कितना खतरनाक है ब्रेन मलेरिया? पोटका में चार की हो चुकी है मौत, डॉक्टर ने बताए बचाव के तरीके
पूर्वी सिंहभूम में ब्रेन मलेरिया से चार बच्चों की मौत हो गई है. इसके पीछे की क्या वजहें हैं, इसे लेकर उपेंद्र कुमार की रिपोर्ट.

Published : June 29, 2026 at 5:28 PM IST
रांची: पूर्वी सिंहभूम के पोटका में मलेरिया के सबसे खतरनाक रूप मलेरिया PF के बढ़ते मामले ने झारखंड के स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है. चिंता की बात यह भी है कि पिछले एक पखवाड़े में ब्रेन मलेरिया की वजह से पोटका में जहां 04 लोगों की मौत की खबर है. वहीं 17 संक्रमित मरीज मिले हैं. हालांकि, स्वास्थ्य मुख्यालय अभी मलेरिया से 02 लोगों की मौत की पुष्टि कर रहा है. जो मलेरिया संक्रमित मामले मिले हैं, उसमें से अधिकांश मरीज Plasmodium Falciparum (PF) संक्रमण से पीड़ित बताए जा रहे हैं, जिसे मलेरिया का सबसे गंभीर प्रकार माना जाता है.
झारखंड वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल के स्टेट नोडल अधिकारी डॉ बीके सिंह ने बताया कि पूर्वी सिंहभूम जिले की टीम के साथ रांची से गयी विशेष टीम प्रभावित इलाकों में कैंप की हुई है. बड़े पैमाने पर स्क्रीनिंग की जा रही है ताकि मलेरिया पीड़ित की पहचान कर तत्काल उनका इलाज शुरू किया जा सके. इसके साथ पोटका इलाके के करीब नौ प्रभावित गांव में एंटी लारवल दवाओं का छिड़काव किया जा रहा है.
90% मरीज प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम से संक्रमित
डॉ बीके सिंह ने बताया कि मलेरिया को काबू करने के लिए स्वास्थ्य महकमे ने कई एहतियातन कदम उठाते हुए सभी जिलों के लिए भी एडवाइजरी जारी की है. उन्होंने बताया कि पूर्वी सिंहभूम के पोटका इलाके में 874 लोगों की जांच में 17 मलेरिया पॉजिटिव मिलने की पुष्टि हुई है, जिसमें 90% लोग मलेरिया के खतरनाक प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम(PF) परजीवी से संक्रमित मिले हैं.
उन्होंने बताया कि पोटका के कस्तूरबा गांधी विद्यालय की 04 और छात्राएं मलेरिया पॉजिटिव पायी गयी हैं. उन्होंने बताया कि पोटका में ब्रेन मलेरिया से एक नौ माह की बच्ची और एक 13 वर्ष की छात्रा की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि दो की मौत किस वजह से हुई है, इसकी जानकारी ली जा रही है. प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य विभाग की टीम लगातार निगरानी कर रही है. मरीजों की पहचान, जांच और उपचार के लिए मेडिकल टीमों को सक्रिय किया गया है. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को जागरूक करने और मच्छरजनित रोगों से बचाव के उपायों की जानकारी भी दी जा रही है.
प्लाज्मोडियम फैलसिपेरम मलेरिया का सबसे खतरनाक रूप
रांची के प्रख्यात इंटरनल मेडिसीन विशेषज्ञ डॉ हिमालय झा के अनुसार, प्लाज्मोडियम फैलसिपेरम (Plasmodium Falciparum) मलेरिया का सबसे खतरनाक रूप होता है. ब्रेन मलेरिया के 90% मामले के लिए PF ही जिम्मेदार होता है. उन्होंने बताया कि सामान्य मलेरिया की तुलना में यह अधिक खतरनाक होता है और यदि समय रहते इलाज न मिले तो यह सेरेब्रल या ब्रेन मलेरिया का रूप ले सकता है. उन्होंने बताया कि इस स्थिति में संक्रमण मस्तिष्क की रक्त वाहिकाओं को प्रभावित करने लगता है, जिससे मरीज की स्थिति गंभीर यहां तक कि मौत भी हो सकती है.

प्लाज्मोडियम फैलसिपेरम के कारण होता है ब्रेन मलेरिया
ब्रेन या सेरेब्रल मलेरिया मलेरिया का गंभीर रूप होता है, जो मुख्य रूप से Plasmodium Falciparum परजीवी के कारण होता है, यह बीमारी संक्रमित Anopheles मच्छर के काटने से फैलती है. संक्रमण बढ़ने पर मरीज के मस्तिष्क पर असर पड़ता है, जिससे बेहोशी, दौरे पड़ना, मानसिक भ्रम और कोमा जैसी स्थिति तक उत्पन्न हो जाती है.
डॉ हिमालय झा ने कहा कि मलेरिया के संक्रमण होने पर तेज बुखार और कंपकंपी, कभी बुखार का लगातार बनें रहना तो कभी एक अंतराल पर आना, लगातार सिर दर्द, उल्टी या अत्यधिक कमजोरी और बीमारी के बढ़ने पर बेहोशी या सुस्ती, दौरे पड़ना बच्चों में असामान्य व्यवहार के लक्षण दिखाई देते हैं. कई बार पेशाब का रंग भी काला होता है.
डॉ हिमालय झा बताते हैं कि ऐसा नहीं है कि हर PF संक्रमित को ब्रेन मलेरिया हो जाएगा. उन्होंने बताया कि जिन लोगों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, उसमें ब्रेन मलेरिया होने का खतरा अधिक होता है. ऐसे में बच्चों और बुजुर्ग के साथ-साथ डायबिटीज, किडनी, लिवर की बीमारियों से जूझ रहे लोगों को खतरा ज्यादा होता है.
लक्षणों को ना करें नजरअंदाज
उन्होंने बताया कि किसी भी बुखार को सामान्य वायरल मानकर नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है. बुखार होने पर किसी नीम-हकीम, झोला छाप या मेडिकल स्टोर से दवा लेकर खाना नुकसानदेह हो सकता है. ऐसे में सबसे अच्छा यह है कि बुखार होने पर किसी योग्य डॉक्टर से इलाज-जांच कराएं और दवा लें.
झारखंड में मलेरिया के कई अलग अलग पॉकेट है. घने जंगल, खदानों की वजह से बने गड्ढे में जल जमाव एवं अन्य भौगोलिक वजहों से बरसात के साथ ही झारखंड में मलेरिया और मच्छरजनित बीमारियों के केस बढ़ जाते हैं. मानसून के दौरान जगह-जगह जमा पानी मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है, ग्रामीण क्षेत्रों में खुले गड्ढे, नालियां और जलभराव वाले स्थान मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों की संख्या बढ़ा देते हैं.

डॉ हिमालय झा कहते हैं कि ब्रेन मलेरिया से बचाव के उपाय वहीं सब हैं, जो मच्छरजनित किसी बीमारी से बचाव के हैं. इसके लिए बेहद जरूरी है कि घर के आसपास पानी जमा न होने दें, रात में मच्छरदानी का इस्तेमाल करें, पूरी बांह के कपड़े पहनें, बुखार होने पर तुरंत जांच कराएं, बच्चों-बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान दें.
आंकड़ें बताते हैं कि मई महीने तक ही राज्य में 12,342 मलेरिया संक्रमित हो चुके हैं. उसमें सबसे ज्यादा संक्रमित कोल्हान के दो जिले पश्चिम सिंहभूम में 4,891 मरीज और पूर्वी सिंहभूम से 4,822 संक्रमित मिल चुके हैं, जून महीने का आंकड़ा अभी जारी नहीं किया गया है. उसे अगर जोड़ दें तो आंकड़ा और अधिक ऊपर चला जायेगा. हालांकि, इनमें कितने लोग ब्रेन मलेरिया से पीड़ित हैं, ये स्पष्ट नहीं है.
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