बिहार के शिक्षक का म्यूजिकल फॉर्मूला हिट... रमजान के रोजे में भी नहीं छोड़ा बच्चों का साथ
बिहार के शिक्षक की अनोखी पहल की सभी सराहना कर रहे. रोजेदार इमरोज अली कैसे थकान को दरकिनार कर बच्चों का भविष्य संवार रहे जानें.

Published : February 27, 2026 at 5:25 PM IST
रिपोर्ट: सरताज अहमद
गया: बिहार के सरकारी स्कूलों में बच्चों की कम उपस्थिति को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं और इसे दुरुस्त करने के प्रयास भी किए जाते हैं. 'स्कूल चले हम अभियान' को सफल बनाने के लिए गयाजी के एक सरकारी शिक्षक ने अनोखी पहल की है. शिक्षक इमरोज अली, रमजान के पाक महीने में रोजा रखने के बावजूद अपने अभियान को बिना ब्रेक लगाए प्रतिदिन गांव में घूमते हैं. उनकी कोशिशों का नतीजा है कि आज स्कूल में बच्चों की उपस्थिति बढ़ी है.
म्यूजिक से सोच बदलने का अनोखा प्रयास: इमरोज अली आमस प्रखंड के कोरमथु गांव के प्राथमिक विद्यालय महादलित टोला के शिक्षक हैं. कोरमथु गांव में 250 घरों से ज्यादा की आबादी है, जिसमें तीन अलग-अलग प्राथमिक विद्यालय हैं. इनमें एक प्राथमिक विद्यालय महादलित टोला में भी स्थित है.
महादलित टोले में 80 घर: महादलित टोला में लगभग 80 घर से अधिक है. पहले अभिभावक अपने बच्चों को स्कूल भेजने में गंभीरता नहीं दिखाते थे, लेकिन इमरोज ने म्यूजिक का सहारा लेते हुए सभी की सोच को बदलने का सफल प्रयास किया है. गुरुजी का म्यूजिकल फॉर्मला हिट हो गया है.
138 छात्रों का नामांकन: प्राथमिक विद्यालय कोरमथु में लगभग 138 छात्रों का नामांकन है, जबकि 5 शिक्षक हैं. पहले इस स्कूल में 30 से 40 की संख्या में छात्र-छात्राएं प्रतिदिन पहुंचते थे. दो साल पहले स्कूल में 100 छात्रों का नामांकन भी नहीं था, लेकिन अब इस स्कूल में पढ़ाई की सूरत बदली है.
नामांकन और उपस्थिति दोनों बढ़ी: नामांकन में भी बढ़ोतरी हुई और प्रतिदिन छात्रों की उपस्थिति भी बढ़ी है. यहां के हेडमास्टर समेत अन्य शिक्षकों का मानना है कि इमरोज अली के प्रयास और संघर्षों के कारण स्कूल में छात्रों में पढ़ाई की गतिविधियों में बदलाव आया है.

म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट से सजा: हेडमास्टर सुरेश चौधरी के अनुसार शिक्षक इमरोज अली म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाकर स्कूल नहीं आने वाले छात्रों को सजा देते हैं और सजा का नाम रखा गया है स्वागत सजा. संगीत के जरिए बच्चों और अभिभावकों को एहसास दिलाया जाता है कि स्कूल आना जरूरी है.
अनूठी पहल से छात्रों का ना सिर्फ मनोरंजन हो जाता है बल्कि अभिभावकों में जागरूकता भी बढ़ती है. कई बार तो अभिभावक ही स्कूल पहुंच जाते हैं और कहते हैं कि सर उनका बच्चा आज स्कूल नहीं आया है. इमरोज अली सर को भेज देते.
"इमरोज अली रोजा रखकर भी बच्चों को स्कूल तक लाने में पीछे नहीं हट रहे हैं. वो सुबह स्कूल आते हैं और सबसे पहले अपने स्कूली कार्य को करते हैं. फिर वो बच्चों के धावा दल से रिपोर्ट लेते हैं कि आज की सूची में कौन-कौन छात्र हैं जो स्कूल नहीं आये हैं ? फिर उसे लाने के लिए म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट तैयार करते हैं और धावा दल के साथ जाते हैं, चूंकि सभी बच्चों का आवास हाफ किलोमीटर के अंदर है इसलिए उन्हें लाने का काम जल्दी हो जाता है."- सुरेश चौधरी, हेडमास्टर

छात्रों में उत्साह: विकास कुमार 5 वीं क्लास के छात्र हैं, जो बच्चे स्कूल नहीं आते हैं, उन्हें लाने के लिए गुरुजी की बनाई हुई टीम में वो फरवरी महीने के मॉनिटर हैं. मॉनिटर हर महीने बदलता है. इमरोज अली टीम के साथ जाकर खुद छात्रों को लाते हैं.
"मेरी अब तक की शिक्षा की वजह से माता-पिता ने शराब बनाना भी छोड़ दिया है. मेरी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं. पढ़कर पुलिस अधिकारी बनना मेरा लक्ष्य है और मैं एक दिन अपना लक्ष्य जरूर पूरा करूंगा. बस शिक्षकों के साथ माता-पिता का आशीर्वाद प्राप्त होने के साथ मेरी आगे भी इसी तरह मेहनत जारी रहे."- विकास कुमार, छात्र
सजा से खिंचे चले आते हैं बच्चे : एक अभिभावक राजेंद्र मंडल कहते हैं कि गुरु जी की सजा भी बढ़िया है. छोटी उम्र से ही बच्चों को वह उनकी जिम्मेदारी का एहसास दिलाना शुरू कर देते हैं. इनका बड़ा मैसेज है कि सिर्फ बच्चों को पढ़ाई के लिए मारना पीटना ही एक मात्र जरिया नहीं होता, बल्कि प्यार से उनके अंदाज में भी पढ़ाई के लिए प्रेरित किया जा सकता है. बच्चों को इस अंदाज में बुलाना और उन्हें सजा का एहसास स्वागत के रूप में कराना वाकई काबिल-ए-तारीफ है.

अभिभावक भी झूम उठते हैं: इमरोज अली जब गांव मोहल्ले की गलियों में निकलते हैं तो उन्हें देखने के लिए पुरुष महिलाओं की भीड़ लग जाती है. घरों के दरवाजे खुलने लगते हैं और फिर एक अलग सुंदर दृश्य देखने को मिलता है. बच्चे खुद ही गुरु जी के पास आते हैं और फिर उनके पांव को छूकर शांति से खड़े हो जाते हैं. तभी दूसरे बच्चे जिनके हाथों में मंजीरा, झुनझुना, बांसुरी और अन्य म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट होते हैं वह बजाने लगते हैं.
गुरुजी इमरोज अली पहले उस बच्चे से स्कूल नहीं आने की वजह पूछते हैं. जब वह कोई संतुष्ट भरा जवाब नहीं देता है तो माता-पिता से पूछते हैं. फिर वह दूसरे बच्चों को कहते हैं बजाओ जी बजाओ, जिसे देखकर आप भी कहेंगे वह गुरुजी वाह.
अभिभावक बजाने लगते हैं ढोलक:जब गुरुजी ढोल बजाते हैं तो अभिभावक भी खुद को नहीं रोक पाते हैं और वह शिक्षक से ढोलक लेकर खुद ही थाप लगाने लगते हैं. ये नजारा बिल्कुल अलग होता है. बच्चे फिर वहां से सीधे उस बच्चे को लेकर स्कूल चले जाते हैं. स्कूल में पहुंच कर वह उस बच्चे को मंजीरा देते हैं और उस से बजवाते हैं. वह उस बच्चे की एक तरह से प्यारी सी सजा होती है, खास बात ये है कि इस कार्य से किसी को बुरा नहीं लगता है बल्कि सभी तारीफ करते हैं.

धावा दल बनाकर होता है कार्य: इमरोज अली कहते हैं कि जब वह स्कूल आए थे, तब बच्चों की उपस्थिति कम थी. पहले म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट नहीं भी था. स्कूल में उपस्थिति बढ़ाने के लिए अन्य शिक्षक के साथ वह घर घर जाते थे लेकिन जब स्कूल को शिक्षा विभाग की ओर से म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट मिला तो नए आइडिया के तहत पहले बच्चों को बजाने के लिए प्रशिक्षण दिया गया और फिर उन बच्चों में 15 बच्चों का एक धावा दल बनाया गया.
"धावा दल का कार्य होता है कि जब मैं सुबह जब स्कूल पहुंचता हूं तो पहले उन छात्रों की लिस्ट बनाते हैं जो उस दिन स्कूल नहीं आते, फिर सूची मुझे दी जाती है. अगर संख्या दो तीन में हो तो बच्चे ही उस छात्र को लाने जाते हैं. अगर संख्या अधिक होती है तो फिर मैं भी साथ जाता हूं."- इमरोज अली, शिक्षक
सर के कारण आता हूं स्कूल: क्लास 5 के ही विराज कुमार कहते हैं पहले स्कूल में उसकी उपस्थिति कम हुआ करती थी, क्योंकि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. वह छोटी सी उम्र में काम करता था या फिर खेल में अपना वक्त बर्बाद करता था, लेकिन जब से शिक्षक इमरोज अली ने उन्हें प्रेरित किया तब से वह खुद भी स्कूल आता है.
"जिस दिन आने का मन नहीं करता था, तब मां और पिता स्कूल भेजते थे. अब स्कूल आने में अच्छा लगता है. यहां खेलने के लिए भी अलग से व्यवस्था मिलती है."- विराज कुमार, छात्र
"शिक्षक इमरोज अली का अंदाज बिल्कुल निराला है. वह गांव में जाकर ढोलक, हारमोनियम, झाल, मंजीरा, बांसुरी बजाते हैं. उनके साथ छात्रों की पूरी मंडली होती है.यह उस गांव के टोले की हालत है जहां महादलित की आबादी ज्यादा है. सभी जानते हैं कि हमारे परिवार समाज के बच्चे आज भी पढ़ाई में पीछे हैं. ऐसे में अगर इस तरह की मुहिम चलाई जाएगी तो इसका असर भी होगा और हम लोगों को असर देखने को मिला है."- आदित्य, ग्रामीण

शुरू में हुई कठिनाइयां: शिक्षक इमरोज अली बताते हैं कि वह शुरू में अपने सहयोगी शिक्षकों के साथ छात्रों के घर जाते थे , लेकिन अब म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट लेकर जाते हैं. शुरू में काफी कठिनाई भी हुई. ये कठिनाई होनी भी लाजमी थी क्योंकि यह स्कूल महादलित टोले में है.यहां पहले लोगों में शिक्षा को लेकर जागरूकता नहीं थी. शुरू में तो माता-पिता हमें बुरा भला भी कहते थे लेकिन अब वही हमारा और हमारे छात्रों का स्वागत करते हैं.
छात्र खेल में भी अच्छे हैं : इमरोज अली कहते हैं कि शिक्षा के साथ साथ डिफरेंट तरह के खेलों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, इसका परिणाम यह है कि यहां के कम उम्र के बच्चे खेल में अच्छी महारत हासिल कर रहे हैं. प्रखंड स्तरीय सरकारी खेलकूद मुकाबले में वह अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं.
"आगे चलकर जब यह हाई स्कूल में जाएंगे तो यह अच्छे खिलाड़ी बनकर उभरेंगे. सारा दारोमदार प्राथमिक विद्यालय से ही होता है. अगर यहां अच्छी शिक्षा के साथ बच्चों में पढ़ाई और खेल को लेकर जागरूकता हो गई तब छात्र आगे चलकर अपने इस आदत को बरकरार रखते हैं. इसलिए हमारी जिम्मेदारी है कि बच्चों को हर तरह से यहां तैयार किया जाए."- इमरोज अली, शिक्षक
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