रामीण आज भी निभा रहे हैं और देवता से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद लिया जाता है. इस गांव में बेटियों के पैदा होने पर गोची उत्सव का आयोजन किया जाता है.

लाहौल घाटी के निवासी मंगल चंद का कहना है कि 'घाटी में कई ऐसे रीति रिवाज है जो महिला समाज को सम्मान देते हैं. आज भी महिलाओं को घाटी में पूरा सम्मान दिया जाता है, क्योंकि महिलाएं लाहौल स्पीति के हर कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेती हैं. यहां बेटा और बेटी में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है. प्यूकर गांव के अलावा भी अन्य इलाकों में बेटियों को बेटों के समान ही समझा जाता है.'

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