क्या 'टाइपिंग एरर' जमानत का आधार बन सकता है? सुप्रीम कोर्ट हैरान
अरेस्ट मेमो में टाइपिंग एरर के कारण मिली बेल पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए बड़ी बेंच को मामला भेजने के संकेत दिए.


By Sumit Saxena
Published : July 9, 2026 at 2:56 PM IST
|Updated : July 9, 2026 at 3:02 PM IST
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को संकेत दिया कि वह इस सवाल को एक बड़ी बेंच के पास भेज सकता है कि क्या महज एक टंकण त्रुटि (टाइपिंग की गलती)- जैसे कि अरेस्ट मेमो में गलत कानूनी धारा लिख देना, किसी गिरफ्तारी को अवैध ठहरा सकती है और जमानत का आधार बन सकती है. यह मामला अपने पति की हत्या की आरोपी सोनम रघुवंशी से जुड़ा है.
इस मामले की सुनवाई जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने की. पीठ ने यह भी संकेत दिया कि वह इस बात की बारीकी से जांच करेगी कि क्या मेघालय हाई कोर्ट द्वारा रघुवंशी को इस आधार पर जमानत देना सही था कि उसके अरेस्ट मेमो में टाइपिंग की गलती थी. इससे पहले 3 जुलाई को, जस्टिस एम एम सुंदरेश और जस्टिस शील नागू की एक अन्य पीठ ने रघुवंशी को जमानत देने के हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.
गुरुवार 9 जुलाई को सुनवाई के दौरान, मेघालय सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाया कि क्या किसी अरेस्ट मेमो में महज एक गलत कानूनी धारा का उल्लेख होना- जो कि साफ तौर पर टाइपिंग की एक गलती (टंकण त्रुटि) थी- पति की हत्या जैसे "चौंकाने वाले" और गंभीर मामले में गिरफ्तारी को अवैध घोषित करने और जमानत देने के लिए काफी है.?
मेहता ने दलील दी कि यह गलती पूरी तरह से लिपिकीय थी. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह एक बेहद गंभीर मामला है, जिसमें इस आधार पर जमानत दे दी गई कि गिरफ्तारी के कारण (ग्राउंड्स) नहीं बताए गए थे. मेहता ने आगे कहा कि हालांकि गिरफ्तारी के समय का ऐसा रिकॉर्ड मौजूद है जो दिखाता है कि गिरफ्तारी के कारण बताए गए थे.
इस पर पीठ ने मेहता से कहा कि वे रिकॉर्ड पर यह बात लाएं कि आरोपी को वास्तव में क्या सटीक जानकारी दी गई थी. मेहता ने कहा, "लिखित कारण सौंपे गए हैं. बस बात इतनी है कि एक धारा में टाइपिंग की गलती हो गई है." पीठ ने मेहता से आरोपी को सौंपे गए मूल दस्तावेज़ की साफ फोटोकॉपी लाने को कहा, ताकि यह समझने में मदद मिल सके कि वास्तव में क्या जानकारी दी गई थी.
मेहता ने कहा, "यह (कारण) सौंपा गया था. पूरी प्रक्रिया के दौरान इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि यह नहीं दिया गया. उसने जमानत याचिका दायर की थी और अदालत ने मैरिट के आधार पर पाया कि उसके भागने का खतरा है और जमानत खारिज कर दी. उसी जज ने तीन बार उसकी जमानत याचिका खारिज की थी."
पीठ ने कहा कि यह एक दूसरा पहलू है जिस पर उसे विचार करना है, लेकिन वह पहले यह जांच करेगी कि यह आधार सस्टेनेबल है या नहीं. अगर यह आधार टिकने योग्य नहीं है, तो जमानत का आदेश रद्द हो जाएगा. पीठ ने कहा, "अगर यह टिकने योग्य है, तो हमें अन्य आधारों पर विचार करना होगा." पीठ ने टिप्पणी की कि उसे गिरफ्तारी के समय लिखित में कारण बताने की अनिवार्यता से जुड़े विरोधाभासी फैसलों में सामंजस्य बिठाना होगा.
जस्टिस मिश्रा ने कहा, "हम इस मामले पर विस्तार से विचार करेंगे. हम यह तय करेंगे कि क्या इसे किसी बड़ी बेंच (लार्जर बेंच) के पास भेजने की आवश्यकता है."
इससे पहले, जस्टिस डब्ल्यू डेंगदोह की एकल पीठ ने शिलॉन्ग के एडिशनल डिप्टी कमिश्नर के अप्रैल 2026 के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया था. निचली अदालत ने सोनम को प्रक्रियागत आधारों पर जमानत दी थी.
निचली अदालत ने यह मानते हुए जमानत दी थी कि पुलिस आरोपी को उसकी गिरफ्तारी के कारणों की सही जानकारी देने में विफल रही, जिससे उसके बचाव के अधिकार को नुकसान पहुंचा. अदालत ने अभियोजन पक्ष की इस दलील को मानने से इनकार कर दिया था कि यह विसंगति महज एक लिपिकीय या टाइपिंग की गलती थी.
यह मामला इंदौर के व्यवसायी राजा रघुवंशी की हत्या से जुड़ा है. मई 2025 में अपनी पत्नी सोनम के साथ हनीमून के लिए मेघालय गए थे. 23 मई को नोंगरियत के एक होमस्टे से चेक-आउट करने के बाद यह जोड़ा लापता हो गया था. बाद में राजा का शव सोहरा में वेइसावडोंग झरने के पास एक गहरी खाई से बरामद किया गया था. जबकि, सोनम को कुछ दिनों बाद उत्तर प्रदेश से ढूंढ निकाला गया था.
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