यहां टीचर भी बच्चे, स्टूडेंट्स भी बच्चे.. बिहार का अनोखा स्कूल
नालंदा के बिहार शरीफ में छात्र खुद शिक्षक बन अपनी पॉकेट मनी से सैकड़ों गरीब बच्चों का भविष्य संवार कर मिसाल पेश कर रहे हैं.

Published : February 26, 2026 at 7:24 AM IST
रिपोर्ट: महमूद आलम
नालंदा: बिहार के नालंदा में एक ऐसा स्कूल है, जो साक्षर भारत के सपने को साकार करने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है. इस स्कूल में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों बच्चे ही हैं. स्कूल को खोलने की कहानी में भी बहुत अनोखी है. गरीब बच्चों के लिए चल रहे इस स्कूल में पढ़ने वाली छात्रा नुसरत खातून आज इसी स्कूल में टीचर भी हैं. नुसरत बताती हैं कि कैसे पॉकेट मनी पाठशाला ने उनके सपनों को पंख दिया है.
पिता की मौत के बाद भी जारी रखी पढ़ाई: नुसरत खातून बताती हैं कि उनके पिता की मौत कोरोनाकाल के दौरान दिल्ली में हो गई थी. तब मुझे लगा था कि अब पढ़ाई छूट जाएगी, लेकिन इस स्कूल ने सहारा दिया. यहां हर विषय की पढ़ाई होती है. जब सबने साथ छोड़ दिया तब सर ने मेरा साथ दिया था. यही कारण है कि मैं पढ़ सकी और अब मैं यहां बच्चों को पढ़ाती हूं.
"मुझे बच्चों को पढ़ाने के लिए सर 1 हजार रुपये देते हैं. यहां फ्री में पढ़ाया जाता है. मैं मैट्रिक की परीक्षा सेकेंड डीविजन से पास की थी. तब सर ने मुझे एक बड़ा मोबाइल पुरस्कार के तौर पर दिया था. यहां शाम को ट्यूशन दिया जाता है. मेरे पापा नहीं है. घर पर अम्मी और हम दो बहन हैं. ऐसे में सर ने मुझे सैलरी देनी शुरू की, ताकि मेरा घर चल सके. मेरी बहन इसी स्कूल में कक्षा 9 में पढ़ती है."- नुसरत खातून, छात्रा व शिक्षिका
अंजली के पिता करते हैं बढ़ई का काम: अंजली क्लास 4 की छात्रा है. जो पढ़कर देश की सेवा करने के लिए फौज में जाना चाहती है. उसके पिता घूम घूमकर बढ़ई, का काम करते हैं. वह 4 भाई बहनों में सबसे छोटी है. वह अपनी सहेलियों के साथ नियमित स्कूल आती है और पढ़ाई में बेहद तेज है. यह नन्हीं बच्ची पिछले 6 साल से यहां आ रही है.

"अंजली दीदी बोली कि पढ़ने आओ तो आ रहे हैं. पैसा नहीं लगता है. कॉपी-किताब यहीं मिलता है. पापा लकड़ी का काम घर-घर जाकर करते हैं. बड़े होकर फौजी बनना चाहती हूं."- अंजली, छात्रा
कहां है पॉकेट मनी से संचालित होने वाली पाठशाला: इस पाठशाला में पढ़ने वाले बच्चों की आंखों में अब बड़े सपने पल रहे हैं. झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीब मां-बाप के बच्चों को भी बेहतर शिक्षा देना इस स्कूल का मकसद है. यह पाठशाला नालंदा ज़िला मुख्यालय बिहार शरीफ शहर के खंदकपर स्थित एक निजी विद्यालय के सहयोग से चला रहा है.

टीचर भी बच्चे, स्टूडेंट्स भी बच्चे: इस अनोखी पाठशाला में शिक्षक भी बच्चे और विद्यार्थी भी बच्चे हैं. यहां स्कूली बच्चे अपने आसपास मोहल्ले के ग़रीब व असहाय परिवार के बच्चों को खोजकर लाते हैं और स्कूल के सीनियर छात्र छुट्टी के बाद डेढ़ से दो घंटे पढ़ाते हैं. यहां की पाठशाला में वैसे बच्चों को शामिल किया गया है, जो किसी कारण पढ़ाई से दूर रह गए हैं. अब उन्हें रोजाना पढ़ाते हैं. जरूरत पड़ने पर छात्र अपनी पुरानी किताबें, कॉपियां और बैग भी दे देते हैं.

स्कूल खोलने की कहानी: इस बदलाव की कहानी तब शुरू हुई जब स्कूल जाने वाले बच्चों की नजर सड़क पर खेल रहे, आपस में झगड़ रहे और गाली-गलौज कर रहे जरूरतमंद बच्चों पर पड़ी. चांदनी और प्रियांशी नाम की दो छात्राओं के मन में सबसे पहले यह विचार आया कि क्यों न इन बच्चों को भी शिक्षित किया जाए.

दिव्यांगता नहीं आई आड़े : चांदनी, खुद दिव्यांग है, ने हिम्मत नहीं हारी और दलित बस्तियों में घूम-घूमकर अभिभावकों को समझाया. शुरुआत में सिर्फ दर्जन भर छात्र जुड़े थे, लेकिन आज 100 सीनियर छात्रों का एक बड़ा ग्रुप (इंट्रैक्ट क्लब) बन चुका है जो गरीब और असहाय परिवार के बच्चों को तलाश कर लाते हैं.

स्कूल में तीन साल से पढ़ा रही है शिप्रा: इस स्कूल में तीन-चार साल से पढ़ाने वाली शिप्रा बताती हैं कि मैं क्लास 9 से पढ़ा रही हूं. बच्चों को मैंने तीन-चार साल का समय दिया है. कई गरीब बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं. हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार है. बच्चों को इतना शिक्षित करने की कोशिश है कि वह अपने बारे में वह सही-गलत की पहचान कर सकें.
"रोटरी क्लब की मदद से हमलोग बच्चों को पढ़ाते हैं. कुछ बच्चे सरकारी स्कूल जाते थे, लेकिन पढ़ नहीं पाते थे. कुछ बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे. ऐसे बच्चों को हम अपने स्कूल में पढ़ाते हैं. घर-घर जाकर हमने माता-पिता को समझाया कि अपने बच्चों को पढ़ने के लिए हमारे स्कूल में भेजें. रोड में खेलने और रहने वाले बच्चों को हमलोग लेकर आते थे. अब हमारे स्कूल में 800 बच्चे पढ़ते हैं. बच्चों का पढ़ाई के प्रति जुड़ाव पैदा करने के लिए किताब-कॉपी देते हैं. साथ ही त्योहारों में पटाखा, मिठाई सब देते हैं."- शिप्रा, छात्रा

निजी स्कूल के प्रागंण में चलती है पाठशाला: जिस निजी स्कूल के प्रांगण में गरीबों का यह अनोखा स्कूल चल रहा है, वहां के प्राचार्य बाबू टी थॉमस बताते हैं कि एक मीट में गया था, जहां पढ़ाई से वंचित बच्चों की चर्चा चल रही थी. वहां से वापस लौटने के बाद स्कूल के कुछ बच्चों ने इसपर चर्चा की तो उन छात्रों ने हामी भरी और इसकी शुरुआत स्कूल से छुट्टी के बाद शुरू होती है.
मुफ्त में पढ़ाई: शिक्षा की दूसरी पाली में सीनियर छात्र गुरु और झुग्गी-झोपड़ी के बच्चे शिष्य बनते हैं. 2016 में 30 बच्चों से शुरू हुआ सफर 2026 तक अब 800 के क़रीब पहुंच चुका है. सड़क पर खेलने वाले बच्चे अब डॉक्टर और पुलिस बनने का सपना देख रहे हैं. यहां वर्ग 1 से 10वीं तक की पढ़ाई मुफ्त में होती है.

"बच्चों के पास जज्बा तो था, लेकिन पढ़ाने के लिए जगह नहीं थी. जब उन्होंने अपनी यह समस्या मुझे बतायी. मैं बच्चों की इस नेक सोच से काफी प्रभावित हुआ. मैंने स्कूल की छुट्टी के बाद शाम 3 से 5 बजे तक स्कूल परिसर के इस्तेमाल की अनुमति दे दी. हमने 'रोटरी क्लब' के साथ मिलकर लक्ष्य रखा है कि कोई भी बच्चा निरक्षर न रहे. हम इन बच्चों को न केवल बेसिक शिक्षा देते हैं, बल्कि उन्हें सरकारी स्कूलों में नामांकित भी करवाते हैं ताकि वे मुख्यधारा से जुड़ सकें."- बाबू टी थॉमस, निजी स्कूल के प्रिंसिपल
पॉकेट मनी और पुरानी किताबें देकर मदद : शुरुआत में छात्र अपनी पॉकेट मनी और पुरानी किताबें देकर इन बच्चों की मदद करते थे. आज यह कारवां इतना बड़ा हो चुका है कि शहर के मशहूर चिकित्सक, व्यवसायी और सामाजिक कार्यकर्ता यहां आकर अपना जन्मदिन और शादी की सालगिरह मनाते हैं. इस दौरान बच्चों को नए कपड़े, बैग, जूते और स्टेशनरी बांटी जाती है.

गरीब परिवार के बच्चों को खोजते हैं वॉलिंटियर्स: प्राचार्य बाबू टी थॉमस ने आगे यह भी कहा कि 8वीं कक्षा के बाद लड़कियों की पढ़ाई जारी रखना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि अक्सर अभिभावक उन्हें काम पर लगा देते हैं. ऐसे में उनके वॉलिंटियर्स घर-घर जाकर काउंसलिंग करते हैं. उन्होंने वादा किया है कि जब तक इन बच्चों को छोटा-मोटा रोजगार नहीं मिल जाता, तब तक वे इनका साथ नहीं छोड़ेंगे.
ज्यादातर बच्चों के माता-पिता मजदूर: फिलहाल 12वीं की मुक्ता रानी और 9वीं के करण जैसे छात्र नियमित रूप से इन बच्चों को पढ़ा रहे हैं और समाज के प्रति अपनी पर्सनल सोशल रिस्पांसिबिलिटी निभा रहे हैं. ईटीवी भारत की टीम ने उन गरीब असहाय परिवार से मिलकर बात करनी की कोशिश की, लेकिन घर की महिलाएं दूसरे के घर काम पर निकली हुई थी और पुरुष मजदूरी के लिए घर से बाहर थे.

अभिभावकों ने की तारीफ: ईटीवी की टीम को दो लोग मिले, लेकिन कैमरे पर कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया. एक छात्रा की नंदनी की मां ने बातचीत करते हुए स्कूल की पहल की जमकर तारीफ की.
"बेटी पढ़ लिखकर कुछ बन जाएगी तो बहुत खुशी होगी. हम अपने बच्चों को पढ़ा सके, उतना पैसा नहीं है. इतना पढ़ ले कि बैठकर खाए और अपना भविष्य बना सके. समाज की मुख्य धारा में जुड़े."- सुलोचना देवी, छात्रा नंदनी की मां

यह अनोखी पाठशाला साबित करती है कि यदि जज्बा हो और बड़ों का मार्गदर्शन बच्चे भी कर सकते हैं. संसाधनों की कमी कभी भी बदलाव के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती है. बाधाओं को चीरते हुए आगे बढ़ने वाले ये गरीब बच्चे कल के सुनहरे भविष्य के सपने को साकार करने में लगे हैं.
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