ड्रॉप्सी के कारण पांच लोगों की मौत, 2011 के बाद भारत में पहला मामला, जानें क्या है लक्षण और बचाव के उपाय
पलामू के सिक्का गांव में एक परिवार के पांच सदस्यों की मौत के कारणों का पता चल गया है. नीरज कुमार की रिपोर्ट.

Published : July 4, 2026 at 6:53 PM IST
पलामू: झारखंड के पलामू जिले के एक छोटे से गांव में एक ही परिवार के सदस्यों की अचानक मौत से हड़कंप मचा हुआ है. परिवार के पांच सदस्यों की एक के बाद एक मौत हो गई. जिससे स्थानीय लोगों में दहशत का माहौल है. जब लोगों की मौते होनी शुरू हुई तो आसपास के लोगों को शक हुआ कि कोई रहस्यमयी बीमारी लोगों की जान ले रही है. स्वास्थ्य विभाग भी हरकत में आया और जो बात सामने आई वह और भी डराने वाली थी. मौत की वजह कोई रहस्यमयी बीमारी नहीं, बल्कि 'ड्रॉप्सी' थी, जिसका कारण उनके खाने में इस्तेमाल होने वाला सरसो का तेल था.
यह पूरी घटना पलामू के पड़वा इलाके में स्थित सिक्का गांव में हुई. सिक्का के रहने वाले कुलदीप महतो की मौत 19 जून को हुई. ठीक अगले दिन उनकी बेटी बबीता कुमारी की मौत हो गई. इसके बाद, उनकी दूसरी बेटी इंदु कुमारी की 26 जून को, बहू श्वेता कुमारी की 28 जून को और बेटे नकुल महतो की 29 जून को मौत हो गई. वहीं कुलदीप महतो की पत्नी लाखो देवी, एक और बेटे और एक पोते को इलाज के लिए RIMS में भर्ती कराया गया है. मौत के कारणों के बारे में बताया गया कि परिवार के लोगों का शरीर सूजने लगा था और बाद में उनकी मौत हो गई.
अंधविश्वास में परिवार खा रहा था राख
पांच मौतों के बाद कई तरह की अटकलें लगाई जाने लगीं और लोगों को शक हुआ कि यह कोई रहस्यमयी बीमारी है. मामले की जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग की एक टीम को लगाया गया. शुरुआती जांच से पता चला कि बीमार पड़ने के बाद कुलदीप महतो और उनके पूरे परिवार ने झाड़-फूंक का सहारा लिया था. कुलदीप महतो और उनकी बेटी बबीता कुमारी की मौत के बाद, पूरा परिवार झाड़-फूंक कराने के लिए लेस्लीगंज के पुरनाडीह इलाके में गया था. इस दौरान, वे काफी समय तक राख खाते रहे. स्वास्थ्य विभाग की टीम सिक्का गांव और पुरनाडीह दोनों जगहों पर पहुंची और उस राख के नमूने लिए जिसका परिवार सेवन कर रहा था.
हालांकि, इससे कुछ खास पता नहीं चला. डॉक्टरों को शक हुआ कि यह स्थिति कोई रहस्यमयी बीमारी नहीं, बल्कि ड्रॉप्सी है. इसके बाद, स्वास्थ्य विभाग की टीम ने फूड सेफ्टी विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर जांच के लिए मृतक परिवार के घर से खाने के सैंपल लिए. जब रिपोर्ट सामने आई तो डॉक्टरों का शक यकीन में बदल गया. रांची स्थित स्टेट फूड लेबोरेटरी ने सरसों के तेल में 'आर्गेमोन' के मिले होने की पुष्टि की. स्वास्थ्य विभाग ने आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि कर दी है.

सरसों तेल में मिला था ऑर्गेमोन मैक्सिकाना
बताया गया कि परिवार जो सरसों का तेल इस्तेमाल कर रहा था, उसमें ऑर्गेमोन मैक्सिकाना (Argemone mexicana) पौधे का तेल मिला हुआ था. परिवार लगभग एक महीने से इस तेल का इस्तेमाल कर रहा था, जिसके कारण सबकी मौतें हुईं. पलामू के सिविल सर्जन डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि सिक्का गांव में हुई पांच मौतें किसी रहस्यमयी बीमारी से नहीं, बल्कि एपिडेमिक ड्रॉप्सी से हुई थीं. कुलदीप मेहता का परिवार डेढ़ महीने से ऑर्गेमोन मिला हुआ सरसों का तेल इस्तेमाल कर रहा था.
स्वास्थ्य विभाग ने कुलदीप के घर से सरसों के तेल का सैंपल लिया था और रांची की स्टेट फूड लेबोरेटरी ने उसमें ऑर्गेमोन होने की पुष्टि की. रिपोर्ट के बाद, स्वास्थ्य विभाग ने परिवार और ग्रामीणों से पूछताछ की, जिससे पता चला कि परिवार ने डेढ़ महीने पहले पास के गांव की एक तेल मिल से सरसों का तेल निकलवाया था.
सिविल सर्जन ने बताया कि तेल मिल के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाने और इलाके के लोगों से स्वास्थ्य संबंधी डेटा इकट्ठा करने के लिए एक फूड सेफ्टी टीम को गांव भेजा गया है. अब तक, स्वास्थ्य विभाग ने सिक्का गांव में 195 घरों का सर्वे किया है और 1,378 लोगों के स्वास्थ्य संबधी पूछताछ की है. 56 लोगों के ब्लड सैंपल लिए गए हैं, जिनमें से किसी में भी बीमारी के लक्षण नहीं दिखे.

ड्रॉप्सी का नहीं है कोई खास इलाज
सिविल सर्जन डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि ड्रॉप्सी का कोई खास इलाज नहीं है. लक्षणों के आधार पर इसका इलाज किया जाता है. ड्रॉप्सी कोई संक्रामक बीमारी नहीं है, बल्कि विषाक्त है. यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलती. यह ऑर्गेमोन मिले हुए सरसों के तेल के सेवन से होती है.
ऑर्गेमोन को स्थानीय भाषा में कटैला, सत्यानाशी पीला धतूरा जैसे नामों से जाना जाता है. इसके बीजों को गर्म करके पारंपरिक तरीके से तेल निकाला जाता है और इसका इस्तेमाल पशुओं के इलाज में किया जाता है.
सिविल सर्जन ने बताया कि शुरू से ही इस बीमारी को लेकर शक था. अब लैब टेस्ट से पुष्टि हो गई है कि पूरा परिवार इस बीमारी से प्रभावित है. स्वास्थ्य विभाग अभी इलाके की मॉनिटरिंग कर रहा है और जानकारी इकट्ठा की जा रही है कि कहीं कोई और भी ऑर्गेमोन-मिलावटी सरसों का तेल इस्तेमाल तो नहीं कर रहा है. ग्रामीणों को इस बारे में जागरूक किया जा रहा है.
सिविल सर्जन ने बताया कि प्रभावित परिवार के घर से आटा, अरहर की दाल, सरसों का तेल, वनस्पति तेल और चावल के सैंपल लिए गए थे. परिवार ने पांच लीटर के डब्बे में तेल को रखा हुआ था. शुरू में परिवार ने यह जानकारी नहीं दी थी. RIMS में भी बीमारी की प्रकृति स्पष्ट नहीं थी. वहां की जांच के बाद ड्रॉप्सी की आशंका जाहिर की गई थी.

2011 के बाद से भारत में एपिडेमिक ड्रॉप्सी से पहली मौत
2011 के बाद से भारत में एपिडेमिक ड्रॉप्सी से यह पहली मौत है. 2011 में, पंजाब के शहीद भगत सिंह नगर के फतेहगढ़ इलाके में एक परिवार इस बीमारी का शिकार हुआ था. फतेहगढ़ के मामले की तरह ही, पलामू के पड़वा ब्लॉक के सिक्का गांव के कुलदीप मेहता और उनका परिवार प्रभावित हुआ है.
कुलदीप मेहता की 19 जून को मौत हो गई, उसके बाद 20 जून को उनकी बेटी बबीता कुमारी, 26 जून को बेटी इंदु कुमारी, 28 जून को बहू श्वेता और 29 जून को बेटे नकुल मेहता की मौत हो गई. कुलदीप मेहता की पत्नी लाखो देवी और बेटे सुनील मेहता का अभी RIMS में इलाज चल रहा है.
"भारत में एपिडेमिक ड्रॉप्सी का पता सबसे पहले 1877 में कोलकाता में चला था. 1920 और 1940 के बीच, पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में इस बीमारी की पहचान की गई थी. 1998 में, दिल्ली इलाके में 3,000 लोग इस बीमारी से पीड़ित पाए गए थे और उनमें से 60 लोगों की मौत हो गई थी. इस बीमारी से मौत का आखिरी मामला 2011 में पंजाब के फतेहगढ़ में सामने आया था." – डॉ. अनिल कुमार श्रीवास्तव, सिविल सर्जन, पलामू
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